अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का इतिहास | All India Muslim league history in Hindi

अखिल भारतीय मुस्लिम  लीग का इतिहास (All India Muslim league history in Hindi)

ये बात सर्वविदित हैं कि बंगाल के विभाजन ने साम्प्रदायिक  विभाजन तो  कर ही दिया था और उन परिस्थितियों में ही मुस्लिम लीग का गठन हुआ था. शुरू में इसके उद्देश्य सिर्फ मुस्लिम के हितों की रक्षा करना ही था और इस कारण इसे अंग्रेजो का पूरा समर्थन भी प्राप्त हुआ लेकिन जब लीग ने अपने स्वायत एवं स्वतंत्र शासन  की बात की  तो अंग्रेज इससे दूर होते चले गये, हालांकि परोक्ष रूप से अंग्रेज मुस्लिम लीग का अंत तक सहयोग करते रहे.  

Muslim league history

मुस्लिम लीग बनाने के कारण (Reasons of Muslim league Formation)

  • 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को समझ आया कि मुस्लिम उनके औपनिवेशिक नीति के लिए खतरा थे क्योंकि वो उनका शासन खत्म करके ही वहां अपना शासन शुरू किया था, इसलिए ये स्वाभाविक था कि मुस्लिम वर्ग अंग्रेजों से नाराज रहता. अंग्रेजों ने 1870 से हिन्दू-मुस्लिम विभाजनकारी नीति अपनाई, जिसका दूरगामी परिणाम ही मुस्लिम लीग का गठन था.
  • भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करना अंग्रेजों का प्लान था . वास्तव में अंग्रेजों ने भारत में “फूट डालो-राज करो” की जो नीति अपनाई थी उसने मुस्लिमों को एक दिशा दी थी. 1871 में सरकार ने मुस्लिम शैक्षिक संस्थाओं को ज्यादा सरकारी सहायता देना शुरू कर दिया था और प्राइमरी एवं सेकंडरी में मुस्लिमों के लिए उर्दू-माध्यम भी शुरू कर दिया था, और उनके पाठ्यक्रमों मुस्लिम शासकों को अच्छा जबकि हिन्दू शासकों को क्रूर एवं अत्याचारी बताया जाने लगा था. बंगाल के विभाजन को भी साम्प्रदायिक रंग दिया गया. इस तरह अंग्रेजों ने मुस्लिमों को समाज से पृथक करने में कोई कमी नहीं रखी.
  • मुस्लिम पश्चिमी और तकनीकी शिक्षा, व्यापार और अन्य कई क्षेत्रों में पिछड़े हुए एवं वंचित थे, इसलिए  उनमें साम्प्रदायिक और विभाजनकारी नीतियां पनपने लगी थी. मुस्लिमों तक पर्याप्त पश्चिमी शिक्षा भी नहीं पहुँच रही थी इस कारण वो हिन्दुओं के जितने लिब्रल/उदार नहीं हो पा रहे थे. औद्योगिकरण के आभाव में भारत में बेरोजगारी पर्याप्त थी और ब्रिटिश सरकार का रवैया भी सही नहीं था.

लीग बनाने के उद्देश्य (Objectives of the formation of league)

मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य मुस्लिमों के बीच अंग्रेजों की छवि को सुधारना था और उन्हें अंग्रेजों का सहयोग करने के लिए प्रेरित करना था. मुस्लिमों के राजनैतिक हितों की रक्षा करने के साथ ही उनकी आवश्यकताओं एवं मांगों को सरकार तक पहुंचाना था. इसके अलावा लीग बनाने के उद्देश्य ये भी था कि भारतीय मुसलमानों की ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी दीखायी जा सके. मुस्लिम लीग बनाने का सामाजिक कारण ये था कि अन्य समुदायों के प्रति मुस्लिमों में शत्रुता की भावना को दूर किया जा सके.
मुस्लिम लीग का गठन कैसे हुआ?? (How did Muslim league formed??  )                

मुस्लिम लीग का गठन अचानक से नहीं हुआ था, इसके पीछे कई वर्षों तक की क्रमिक घटनाएँ और इन पर मुस्लिम नेताओं का चिन्तन और मनन था,जिसकी परिणीती मुस्लिम लीग में हुयी. 

