स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रफुल्ल चन्द्र चाकी का जीवन परिचय (Prafulla Chaki Biography in Hindi)

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रफुल्ल चन्द्र चाकी का जीवन परिचय (Prafulla Chaki Biography in Hindi)

अंग्रेजों से आजादी के लिए भारत देश में कई साल लड़ाई चली थी, इस लड़ाई में कई हजार लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. कई ऐसे नाम है, जो इतिहास में पन्नों में भी नहीं है, तो कुछ ऐसे नाम है जो इतिहास के पन्नों में होते हुए भी बहुत से लोगों को नहीं पता है. ऐसे ही एक स्वतंत्रता संग्रामी है प्रफुल्ल चन्द्र चाकी, जिन्हें शायद पुरे देश के लोग नहीं जानते हो, लेकिन देश की आजादी में इनका भी विशेष योगदान रहा है. मात्र 19 साल की उम्र में ये देश के लिए शहीद हो गए थे. आज हम आपको इसी महान क्रांतिकारी के जीवन के बारे में विस्तार से बतायेंगें. इनकी स्वतंत्रता की लड़ाई, इनके विचारों को आप इस आर्टिकल के माध्यम से विस्तार से पढ़ सकेंगें.

Prafull Chandra Chaki

1 नाम (Name) प्रफुल्ल चाकी
2 अन्य नाम (Other names) नहीं
3 राष्ट्रियता (Nationality) भारतीय
4 जन्म (Birth) 10 दिसम्बर 1888
5 जन्म स्थान (Birth Place) बोगरा जिले का बिहारी गाँव, बंगाल प्रेसीडेंसी
6 मृत्यु (Death) 2 मई 1908
7 मृत्यु स्थान (Death Place) बिहार
8 उम्र (Age) 19 साल
9 धर्म (Religious) NA
10 जाति (Caste) NA
11 राशि (Sign) NA
12 जाने जाते है  (known for) क्रांतिकारी (स्वतंत्रता संग्रामी)
13 वैवाहिक स्थिती (Marital Status) अविवाहित

प्रफुल्ल चन्द्र चाकी जन्म, शिक्षा, पारिवारिक जीवन (Prafulla Chaki Birth, Education, Family)

जन्म एवं परिवार – प्रफुल्ल चाकी का जन्म ब्रिटिश भारत के समय बंगाल प्रेसिडेंसी के बोगरा जिले के बिहारी गाँव में हुआ था. प्रफुल्ल के माता पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, इसी बीच प्रफुल्ल के 2 साल की उम्र में पिता का आकस्मिक निधन हो गया था. माँ ने अकेले इनका पालन-पोषण किया, आर्थिक परेशानियों के बीच भी प्रफुल्ल की माँ ने उनकी जरूरतों को पूरा किया.

शिक्षा – प्रफुल्ल जी ने शुरुवाती स्कूल की पढाई रंगपुर जिला स्कूल से की थी. कक्षा 9 वीं तक इन्होने इसी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की थी. इसके बाद उन्होंने रंगपुर नेशनल स्कूल में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साहित्य का गहन चिंतन किया, और शिक्षा प्राप्त की. इसके अलावा क्रांतिकारियों के विचारों को जाना, जिससे उनके अंदर भी क्रांतिकारी बनने की भावना जाग उठी.

प्रफुल्ल जी इसके बाद क्रांतिकारी के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने लगे, जिससे उन्होंने आगे स्कूल की पढाई बीच में छोड़ दी.

प्रफुल्ल चन्द्र की क्रांतिकारी गतिविधियाँ –

  • प्रफुल्ल चाकी ने सबसे पहले क्रांन्तिकारी के रूप में क्लास नौवी में भाग लिया था. उस समय उनके आस पास बंगाल विभाजन को लेकर बहुत लड़ाई चल रही थी. बंगाल विभाजन को लेकर उस समय वहां के नागरिक के साथ-साथ स्कूल के विद्यार्थियों ने भी हिस्सा लिया था. इसमें प्रफुल्ल जी भी शामिल थे. जिस वजह से उन्हें स्कूल से भी निकाल दिया गया था.
  • इसके बाद प्रफुल्ल जी एक बड़े क्रांतिकारी दल से जुड़ गए थे, इस संगठन में बड़े-बड़े क्रांतिकारी थे. इसकी शुरुवात स्वामी महेश्वरानंद ने की थी.
  • इसके बाद एक अन्य क्रांतिकारी बारिन घोष के साथ प्रफुल्ल कोलकत्ता चले गए थे, जहाँ वे युगांतर नाम की क्रांतिकारी पार्टी में शामिल हो गए.
  • प्रफुल्ल चाकी को क्रांतिकारी दल ने पूर्वी बंगाल के पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर बेम्फिल्ड फुलर की हत्या का काम सौपा था. दुर्भाग्यवश उनकी यह योजना असफल रही थी.

