पूर्ण स्वराज आंदोलन का इतिहास | Purna Swaraj Andolan ki History in Hindi

पूर्ण स्वराज आंदोलन का इतिहास (Purna Swaraj Andolan ki History in Hindi)

भारत में गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी को मनाया जाता हैं लेकिन एक विशेष कारण हैं जो 26 जनवरी को ही चुना गया था. देश के पहले गणतन्त्र दिवस मनाने  से 20 वर्ष पहले ही भारत को ब्रिटिश सरकार से मुक्त करवाकर पूर्ण स्वराज की शपथ ली थी, लेकिन देश को स्वतंत्रता मिलने एवं स्वतंत्रता के बाद भी संविधान बनने और लागू होने में भी काफी समय लगा. वास्तव में पूर्ण स्वराज कोई एक दिवस का युद्ध या उत्सव नहीं था, ये लगभग 3 दशको तक चलने वाला संघर्ष और आंदोलन हैं. भारत के संविधान का इतिहास जानने के लिए यहाँ क्लिक करें 

Purna Swaraj Andolan

आंदोलन का नाम पूर्ण स्वराज आंदोलन
किसने मांग की?? इंडियन नेशनल कांग्रेस
प्रस्ताव कब पारित हुआ? 19 दिसम्बर 1929
घोषणा कब हुयी? 26 जनवरी 1930

पूर्ण स्वराज आंदोलन की पृष्ठभूमि (Background behind Purna Swaraj Andolan)

1920 के दशक की शुरुआत में भारत के राष्ट्रवादी नेताओं ने ये महसूस किया कि ब्रिटिश सरकार द्वारा शोषण चरम पर पहुँच चूका हैं और देश को पूरी स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए. ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों की आवाज़ को दबाए जाने के लिए किये गये कुछ कृत्य जैसे जलियावाला बाग़ पंजाब में तनाव और रौलेट एक्ट ने  देशवासियों की इच्छा को और प्रबल कर दिया और पूरा देश ब्रिटिश सरकार से मुक्ति चाहने लगा. खिलाफत आंदोलन के बाद मुस्लिम भी ब्रिटिश सरकार के पक्ष में नहीं थे.

1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुयी थी,और साथ ही खिलाफत आंदोलन भी चला था. असहयोग आन्दोलन में ब्रिटश सरकार से असहयोग और उनके दिए सम्मान को लौटाया गया था, इसके अलावा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और विदेशी का बहिष्कार जैसे कई छोटे बड़े प्रयास किये गये थे. लेकिन चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन रद्द कर दिया, जिसमें 22 लोगों को जिन्दा जला गया गया था. असहयोग आंदोलन में भारत के मजदूर, कलाकार, दुकानदार और अधिकारी-गण तक के लोग शामिल थे, वास्तव में यही इस आंदोलन की विशेषता थी. लेकिन इन सबके साथ ही पूर्ण स्वराज की पृष्ठभूमि भी तैयार हो रही थी.

पूर्ण स्वराज के प्रमुख नेता (Main Leaders of Purna Swaraj )

1922 में गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया, और फरवरी 1924 में उन्हें आज़ाद किया गया. इसी दौरान कांग्रेस का विभाजन हो गया और एक पक्ष खुद को स्वराजिस्ट कहने लगा, जो की ब्रिटिश सरकार का पूरी तरह से बहिष्कार नहीं करने की जगह काउंसिल के साथ काम करने की पैरवी करता था. इस समूह में सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरु प्रमुख थे. गाँधी इन दोनों पक्षों के बीच में थे और ये मानते थे कि स्वराज पार्टी को विधानसभा में कांग्रेस की तरफ से काम करना चाहिए.

