पानीपत के तीनो युद्धों का विस्तारपूर्वक वर्णन | All three Panipat war in Hindi

पानीपत के तीनो युद्धों का विस्तारपूर्वक वर्णन (All three Panipat war in Hindi)

हरियाणा राज्य की भूमि भारतवर्ष में हुए ऐतिहासिक युद्धों के लिए जानी जाती है. हरियाणा राज्य के कुरुक्षेत्र में ही महाभारत जैसे धर्म युद्ध लड़े गए थे. आज हम बात करने वाले हैं , हरियाणा राज्य के पानीपत के शहर में हुए ऐसे तीन बड़े ऐतिहासिक युद्धों के बारे में जो बहुत ही प्रसिद्ध है. इन्हीं युद्धों की वजह से दो बड़े साम्राज्यों मुगल साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य का उत्कर्ष हुआ. इन्हीं दो साम्राज्यों ने भारतवर्ष के एक बड़े हिस्से में दो -दो सौ वर्ष तक राज किया था. पानीपत में हुए इन तीन ऐतिहासिक युद्धों के परिणाम स्वरूप इनमें एक सामान्यता यह थी , कि इसमें भारतीय पक्षों की तीनों बार हार हुई चाहे फिर वह युद्ध हिंदू पक्ष या फिर मुस्लिम पक्षों ने ही क्यों ना लड़ा हो. आइए जानते हैं , विस्तारपूर्वक पानीपत में हुए इन तीनों युद्धों के बारे में.

Panipat ki Ladai

पहली लड़ाई  1526 (पानीपत का प्रथम युद्ध)
दूसरी लड़ाई 1556 (पानीपत का द्वितीय युद्ध)
तीसरी लड़ाई  1761 (पानीपत का तृतीय युद्ध)

पानीपत का प्रथम युद्ध एवं परिणाम ?

पानीपत के प्रथम युद्ध से जुड़ी बातें
तिथि 21 अप्रैल 1526
युद्ध स्थल पानीपत, हरियाणा, भारत

 

युद्ध परिणाम  मुगलों की जीत

 

प्रतिद्वंदी मुगल /लोधी सल्तनत
युद्ध सेनापति बाबर /इब्राहिम लोधी
कुल सेनाओं की गिनती 50,000 से 100,000 तक सैनिक
कुल सैनिकों की मृत्यु कुल लगभग 20,000 सैनिक

पानीपत के प्रथम युद्ध के बारे में –

पानीपत के इस ऐतिहासिक प्रथम युद्ध को 21 अप्रैल 1526 में लड़ा गया था. यह युद्ध बाबर एवं दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोधी के बीच लड़ा गया था. इस युद्ध में इब्राहिम लोधी की सेना बाबर की सेना से 4 गुना अधिक बड़ी थी. परंतु बाबर की कुशल युद्ध रणनीति और तोपखाने की वजह से यह युद्ध मुगलों के पक्ष में रहा था और दिल्ली के सुल्तान अब्राहिम लोधी को हार का मुंह देखना पड़ा था. इस युद्ध में इब्राहिम लोधी की ओर से अनुमानित 1,00000 से लेकर 1,10000 तक सैनिकों ने युद्ध लड़ा था. इसके अलावा 300 युद्ध हाथियों ने भी इब्राहिम लोधी की ओर से युद्ध में भागीदार हुए थे. ग्वालियर के कुछ राजपूत राजा ने भी इब्राहिम लोधी की ओर से इस ऐतिहासिक युद्ध में सहायकदार बने थे. अंततः परिणाम स्वरूप इब्राहिम लोधी को इस युद्ध में बाबर ने परास्त कर दिया. इसी जगह से मुगलों का साम्राज्य उदय हुआ. इसी युद्ध के वजह से लोधी सल्तनत का भी अंत हो जाता है, और बाबर की ताकत बढ़ जाती है. इस युद्ध के अगले 4 वर्ष बाद बाबर उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से को अपने साम्राज्य से जोड़ने में कामयाब हो जाता है. पानीपत के इस प्रथम युद्ध में जिसमें बारूद और मैदानी तोपों की लड़ाई को शामिल किया गया था. इससे पहले कि युद्धों में इस तरह के हथियारों का प्रयोग कभी भी नहीं किया गया था.