  • 1867 में बनारस के हिन्दुओं ने आधिकारिक भाषा में उर्दू की जगह हिंदी को जगह देने का आन्दोलन किया, इसके बाद 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के साथ ही मुस्लिमों को ये समझ ने आने लगा था कि ये पार्टी हिन्दू बहुल हैं इसमें मुस्लिम वर्ग की संख्या बेहद कम हैं.
  • सर सैयद अहमद खान का मानना था कि ब्रिटिश का चुनाव करवाने का तरीका भारत के सामाजिक ढाँचे के अनुरूप नहीं हैं क्योंकि इससे मुस्लिमों के लिए यथोचित सम्मान एवं सम्भावनाएं नहीं हैं, इसलिए जब तक मुस्लिम पार्टी बनना आवश्यक हैं. सर सैयद ने अलीगढ आंदोलन शुरू कर दिया जिसमे मुस्लिम एवं अंग्रेजों के मध्य आपसी सहयोग, मुस्लिमों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार और मुस्लिमों को समाज में यथोचित स्थान दिलवाने का उद्देश्य रखा गया. इससे कई स्कूल, कॉलेज और राजनैतिक गतिविधियाँ शुरू की गयी, मुहम्मदन एजुकेशनल कांफ्रेंस का अयोजन किया गया. उन्होंने बहुत सी किताबें जैसे असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द,लॉयल मुहम्मदन ऑफ़ इंडिया भी लिखी.
  • बंगाल के विभाजन के बाद जब मुस्लिमों को राजनैतिक लाभ मिलने की सम्भावना जगी तब हिन्दुओं ने इसका विरोध किया जिससे मुस्लिम वर्ग का विशवास कांग्रेस और हिन्दुओं पर से कम हो गया और ये ही मुस्लिम लीग बनने का सबसे बड़ा कारण साबित हुआ. उधर ब्रिटेन में 1905 में सरकार बदल गयी थी और लिब्रल पार्टी बन सत्ता में आ गयी थी. जिसके कारण भारत में राजनैतिक सुधार की स्थितियां बनी.
  • मुस्लिम नेताओं ने विचार-विर्मश करके ये तय किया कि सरकार के सामने मुस्लिमों की मांगों को रखने के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म होना चाहिए. देश के सभी हिस्सों से 35 प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने 1 अक्टूबर 1906 को शिमला में लार्ड मिंटो के सामने अपनी मांगे रखी. मिंटो ने मुस्लिमों से सहानुभूति दिखाते हुए मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया.
  • इसके बाद 1908 में सर सैयद अली इमाम के अध्यक्षता में अमृतसर में हुए सेशन में लीग ने फिर से मुस्लिम के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की , जिसे 1909 में मोर्ले-मिन्टो रिफोर्म  में  स्वीकार किया गया . इसके अतिरिक्त मुस्लिम प्रतिनिधियों ने ये मांग भी की कि वायसराय के काउंसिल में मुस्लिम उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जायेगी.
  • नवाब विकर-उल-मुल्क की अध्यक्षता में दिसम्बर 1906 को आल इंडिया मुहम्मदन एजुकेशनल कांफ्रेंस का आयोजन ढाका में हुआ, जहां आल इण्डिया मुस्लिम लीग का गठन हुआ. मीटिंग में नवाब सलीम उल्लाह खान, मौलाना जाफर अली खान, हकीम अजमल खान और मौलन मुहम्मद अली जोहर भी उपस्थित थे. सर आगा खान को इसका पहला प्रेजिडेंट चुना गया, इस तरह 30 दिसम्बर 1906  को मुस्लिम लीग का गठन हुआ था.

भारत के विभाजन से पूर्व मुस्लिम लीग (Muslim league before India’s partition)

  • 1913 में आल इण्डिया मुस्लिम लीग के उद्देश्यों में कैद-ए-आज़म के निर्देशन में परिवर्तन आये जिसमे भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त स्वशासन के पक्ष में बिना शर्त वाली नीति लागू की गई,इस परिवर्तन ने भारत में मुस्लिमों की स्थिति में ऐतिहासिक परिवर्तन किया.
  • सारे मुस्लिम इस लीग के पक्ष में नहीं थे, मौलाना मुहम्मद अली ने अपने एंटी-लीग विचारों को बताते हुए एक अंग्रेजी जर्नल कामरेड और उर्दू पेपर हमदर्द शुरू किया. उन्होंने अल-हिलाल भी शुरू किया जो उनके राष्ट्रवादी विचारों को दर्शाता था.
  • इस तरह 1906 में बनी मुस्लिम लीग ने समय के साथ अपना उद्देश्य और राजनैतिक परिदृश्य से अस्तित्व खो दिया था लेकिन 1930 में लीग के एक नेता मुहम्मद इक़बाल ने सबसे पहले एक पृथक मुस्लिम देश का प्रस्ताव रखा था और 1940 तक आते-आते मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में इस पार्टी ने काफी शक्ति हासिल कर ली थी. जिन्ना ने पहली बार पाकिस्तान की मांग की थी,जिसका इंडियन नेशनल कांग्रेस ने विरोध किया था. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस पर प्रतिबंध लग गया लेकिन लीग ने ब्रिटिश का युद्ध में समर्थन किया और 1946 में इसने सभी मुस्लिमों के वोट भी हासिल किये.