मुजफ्फरपुर हत्याकांड

  • कलकत्ता के मुख्य प्रेसीडेंसी में किंग्सफोर्ड नाम के मजिस्ट्रेट हुआ करते थे, जो युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं से बहुत गन्दा व्यव्हार किया करते थे. इसके साथ ही श्रमिकों को शारीरिक रूप से दण्डित करते थे. ऐसे अंग्रेज शासक को मारने के लिए युगांतर क्रांतिकारी दल ने खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को चुना था. तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को इस बात की भनक हो गई थी कि युगांतर दल किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बना रहा है, जिसके चलते उनका ट्रान्सफर बिहार कर दिया गया था. इसके बाद खुदीराम और प्रफुल्ल भी अपनी योजना को पूर्ण करने बिहार के मुजफ्फरपुर चले गए थे.
  • प्रफुल्ल जी ने योजना की पूरी विस्तार से जानकारी ली, और योजना को सफल बनाने के लिए उन्होंने अपना नाम तक बदलकर दिनेश चन्द्र रख लिया था. खुदीराम और प्रफुल्ल, किंग्सफोर्ड के आने-जाने, उनकी सारी गतिविधियों को ध्यान से देख रहे थे.
  • फिर अप्रैल 1908 को प्रफुल्ल और खुदीराम को पता था कि किंग्सफोर्ड यूरोपियन क्लब आयेंगें, तो वे दोनों उन्हें मारने के लिए क्लब के बाहर इंतजार करने लगे. जैसे ही एक बग्गी रुकी प्रफुल्ल और खुदीराम को लगा कि इस पर किंग्स्फोर्ड है, तो उन्होंने उस पर एक बम फेंक दिया. लेकिन उस में किंग्स्फोर्ड नहीं थे, बल्कि किसी धनाड्य व्यापारी की पत्नी और बेटी उसमें मौजूद थी. मौके पर ही इन दोनों की मृत्यु हो गई.
  • इस घटना के बारे में प्रफुल्ल और खुदीराम को नहीं पता था, उन्हें लग रहा था कि वे अपनी योजना में सफल हो गए है. जिसके बाद दोनों भागकर अलग-अलग जगह निकल गए थे. प्रफुल्ल समस्तीपुर के एक रेलवे स्टेशन में गए, जहाँ उन्हें कुछ समय रहने, खाने की मदद एक भारतीय जो रेलवे का स्टाफ मेम्बर था, उसने की थी. उसी ने प्रफुल्ल जी को टिकट खरीद के दी, जिसके बाद प्रफुल्ल यहाँ से मोकरमा की ट्रेन में बैठ गए थे.

प्रफुल्ल चाकी मृत्यु (Prafulla Chaki Death)

  • प्रफुल्ल जिस कोच में थे, उन्ही के आस पास एक पुलिस अधिकारी नन्दलाल बैनर्जी भी था. बम काण्ड की बात हर जगह फ़ैल चुकी थी. सभी पुलिस अधिकारीयों को अलर्ट जारी कर दिया था. प्रफुल्ल जब ट्रेन में थे, तो थोड़े घबराये हुए थे. इस बात को नन्दलाल जी ने भांप लिया और उन्होंने अगले स्टेशन में प्रफुल्ल को पकड़वाने की पूरी तैयारी करा ली.
  • अगला स्टेशन आते ही सभी पुलिस वालों के उन्हें घेरना चाहा, तो वे बचकर भागे, लेकिन चारों तरफ से वे घिर चुके थे. प्रफुल्ल को अंग्रेजों के हाथों की बजाय खुद की गोली खाना ज्यादा गंवारा था. 1 मई 1908 को प्रफुल्ल ने एक गोली अपने सर पर और एक सीने में मार ली और शहीद हो गए थे.
  • खुदीराम को भी अंग्रेज पुलिस ने कलकत्ता में पकड़ कर अपनी गिरफ्त में ले लिया था. खुदीराम को भी अंग्रेज सरकार ने फांसी की सजा दे दी थी.
  • प्रफुल्ल चाकी की मृत्यु के बाद अंग्रेज सरकार को उनकी पहचान को लेकर संशय बना हुआ था, क्यूंकि मुज्जफरनगर बम कांड के पहले उन्होंने अपना नाम दिनेश राय रख लिया था. अंग्रेज पुलिस उनकी सही पहचान के लिए उनके सर को धड़ से अलग कर देती है और सिर्फ सर को खुदीराम के पास कलकत्ता ले गए थे. यहाँ खुदीराम ने प्रफुल्ल चाकी के रूप में उनकी पहचान की थी.

प्रफुल्ल चाकी का जीवनकाल सिर्फ 19 साल का था, इतनी कम उम्र में वे अपने देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे. प्रफुल्ल चन्द्र के जीवन से हमें पता चलता है कि वो बहुत हिम्मती, आत्मविश्वासी और देशप्रेमी इन्सान थे. प्रफुल्ल चाकी की देशभक्ति को हम शत शत नमन नमन करते है.

Other Links:

  1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1757 से 1947 तक
  2. काका कालेलकर का जीवन परिचय 

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