मीर जाफ़र का जीवन परिचय  | Mir Jafar Biography in Hindi

मीर जाफ़र का जीवन परिचय  (Mir Jafar Biography in Hindi)

भारत में  अंग्रेजों के लिए सत्ता हासिल करना कभी भी आसान नहीं हो सकता था यदि देश को मीर जाफ़र जैसे लोग न मिले होते. मीर जाफ़र को गद्दारी का पर्याय माना जाता हैं इसलिए आज भी धोखेबाज या छल-कपट करने वाले धूर्तों के लिए मीर जाफ़र शब्द का प्रयोग किया जाता हैं लेकिन जाफ़र की पहचान गद्दार की ही नहीं हैं वो एक नवाब भी था और उसने कुछ अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी किए थे. जिसके कारण उसे शुजा उल-मुल्क, हाशिम उद-दुल्ला,नवाब जाफत अली खान बहादुर, महाबत जंग जैसी उपाधियाँ मिली थी. 

Mir Jafar

क्र. म.(s.No.) परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1.    पूरा नाम ((Full Name) मीर जाफर अली खान
2.    जन्म दिन (Birth Date) 1691
3.    जन्म स्थान (Birth Place) बंगाल
4.    पेशा (Profession) बख्शी और नवाब
5.    राजनीतिक पार्टी (Political Party)  –
6.    अन्य राजनीतिक पार्टी से संबंध (Other Political Affiliations)
7.    राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
8.    उम्र (Age) 74 वर्ष
9.    गृहनगर (Hometown) मुर्शिदाबाद
10.           धर्म (Religion) इस्लाम
11.           जाति (Caste)
12.           वैवाहिक स्थिति (Marital Status) विवाहित
13.           राशि (Zodiac Sign)
14.           मृत्यु (Death) 17 जनवरी 1765

 परिवार और निजी जानकारी  (Mir Jafar: Family and personal information)

  • मीर जाफर मूलत: अरब का था. हज़रत मुहम्मद के पुत्र हजरत अली जो कि पहले खलीफा थे,मीर जाफर उस पीढ़ी की 30वें वंश में जन्मा था. मीर जाफर के दादा का नाम सैय्यद हुसैन नजफ़ था जो कि हजरत अली के संरक्षक थे,उनका पुत्र ही हुसैन अहमद नजाफी था.
  • 1667 में जब औरंगजेब मक्का गया तो वो हुसैन अहमद नाजाफी से मिला और उसके ज्ञान एवं व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि नाजाफी को अपने साथ भारत ले आया और उसे दिल्ली में काजी-ए-कोअजुद (KAzi-a-Koajud) मतलब शाही दरबार में मुख्य न्यायाधीश बना दिया.
  • अहमद नजाफी ने औरंगजेब के बड़े भाई दारा की बेटी से विवाह किया और उनका पुत्र ही मीर जाफर था. दारा की पत्नी चित्तोड़ के राणा जसवंत सिंह की बेटी थी.
  • विवाह: मीर जाफर ने सबसे पहले मुर्शिदाबाद में नवाब अलीवर्दी खान की सौतेली बहिन और शाह कुली खान उर्फ़ मिर्ज़ा मुहम्मद मदानी की बेटी शाह खानुम साहिबा से 1727 में विवाह किया. 1779 में जफ़रगंज महल में साहिबा का देहांत हो गया और अगस्त 1779 में उसे मुर्शिदाबाद में दफनाया गया. इसके बाद मीर जाफर ने एच.एच. बाबू बेगम साहिबा (गद्दीनशीन बेगम) से विवाह किया, जिसकी मृत्यु 1809 में मुर्शिदाबाद में हुयी और उसे जफ़रगंज में दफनाया गया. मीर जाफर ने तीसरा विवाह 1746 में मुन्नी बेगम साहिबा से किया जो कि पेशे से नर्तकी थी, उसकी मृत्यु 10 जनवरी 1813 में हुयी और उसे भी जफरगंज में ही दफनाया गया. 
पिता (Father) सेय्यद अहमद नाजाफी
माता (Mother) शाह खानुम साहिबा
भाई (Brother) मीर काज़म खान
पुत्र (Son) मीरान