पूर्ण स्वराज की मांग (Purna Swaraj Ki maang)

  • मोतीलाल नेहरु ने भारत में सत्ता के हस्तांतरण के लिए केंद्रीय विधानसभा के पहले सत्र में नये संविधान के लिए मांग की उठाई और ये मांग मान ली गयी. स्वराज की मांग करने वालों के लिए एक उम्मीद भरी नैतिक जीत थी.
  • इसके बाद राष्ट्रवादियों का स्वराज की मांग के साथ स्वतंत्र देश के लिए आवश्यकताओं की तरफ ध्यान जाने लगा था जबकि ब्रिटिश सरकार अब भी देश में अपना हस्तक्षेप रखना चाहती थी, इसी उद्देश्य से भारत में सुधार कार्यों को देखने और इस पर चर्चा करने के लिए 1927 में साइमन कमिशन भारत भेजा गया था, लेकिन जब 3 फरवरी 1928 को साइमन कमिशन बोम्बे पहुंचा तो वहां काले झंडे दिखाकर इसका विरोध किया किया गया. पूरे देश में साइमन कमिशन का विरोध हो रहा था, जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही थी. ऐसे ही लाहौर में एक विरोध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा हुए लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय का देहांत हो गया, जिसके कारण क्रांतिकारियों और देशवासियों में रोष की लहर फ़ैल गयी, लेकिन कांग्रेस राजनैतिक स्तर पर अपने कार्यों को दिशा में लगी रही और मोतीलाल नेहरु के नेतृत्व में  एक कमिशन बनाया जिसके अंतर्गत देश में संविधान बनाने का प्रस्ताव रखा गया.
  • नेहरु रिपोर्ट ने ब्रिटिश साम्राज्य में भारत को डोमिनियन स्टेट बनाने की मांग की गयी थी. हालांकि कांग्रेस के युवा नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस इस मांग से पूरी तरह पक्ष में नही थे. दिसम्बर 1928 में कलकता के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को पारित किया गया कि ब्रिटिश सरकार भारत देश को एक वर्ष के भीतर सम्प्रभुता देनी होगी और इसे डोमिनियन स्टेट बनाना होगा, ऐसा न होने पर कांग्रेस पूर्ण स्वराज का आह्वान करेगी.
  • 1929 में भारत के वायसराय लार्ड इरविन ने एक घोषणा की जिसमें कहा गया कि भारत को भविष्य में डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिया जाएगा, भारतीय नेताओं ने इस घोषणा का स्वागत किया, क्योंकि वो काफी समय से इसकी मांग कर रहे थे.  
  • इरविन की घोषणा को इंग्लैंड से समर्थन नही मिला, वहां के राजनेताओं और आम जनता ने भारत को डोमिनियन स्टेट बनाने का विरोध किया.  इस दबाव के कारण लार्ड इरविन ने जिन्ना, नेहरु गांधी जैसे बड़े नेताओं के साथ एक मीटिंग में ये कहा कि वो जल्दी भारत को डोमिनियन स्टेट नहीं बना सकते. और इसके बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस ने अपना उद्देश्य ही बदल दिया और डोमिनियन स्टेट की जगह पूर्ण स्वराज की मांग के बारे में सोचने लगी.

पूर्ण स्वराज की घोषणा (Purna Swaraj )