विभाजन के बाद पाकिस्तान में मुस्लिम लीग (Muslim League in Pakistan after Partition)

  • भारत के विभाजन से नए बने देश पाकिस्तान की प्रमुख पार्टी मुस्लिम लीग बन गयी, लेकिन 1953 तक पार्टी के विभिन्न मतभेदों के चलते इससे कई राजनैतिक पार्टियों का उदय हो गया. वास्तव में विभाजन के बाद आल इंडिया मुस्लिम लीग बंट गयी थी, अगले कुछ महीनों तक मुहम्मद अली जिन्ना जो पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे, उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तान में मुस्लिम लीग एवं पूर्वी पाकिस्तान में दी आल पाकिस्तानी आवामी मुस्लिम लीग का नेतृत्व किया था.
  • 1958 से लेकर 1962 तक मुहम्मद अयूब खान के नेतृत्व में मार्शल लॉ लगा हुआ था तब लीग का आधिकारिक रूप से भंग हो चुकी थी लेकिन बाद में लीग का पुनर्गठन हुआ और इससे 2 भाग बनकर निकले जिसमे एक कन्वेंशन मुस्लिम लीग और दूसरा काउंसिल मुस्लिम लीग था. अयूब खान ने 1969 में जब इस्तीफा दे दिया तब कन्वेंशन मुस्लिम लीग भंग हो गयी. काउंसिल मुस्लिम लीग जिसके कारण पाकिस्तान अस्तित्व में आया था वो भी 1970 तक राजनैतिक परिदृश्य से गायब हो गयी.
  • 1985 में बहुत सी राजनैतिक पार्टियों पर प्रतिबन्ध होने के कारण कुछ पार्टियों ने पाकिस्तान मुस्लिम लीग नाम का उपयोग किया लेकिन वास्तव में इनका मुस्लिम लीग से कोई ख़ास नाता नहीं था.
  • इस तरह मुस्लिम लीग ने पहले 6 पाकिस्तानी प्रधानमंत्री दिए थे लेकिन जनरल अयूब खान के मार्शल लॉ लगाने के बाद के दशकों में इस पार्टी ने वहां विभाजन, पुनर्गठन और वापिस विभाजन के जैसे कई दौर देखे.

पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश में मुस्लिम लीग (Muslim league in East Pakistan/Bangladesh)

पूर्वी पाकिस्तान में मुस्लिम लीग ने बंगाली राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया और इसके कारण ही इसे पंजाब प्रभावित पश्चिमी पाकिस्तान से मुक्ति मिली, शेख़ मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में पूर्वी पाकिस्तान पश्चिमी पाकिस्तान से अलग हुआ.

स्वतंत्र भारत में मुस्लिम लीग (Muslim league in Free Imdia)

  • स्वतंत्र भारत में इन्डियन यूनियन मुस्लिम लीग ने आल इंडिया मुस्लिम लीग को आगे बढ़ाया. वास्तव में भारत में मुस्लिम लीग एक माइनर पार्टी बन गयी थी और 1988 तक विभिन्न समूहों में बंट गयी थी जिसमे सबसे महत्वपूर्ण इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) था.
  • आईयूएमएल ने भारत के संविधान के अंतर्गत चुनाव लड़े और कम संख्या में ही थे लेकिन लोकसभा में अपनी उपस्थिति बनाये रखी. आईयूएमएल केरल में सबसे ज्यादा प्रभावशाली हैं और इसकी एक यूनिट तमिलनाडु में हैं. चुनाव आयोग द्वारा इसे केरल में एक राज्य पार्टी के रूप में दर्जा दिया गया हैं.
  • आईयूएमएल की तरफ से प्रत्येक लोकसभा में 2 एमपी होते रहे हैं लेकिन तीसरी लोकसभा में इसका कोई प्रतिनिधि नहीं था और चौथी में इसके 3 एमपी थे, इसके नेता बिपोकर पहली लोकसभा के सदस्य थे जो कि मद्रास स्टेट मुस्लिम लीग पार्टी का प्रतिनीधित्व कर रहे थे. आईयुएमएल कांग्रेस के साथ ही गठबंधन बनाती आई हैं और ये केरला में विपक्ष के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का हिस्सा हैं.

            इस तरह मुस्लिम लीग की स्थापना का उद्देश्य ब्रिटिश भारत में भारतीय मुस्लिमों के हितों की रक्षा करना था, लेकिन समय के साथ इस लीग ने ना केवल अपने उद्देश्यों और नेतृत्व में कई परिवर्तन देखे बल्कि एक समय के बाद भारत के विभाजन के बाद इसकी रूपरेखा ही बदल गयी और हर देश में मुल्सिम लीग ने एक नया रूप लिया.

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