पानीपत का द्वितीय युद्ध एवं परिणाम ?

पानीपत के द्वितीय युद्ध से जुड़ी कुछ बातें
तिथि 5 नवम्बर 1556
युद्ध स्थल पानीपत, हरियाणा, भारत

 

युद्ध परिणाम अकबर की विजय और मुगल साम्राज्य की बहाली
प्रतिद्वंदी मुग़ल साम्राज्यहेमचंद्र विक्रमादित्य
युद्ध सेनापति अकबरहेमचंद्र विक्रमादित्य
कुल सेनाओं की गिनती 50,000 से 100,000 तक सैनिक
कुल सैनिकों की मृत्यु 10,000 से 30,000 सैनिक तक

पानीपत के द्वितीय युद्ध के बारे में –

पानीपत का दूसरा ऐतिहासिक युद्ध 5 नवंबर 1556 को हिंदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य और मुगल सम्राट अकबर के बीच पानीपत के ही युद्ध क्षेत्र में लड़ा गया था. दिल्ली और आगरा में मुगलों का पतन हो गया था, जिससे मुगल साम्राज्य के लोग बहुत चिंतित थे. मुगल सम्राट के कुछ जनरलो ने हेमू की विशाल सेना से युद्ध करने के बजाए , युद्ध से पीछे हटने के लिए सलाह दी. परंतु अकबर के संरक्षक बैरन खान ने हेमू की विशाल सेना से युद्ध लड़ने का निश्चय किया. इसके बाद हेमू की सेना से युद्ध लड़ने के लिए अकबर की सेना ने दिल्ली की ओर कूच किया. 5 नवंबर 1956 को हेमू की सेना और अकबर की सेना का युद्ध स्थल में आमना सामना हुआ. इसी पानीपत के इसी युद्ध स्थल पर अकबर के दादाजी ने भी 30 साल पहले पानीपत की पहली लड़ाई इब्राहिम लोधी के साथ लड़ी थी. हेमू ने अपनी विशाल सेना का खुद ही नेतृत्व किया था. हेमू की सेना में कुल 1500 युद्ध हाथी और उत्तम प्रकार के तोपखाने मौजूद थे. हेमू ने कुल 30,000 युद्ध कौशल में परिपूर्ण राजपूत सेना और अफगान की अश्वरोही सेना के साथ युद्ध स्थल की ओर कूच कर दिया. हेमू की सेना मुगल सेना के ऊपर अपनी बढ़त बनाए हुए थी. परंतु मुगलो की सेना ने एक कुशल रणनीति तैयार की और उस समय हेमू अपने हाथी पर बैठकर युद्ध लड़ रहा था. तभी मुगलों की ओर से एक तीर जाकर उसकी आंख में जा लगा. इसके तुरंत बाद हेमू के हाथी चालक ने अपने सम्राट की जान बचाने के लिए उनको युद्ध स्थल से दूर ले जाने लगा. परंतु मुगलों की सेना ने उसका पीछा किया और उसे गिरफ्तार कर लिया. इसके पश्चात हेमू को बंदी बनाकर अकबर और उसके संग रक्षक बैरम खान के सामने हेमू को प्रस्तुत किया गया. इसके बाद बैरम खान ने अपनी तलवार से हेमू के सिर को धड़ से अलग कर दिया. और इस तरह दिल्ली की गद्दी को मुगल शासक अकबर ने अपने नाम किया. इस युद्ध के वजह से ही मुगलों का वर्चस्व दोबारा से स्थापित हुआ और अगले 300 वर्षों तक मुगलों ने सकुशल रूप से शासन किया.

पानीपत का तृतीय युद्ध एवं परिणाम ?