  • कांग्रेस ने 26 दिसम्बर 1929 को लाहौर सेशन में ऐतिहासिक प्रस्ताव “भारतीय स्वतंत्रता की घोषणा (इंडियन डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडिपेंडेंस)” रखा, जिसमे पूर्ण स्वराज की मांग की गयी, और 31 दिसम्बर 1929 की मध्य रात्रि को कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को पारित किया.
  •  पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव 750 शब्दों का सामान्य डोक्युमेंट था, जो कोई क़ानूनी या संवैधानिक दस्तावेज नहीं था, ये एक घोषणा पत्र के समान था. कांग्रेस ने इसके लिए जिन मुद्दों को आधार बनाया और पूर्ण स्वराज के लिए जो शर्तें रखी, उसका सार हैं:-   हमें लगता हैं की भारतीयों  को भी दुनिया के अन्य लोगों के जैसे स्वतंत्र जीवन जीने का हक हैं और अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने का अधिकार हैं. हमे लगता हैं कि कोई भी सरकार जो इन अधिकारों का हनन करती हैं उसे हटा देना चाहिए. भारत में ब्रिटिश सरकार ने न केवल भारतीयों की स्वतंत्रता छीनी हैं बल्कि बल्कि देश का आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और अध्यात्मिक शोषण भी किया हैं. इस कारण भारत को पूर्ण स्वराज और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.
  • भारत का काफी आर्थिक शोषण हो चूका हैं, यहाँ के लोगों की आय उन पर लगाये गये कर की तुलना में बहुत कम हैं. इस पर 20 प्रतिशत टैक्स और बढ़ा दिया गया हैं और 3 प्रतिशत टैक्स नमक कर के कारण बढ़ गया हैं जिसके कारण गरीबों पर आर्थिक बोझ बढ़ चूका हैं.
  • ग्रामीण उद्योग पूरी तरह से बर्बाद हो चुके हैं. कस्टम और करेंसी के कारण कृषकों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया हैं, ब्रिटिश में बने सामान भारी मात्रा में आयात किये जा रहे हैं. ब्रिटिश में बने सामनों के लिए बहुत कस्टम ड्यूटी लगाई जा रही हैं, जबकि जनता पर इसका कर बढाया जा रहा हैं. भारत देश राजनैतिक रूप से इतना कमजोर कभी नहीं हुआ जितना ब्रिटिश सरकार के दौरान हुआ हैं. जनता को किसी भी तरह का राजनीतिक अधिकार नहीं दिया गया हैं. हमारे सबसे उच्च अधिकारी भी विदेशियों के सामने झुकते हैं. विचारों की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता का अधिकार भी नही दिया जा रहा, वो भारतीय नागरिक जो भारत के बाहर रह रहे हैं उन्हें भी देश में लौटने की स्वतंत्रता नही मिल रही हैं. 
  • सभी तरह के प्रशासनिक योग्यताओं को दबाया जा रहा हैं एवं गांवों में ग्रामीण ऑफिस और क्लर्क के हवाले किया जा रहा हैं. देश को सांस्कृतिक रूप से बर्बाद करने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कोई विस्तार नही दिया जा रहा, आध्यात्मिक रूप से कमजोर किया जा रहा हैं. देश की सुरक्षा विषय में ब्रिटिश सरकार का  इस तरह से हस्तक्षेप है जैसे हम विदेशी आक्रांताओं,चोर-डाकू से खुद अपने और अपने परिवार की रक्षा नहीं कर सकते हैं. हम मानते हैं कि इस तरह के शासन को बर्दाश्त करना भगवान और इंसान दोनों की नजर में अपराध हैं, और ये आगे चलकर देश को और ज्यादा तबाह कर सकता हैं. हम मानते हैं कि देश को अहिंसात्मक तरीके से ही स्वतंत्र करवाया जा सकता हैं. इसलिए हम खुद को ब्रिटिश सरकार के तंत्र से अलग करते हुए असहयोग आंदोलन की घोषणा करते हैं, जिसमे टैक्स भी नही भरे जायेंगे. हम मानते हैं कि यदि हमने टैक्स भरना बंद कर दिया तो इस तरह के अमानवीय शासन का जल्द ही अंत जल्द हो जायेगा, और इसी क्रम में  पूर्ण स्वराज का आह्वान करते है”

कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा के साथ ही 26 जनवरी 1930 को भारतीयों से आह्वान किया कि वो इस दिन (26 जनवरी) को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाये. हालाँकि कालान्तर में भारत को 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता मिली थी, और उसी दिवस को भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता हैं लेकिन 26 जनवरी को याद रखने और सम्मान देने के लिए ही भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था इसलिए ये दिन भारत के लिए महत्व रखता हैं.

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