पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जीवन परिचय | Pandit Deen Dayal Upadhyay Biography in Hindi)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जीवन परिचय (Pandit Deen Dayal Upadhyay Biography in Hindi)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी भारत की एक ऐसी हस्ती थी, जिन्होंने अपने कार्यों एवं विचारों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया. ये पेशे से एक महान राजनेता थे, जोकि भारतीय जन संघ नामक बड़ी पार्टी के अध्यक्ष थे. इसे वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नाम से जाना जाता है. उन्होंने भारत की आजादी के बाद लोकतंत्र को अलग परिभाषा देते हुए देश के निर्माण के लिए कई कार्य किये, जिससे वे आज भी स्मरणीय हैं.

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दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म एवं परिचय (Deen Dayal Upadhyay Birth and Introduction)

क्र. म. (s.No.) परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1. पूरा नाम (Full Name) पंडित दीनदयाल उपाध्याय
2. अन्य नाम (Nick Name) दीना
2. जन्मतिथि (Birth date) 25 सितम्बर, 1916
3. जन्म स्थान (Birth Place) चंद्रभान गाँव, मथुरा उत्तरप्रदेश
4. उम्र (Age) 51 साल
5. राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
6. प्रसिद्धि (Famous For) राजनेता
7. राजनीतिक पार्टी (Political Party) भारतीय जन संघ
8. राशि (Zodiac Sign) तुला
9. मृत्यु (Death) 11 फरवरी 1968
10. मृत्यु स्थान (Death Place) मुग़लसराई जंक्शन रेलवे स्टेशन, उत्तरप्रदेश

 दीनदयाल उपाध्याय जी का परिवार (Deen Dayal Upadhyay Family)

1. माता का नाम (Mother’s Name) रामप्यारी
2. पिता का नाम (Father’s Name) श्री भगवती प्रसाद उपाध्याय
3. दादाजी का नाम (Grand-father’s Name) पंडित हरिराम उपाध्याय
4. नाना जी का नाम (Maternal Father’s Name) पंडित चुन्नीलाल
5. भाई का नाम (Brother’s Name) शिवदयाल उपाध्याय

छोटी उम्र से ही संघर्षो भरा जीवन जीते दीनदयाल समाज के लिए एक मिसाल है. कहां जाता है की यह एक मध्यम वर्गीय परिवार का हिस्सा थे. उनके दादाजी पंडित हरिराम उपाध्याय एक पौराणिक ज्योतिषी थे. उनके पिता जलेसर में सहायक स्टेशन मास्टर थे और उनकी माता एक धार्मिक रीतिरिवाज को मानने वाली महिला थी. इसके अलावा इनके परिवार में इनके भाई शामिल थे जो उनसे 2 साल छोटे थे.

दीनदयाल उपाध्याय जी का शुरूआती जीवन (Early life of Deen Dayal Upadhyay)

सन 1918 में जब उनके पिता की मृत्यु हुई, तब उनकी उम्र केवल ढाई साल थी. जिससे उनके परिवार का भरण पोषण बंद हो गया था. तब उनके नानाजी जी ने उनके परिवार को संभाला. उसके बाद उनकी माता की भी की बीमारी के चलते मृत्यु हो गई, जिससे दीनदयाल जी एवं उनके भाई दोनों अनाथ हो गए. किन्तु उनका पालन – पोषण उनके ननिहाल में बेहतर तरीके से हुआ. उनका ननिहाल फतेहपुर सीकरी के पास स्थित गाँव गुड की मंडी का था. जब वे केवल 10 वर्ष के थे, तब उनके नाना जी का भी देहांत हो गया था. इस तरह से उन्होंने बहुत छोटी सी उम्र में अपने परिवार को खो दिया था. अब उनका केवल एक ही सहारा था उनका भाई शिवदयाल.

वे दोनों अपने मामा जी के साथ ही रहते थे. उनके मामा ने उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला था. दीनदयाल जी अपने भाई से बहुत प्यार करते थे. उनके भाई को छोटी उम्र में ही एक गंभीर बीमारी लग गई थी. जिसके कारण उन्होंने अपने भाई शिवदयाल को एक अभिभावक के रूप में संभाला. किन्तु उनके भाई की 18 नवंबर सन 1934 में उस बीमारी के चलते मृत्यु हो गई. इसके बाद उन्हें अकेलापन लगने लगा, और वे दुखी रहने लगे. क्योंकि अब उसके परिवार का उनके साथ कोई भी नहीं बचा था. किन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी पढ़ाई पूरी करने का फैसला किया.