मीर जाफर : राजनैतिक करियर की शुरुआत (Mir Jafar: Early life in Politics)

अलीवर्दी ने मीर जाफर को बख्शी नाम का वो पद दिया, जो नवाब के तुरंत बाद माना जाता था. जाफर अली ने 1741 में अलीवर्दी के रिश्तेदार शौकत अली को कटक के युद्ध में बचाया था फिर  14 दिसम्बर 1746 को मराठों को हराकर थोडा सम्मान हासिल किया था लेकिन फरवरी 1747 में  मेदेनिपुर में मराठों के सामने से डरकर भाग गया था. इसके बाद जल्द ही उसने अलवर्दी खान को हटाने के लिए राजमहल के फौजदार अतौल्लाह के साथ साजिश की, लेकिन वो सफल नहीं हो सकी.

मीरजाफ़र: षड्यंत्रकारी और गद्दी की महत्वकांक्षा

  • सिराजुदोल्लाह ने जब सत्ता संभाली तब मीर जाफर ने षड्यंत्रकारी नीतियों पर काम करना शुरू करना दिया. सिराज पहले से परिवार वालों के षड्यंत्र से परेशान था, उसका ध्यान इस तरफ नही गया. वैसे भी मीर ने अलवर्दी खान के मरते ही शौकतजंग को बंगाल में घुसने के लिए एक गुप्त पत्र भेज दिया,और साथ ही ये आश्वसान भी दिया कि वो उनकी मदद करेगा, साथ ही मुर्शिदाबाद और सेना से भी जो मदद मिल सकेगी वो उपलब्ध करवाएगा. इस तरह उसने दिल्ली के शाही दरबार में शौकत जंग को 3 पूर्वी सूबा देने के फरमान दिलवाने की साजिश रची.
  • लेकिन उसकी साजिश नाकामयाब रही क्योंकि सिराज ने मीर जाफर को हटाकर मीर मदन को बख्शी बना दिया. जगत सेठ, पूर्व दीवान राय दुर्लभ और मीर जाफर ने नवाब को गद्दी से उखड फैकने के लिए अंग्रेजों से हाथ मिला लिया.
  • जाफर लार्ड क्लाइव का विश्वसनीय था, उसने 1756 में कुछ यूरोपियन महिलाओं को अपने घर में छुपाकर उन्हें सिराज से बचाया था, और रात में अपने विश्वसनीय मिर्ज़ा आमिर बेग के साथ अपनी विशेष नाव देकर उन्हें वहां से भेजा था. जिस कारण ही मीर जाफर और अंग्रेजों के मध्य दोस्ती इतनी गहन हुयी थी.
  • अप्रैल 1757 के अंत में अंग्रेजों ने इन षड्यंत्रकारियों से सहयोग का वादा लिया और 1 मई को कलकता काउंसिल मीर जाफर के साथ गुप्त संधि के लिए तैयार हो गयी. इस संधि के अंतर्गत जीत मिलने पर जाफर को गद्दी पर बैठाने की बात तय हुयी. इसके बाद जब अंग्रेजों ने सिराज को हटाने की कोशिश की तो मीर ने उनका साथ दिया और ऐसी साजिश की कि अंग्रेजों को भारत में पैर जमाने का मौका मिल गया.
  • कासिम बाज़ार में अंग्रेजों के फैक्ट्री के मालिक विलियम वाट ने अपनी दूरदर्शिता और डिप्लोमेटिक नीति के साथ साहस दिखाते हुए ये साजिश रची थी. इसे अंग्रेजों का साहस इसलिए कहा सकते हैं क्योंकि तब अंग्रेज बहुत कम संख्या में नवाब के क्षेत्र में उससके आगे झुके हुए काम कर रहे थे, यदि उन्हें नवाब के पक्ष से मदद ना मिलती तो सम्भव ही नहीं था कि वो कभी युद्ध करने की सोच भी पाते. 5 जून 1757 को विलियम वाट ने मीर जाफर के साथ सहयोग की शपथ ली.