पानीपत के तृतीय युद्ध से जुड़ी कुछ बातें
तिथि 14 जनवरी 1761
युद्ध स्थल पानीपत, हरियाणा, भारत

 

युद्ध परिणाम  अफ़गानों की जीत
प्रतिद्वंदी दुरानी समराज -अवध का नवाब -रोहिले/ मराठा साम्राज्य

 

युद्ध सेनापति अहमद शाह अब्दाली / सदाशिव राव भाऊ
कुल सेनाओं की गिनती 100000 सैनिक/ 60 से 70000 सैनिक
कुल सैनिकों की मृत्यु  20 से 30,000/ 30 से 40,000 तक

 

पानीपत के तृतीय युद्ध के बारे में – मुगल साम्राज्य का अंत लगभग 1748 से 1857 के बीच में शुरू हो गया था. इस दौरान ज्यादातर मुगल साम्राज्य के भू-भागो पर मराठों का अधिकार हो गया था. नादिरशाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण करके दिल्ली को पूरी तरीके से नष्ट कर दिया था. दुर्रानी को अफगानिस्तान लौटने पर रघुनाथ राव ने मजबूर कर दिया था. 1757 में रघुनाथ राव ने दिल्ली पर मजबूती से आक्रमण किया परिणाम स्वरूप दुरानी को अफगानिस्तान लौटने के सिवा कोई और रास्ता नहीं सूझा और उसने युद्ध में अपनी हार स्वीकार कर लीं और  अफगानिस्तान की ओर लौट गया. मराठों ने 18 वीं सदी के मध्य तक पूरे उत्तर भारत में अपना अधिकार कर लिया था. जिससे अफगानिस्तान के शासकों को समस्या होने लगी और मराठों और अब अफगानीयों के बीच युद्ध का सबसे बड़ा कारण बनी. जो आगे चलकर पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी 1761 को मराठों और अफगानिस्तान के शासकों के बीच ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया . मराठों का उद्देश्य था , कि पूरे भारतवर्ष में हिंदू साम्राज्य को दोबारा से स्थापित किया जाए. भारतीय मुस्लिम सम्राटों को डर हो गया , कि कहीं हमारा अस्तित्व ही खत्म ना हो जाए. इसीलिए कुछ भारतीय मुस्लिम सम्राटों ने दुर्रानी को वापस भारत बुलाया और उनकी तरफ से मराठों से युद्ध करने के लिए न्योता दिया. मराठों को यह उम्मीद थी, कि इस युद्ध में उनकी सहायता के लिए राजपूत और जाटों की भी सेनाएं और सम्राट उनके तरफ से युद्ध लड़ने के लिए तैयार होंगे. परंतु ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ , क्योंकि मराठों का स्वभाव थोड़ा कुरूर था, जिससे सभी राजपूतों और जाटों के सम्राट उनके इस व्यवहार से नाराज भी थे. इसी के चलते उन्होंने मराठों के साथ मिलकर युद्ध लड़ने का विचार नहीं किया और वे युद्ध में उनका साथ देने के लिए नहीं पहुंचे . इसी वजह से मराठों की सेना मुस्लिम सुल्तानों की संयुक्त सेना से बहुत ही कमजोर हो गए. जिसके चलते मराठों को पानीपत के इस ऐतिहासिक तीसरे युद्ध में हार का सामना करना पड़ा. पानीपत की तीसरी लड़ाई को 18 वीं सदी की सबसे विशाल और खूनी लड़ाई माना जाता है. इस युद्ध से मराठा शक्ति कमजोर हो गई जिसके चलते अंग्रेजों को भारत पर अपना अधिकार जमाने का और शासन करने का रास्ता मिल गया. परंतु बुराई को भी इस युद्ध में काफी ज्यादा सैन्य शक्ति का नुकसान झेलना पड़ा. जिसके चलते उसने कभी भी दिल्ली पर हमला करने का विचार भी नहीं किया.

निष्कर्ष –
भारतीय इतिहास में हुए इन तीनों युद्धों को भारत के इतिहास में हुई प्रमुख घटना के रूप में देखा जाता है. इन्हीं मुद्दों की वजह से 200 – 200 साल तक मुगल साम्राज्य ने और ब्रिटिश साम्राज्य ने अपना शासन किया. जरा सोचिए यदि इन तीनों युद्धों का परिणाम इसके विपरीत होता तो आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता. इसीलिए युद्ध केवल इतिहास बनाते नहीं बल्कि आने वाले इतिहास को भी बदल कर रख देते हैं. किसी भी प्रकार का युद्ध देश की अर्थव्यवस्था और विकास पर लगाम लगा देता है. जो कि हमें, भारतीय इतिहास में हुए पानीपत के तीनो युद्धों के बारे में जानकर पता चलता है.
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