दीनदयाल उपाध्याय जी की शिक्षा (EDucation details of Pandit Deen Dayal Upadhyay )

1. स्कूली शिक्षा (Schooling) सीकर के हाई स्कूल
2. इंटरमीडिएट शिक्षा (Intermediate Education) पिलानी में जीडी बिड़ला कॉलेज
3. बी ए (B.A.) सनातन धार्मिक कॉलेज, कानपूर
4. एम ए (M.A.) सेंट जोन्स कॉलेज, आगरा

उन्होंने सीकर में हाई स्कूल की पढ़ाई की. दीनदयाल जी बचपन से काफी बुद्धिमान एवं उज्ज्वल थे. उन्होंने स्कूल एवं कॉलेज में कई स्वर्ण पदक एवं प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते. महाराजा कल्याण सिंह जी ने उन्हें पुरस्कार के रूप में किताबों के लिए ढाइसों रूपये और मासिक आधार पर दस  रूपये प्रदान किये. उन्होंने पिलानी में जीडी बिड़ला कॉलेज में प्रवेश लिया था, और वहां उन्होंने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की. इसमें वे प्रथम श्रेणी में पास हुए. इसके बाद वे कानपूर चले गये. वहां उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय में सनातन धार्मिक कॉलेज से अपनी बी ए यानि स्नातक की डिग्री प्राप्त की. इसमें भी वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए.

फिर उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एमए करने का फैसला किया और वे उसकी पढाई करने के लिए आगरा गये. किन्तु उनके मामा की बेटी के अचानक बीमार हो जाने के कारण उन्होंने अपनी एमए की पढ़ाई पूरी नहीं की और बीच में ही छोड़ दी. इस दौरान उनकी बहन का भी देहांत हो गया. फिर उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा भी दी, जिसको उन्होंने उत्तीर्ण कर लिया था. लेकिन उनकी रुचि आम जनता के लिए सेवा के प्रति अधिक थी, इसलिए उन्होंने नौकरी नहीं की. 

दीनदयाल उपाध्याय जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ (Association With Rashtriya Swayam Sevak Sangh (RSS))

दीनदयाल जी को बचपन से ही समाज सेवा में समर्पित होने के संस्कार प्राप्त थे. सन 1937 में जब उन्होंने अपनी बीए की परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद एमए में प्रवेश लिया था, तब वे अपने दोस्त बलवंत महाशब्दे के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल हुए. इसमें उनके साथ उनके एक और सहपाठी सुंदर सिंह भंडारी भी इस संघ में शामिल हुए. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केबी हेडगेवार के साथ मुलाकात की, और खुद को पूरी तरह से संगठन में समर्पित करने का फैसला किया. सन 1942 से वे पूरे समय के लिए इस संघ के साथ जुड़कर उसके लिए काम करने लगे. उन्होंने संघ शिक्षा में प्रशिक्षण लेने के लिए नागपुर में 40 दिनों के ग्रीष्मकालीन आरएसएस शिविर में भाग लिया और फिर इसके प्रचारक बने. सन 1955 में प्रचारक के रूप में उन्होंने उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जिले में काम किया.

भारतीय जन संघ का निर्माण (Bharatiya Jana Sangh Party)

सन 1951 में भारतीय जन संघ का निर्माण डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी जी ने किया था, जिसमें दीनदयाल उपाध्याय जी की पहले उत्तरप्रदेश शाखा के महासचिव और बाद में अखिल भारतीय महासचिव के रूप में नियुक्ती हुई. डॉ श्यामा प्रसाद जी उनकी बुद्धिमत्ता और विचारधारा से इतने प्रभावित थे, कि उन्होंने उनके लिए कहां की –“अगर मेरे पास दो दीनदयाल होते, तो मैं भारत के राजनीतिक चेहरे को बदल देता”. किन्तु सन 1953 में डॉ श्यामा प्रसाद जी की मृत्यु हो जाने के कारण इस संघ की पूरी जिम्मेदारी दीनदयाल जी पर आ गई. वे इससे 15 सालों तक जुड़े रहे और यह भारत की मजबूत राजनीतिक पार्टी में से एक बन गई और वे इस पार्टी के अध्यक्ष बने.  उसके बाद वे उत्तरप्रदेश के लोकसभा चुनाव के लिए खड़े हुए, लेकिन वे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में नाकाम रहे और इस चुनाव में उनकी हार हुई. वर्तमान में यही भारतीय जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी के नाम से जाता है. 

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दीनदयाल उपाध्याय जी का लेखक के रूप में करियर (Deen Dayal Upadhyay Writer Career

ये एक राजनेता के अलावा एक लेखक भी थे. इन्होंने आजादी से पहले लखनऊ में एक मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन किया, जिसके बाद उनके इस गुण की पहचान हुई. उन्होंने लेखक के रूप में निम्न कार्य किये –

क्र. म. विषय नाम
1. साप्ताहिक समाचार पत्र पंचजनय
2. दैनिक समाचार पत्र स्वदेश
3. नाटक चन्द्रगुप्त मौर्य
4. जीवनी ·         शंकराचार्य (हिंदी में)

·         आरएसएस के संस्थापक डॉ केबी हेडगेवार (हिंदी में)

5. साहित्यिक कृतियाँ सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, जगतगुरु शंकराचार्य, अखंड भारत क्यों?, भारतीय अर्थनीति : विकास की दिशा, दो योजनायें : वादे, प्रदर्शन, संभावनाएं, राष्ट्र जीवन की समस्याएं, डिवैल्यूएशन : ए ग्रेट फॉल, राजनीतिक डायरी, राष्ट्र चिन्तन, इंटीग्रल हुमानिस्म और राष्ट्र जीवन की दशा आदि.

दीनदयाल उपाध्याय जी के विचार (Deen Dayal Upadhyay Philosophy)

दीनदयाल जी इन सभी के अलावा एक विचारक भी थे. वे अपनी समृद्ध संस्कृति के आधार पर देश को बढ़ावा एवं उसका विकास करना चाहते थे और अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई पश्चिमी अवधारणाओं को ख़त्म करना चाहते थे. आजादी के तुरंत बाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई थी, लेकिन दीनदयाल जी गुलामी के इन वर्षों के बाद भारत के बारे में थोड़ा चिंतित थे. हालाँकि उन्हें यह पता था कि भारत में लोकतंत्र शुरू से हैं यह अंग्रेजों की देन नहीं है. उन्होंने लोगों की सोच बदली कि लोकतंत्र केवल लोगों को गुलाम बनाने एवं उनका शोषण करने के लिए नहीं है, बल्कि मजदूरों की समस्याओं को दूर करने के लिए हैं. वे अपनी समस्या लेकर सरकार के पास उसके निवारण के लिए जा सकते हैं, उनका कहना था कि किसी भी व्यक्ति को अपने दृष्टिकोण को सामने रखने का पूरा अधिकार है. प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान किया जाना चाहिए और शासन में शामिल किया जाना चाहिए. इस विचारधारा के चलते उन्होंने देश में लोकतंत्र की एक अलग परिभाषा को जन्म दिया.

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दीनदयाल उपाध्याय जी का अभिन्न मानवतावाद (Deen Dayal Upadhyay Integral Humanism)

दीनदयाल जी मानवतावाद को अधिक बढ़ावा देते थे. उन्होंने मानवतावाद को एक अलग तरीके से परिभाषित किया. उनका कहना था कि ‘मानव एक शरीर मात्र नहीं है, बल्कि वह एक मन, बुद्धि और आत्मा भी है. इसके बिना मानव शरीर का कोई अर्थ नहीं है.’ साथ ही उनका कहना था कि स्वतंत्र भारत को लोकतंत्र, व्यक्तिगत, समाजवाद, पूँजीवाद आदि जैसी पश्चिमी अवधारणाओं पर निर्भर नहीं होना चाहिए. क्योंकि यह भारत की सोच के विकास और उसके विस्तार में अड़चन डालने के लिए हैं. इससे देश का विकास नहीं हो सकता है.    

दीनदयाल उपाध्याय जी की रोचक बातें (Deen Dayal Upadhyay’s Interesting Facts)

  • दीनदयाल जी अपने व्यक्तिगत जीवन में बहुत ही साधारण व्यक्ति थे. वे धोती एवं कुर्ता पहना करते थे और इसके साथ ही उनके सिर पर एक टोपी होती थी.
  • इनकी इस वेशभूषा के कारण उनके साथी उन्हें पंडित जी कहा करते थे. फिर बाद में उन्हें इसकी उपाधि मिल गई. और फिर उनका नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रसिद्ध हो गया.
  • एक महान ज्योतिषी ने उनकी जन्मकुंडली देखते हुए कहा था कि – ‘वे बड़े होकर एक बुद्धिमान, विचारक एवं अग्रणी राजनेता बनेंगे, जोकि निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करेगा, किन्तु उनका विवाह नहीं होगा.’

दीनदयाल जी की मृत्यु (Deen Dayal Upadhyay Death)

अपने समाज सेवा और सुधारों के कार्यो के चलते इन्हे जनसंघ पार्टी ने अपना अध्यक्ष घोषित किया. उपाध्याय जी एक आलराउंडर राजनेता थे, लेकिन वे इस पद के लिए केवल 43 दिनों तक की कार्यरत रहे. क्योंकि  44 वें दिन यानि 11 फरवरी सन 1968 की सुबह उन्हें मुगल सराई रेलवे स्टेशन के पास मृत पाया गया. कहा जाता है कि दीनदयाल जी बजट सत्र के लिए पटना यात्रा करने के लिए निकले थे. इसके बाद मुगलसराय स्टेशन के पास उनकी बोगी ट्रेन से अलग हो गई. यह कहा जाता है उनकी ट्रेन में चोरों ने हमला किया था, और उन्होंने ही उनकी हत्या की थी. किन्तु यह सिर्फ एक अनुमान लगाया गया है. इसलिए इनकी मृत्यु का अब तक एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है. 12 फरवरी को तत्कालिक भारतीय राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और मोरारजी देसाई ने उन्हें अन्य प्रसिद्ध नेताओं के साथ मिलकर श्रद्धांजली अर्पित की. उस दिन दिल्ली में सभी कार्यालयों एवं दुकानों को बंद रखा गया था. देशवासी अपने एक महान नेता को श्रद्धांजली देने के लिए राजेन्द्र प्रसाद मार्ग पर चल दिए थे.  

दीनदयाल जी की धरोहर (Deen Dayal Upadhyay Legacy)

सन 2016 में बीजेपी सरकार ने उनके नाम पर कई सार्वजनिक संस्थानों का नाम रखा. इनके नाम पर दिल्ली में एक सड़क मार्ग भी है. यहाँ तक की इनके नाम से सरकार ने बहुत सी योजनाओं की शुरूआत की है. अगस्त 2017 में उत्तरप्रदेश में बीजेपी राज्य सरकार ने इनके सम्मान में मुग़लसराई स्टेशन का नाम इनके नाम पर रखने का प्रस्ताव रखा, क्योंकि उनका मृत शरीर उसी स्टेशन के पास पाया गया था. लेकिन इसका काफी विरोध किया गया, समाजवादी पार्टी का कहना है कि स्टेशन का नाम नहीं बदलना चाहिए, क्योकि दीनदयाल जी का स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था. इसके अलावा दीनदयाल रिसर्च इंस्टिट्यूट पर भी उपाध्याय जी एवं उनके कार्य के लिए प्रश्न उठाये गये हैं.

दीनदयाल उपाध्याय जी के अनमोल वचन (Deen Dayal Upadhyay Quotes)

  • जब राज्य में आर्थिक एवं राजनीतिक दोनों शक्तियां आ जाती हैं, तो इसका परिणाम धर्म की गिरावट होता है.
  • पिछले 1000 वर्षों में हमने जो भी अपनाया है, फिर चाहे वह हमने उसे मजबूरन अपनाया हो या इच्छा से, हम उसे त्याग नहीं सकते हैं.
  • स्वतंत्रता का तभी कोई अर्थ है, जब हम हमारी संस्कृति को व्यक्त करने के लिए साधन बनें.
  • नैतिकता के सिद्धांत किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं बनाये जाते, बल्कि उन्हें खोजा जाता है.
  • भारत में नैतिकता के सिद्धांत को धर्म के रूप में जाना जाता है – यह जीवन का नियम है.

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