मीर जाफर: प्लासी का युद्ध (Mir Jafar: Battel of Plassey)

  • प्लासी के युद्ध में निर्णायक घड़ी तब आई जब युद्ध चरम पर था. सिराज के विश्वसनीय योद्धा मीर मदन के घायल हो जाने पर मीर जाफर से मदद मांगी और ये उम्मीद की कि वो ऐसी कठिन परिस्थितयों में वफादारी दिखाएगा. मीर जाफर ने भी नवाब की उम्मीदों को मजबूती देते हुए पाक कुरआन की कसम खायी कि वो अंग्रेजों से युद्ध करेगा. उसने नवाब को इस बात के लिए मना लिया कि वो युद्ध का मैदान छोडकर मुर्शिदाबाद चले जाए वो पीछे से अंग्रेजों को सम्भाल लेगा और सुबह होते ही उन पर आक्रमण कर देगा. लेकिन ये सब जाफर का छल था, नवाब से बात करने के तुरंत बाद उसने रोबर्ट क्लाइव को पत्र भेजा कि नवाब अभी बुरी स्थिति में हैं ऐसे में उनके लिए सही मौका हैं कि वो कैंप पर आक्रमण कर दे,
  • इधर मीर जाफर की सलाह से नवाब ने सेना भंग कर दी और मुर्शिदाबाद की तरफ रवाना होने के लिए तैयारी करने लगा, लेकिन क्लाइव उनकी तरफ बढने लगा. जबकि मीर जाफर, दुर्लभराम और यार लतीफ़ ने उस पूरे दिन के लिए हथियार डाल दिए और एक गोली नहीं चलाई, इस तरह वो अंग्रेजों को आगे बढने में मदद कर रहे थे, और अंत में क्लाइव की सेना ना केवल टेंट तक पहुँच गयी बल्कि युध्द भी जीत लिया.
  • नवाब की सेना भ्रमित थी इसलिए क्लाइव की सेना के आगे टीक नही सकी, उनका नवाब भी भाग निकला. नवाब को मीर जाफर के बेटे मिरान के आदेश पर मुहम्मदी बेग ने पकड़कर मार दिया.

मीर जाफर: नवाब (Mir Jafar as Nawab)

  • 29 जून को सिराजुद्दोलाह के हिराझिल महल में क्लाइव ने मीर जाफर को बहुत से जमीदार और दरबारियों की उपस्थिति में बंगाल, बिहार और उड़ीसा का नवाब मानते हुए सलाम एवं सम्मान किया.
  • मीर जाफर के नवाब बनने पर कम्पनी को इनाम के तौर पर बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुफ्त में व्यापार करने की अनुमति मिली साथ ही कलकता के पास 24 परगने की जमीदारी भी दी गयी. ईस्ट इंडिया कम्पनी का इतिहास जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
  • सिराजुदोल्लाह के कलकता में आक्रमण के कारण कम्पनी को हुए नुक्सान की भरपाई के लिए मीर जाफर ने 17,700,000 रूपये भी दिए. इसके साथ ही उसने कम्पनी के उच्च अधिकारीयों को महंगे तोहफे भी दिए. इस तरह ब्रिटिश अधिकारियों और व्यापारियों से किसी भी तरह के टैक्स हटाने के अतिरिक्त उन्हें इतनी सुविधाए दी गयी कि अंग्रेजों के लिए भविष्य में बंगाल पर शासन करने के सारे रास्ते खुल गए.
  • मीर जाफर और कम्पनी की दोस्ती बहुत समय तक चलती उससे पहले ही जाफर को समझ आ गया कि वो कम्पनी की हर इच्छा को पूरी नहीं कर सकता क्योंकि उन्होंने ना केवल मांगे बढ़ा दी थी बल्कि मांग पूरी न होने पर वो नवाब की बुराई भी करने लगे थे. इस कारण अक्टूबर 1760 में कम्पनी ने मीर जाफर पर दबाव बनाया कि वो अपने दामाद मीर कासिम को सत्ता सौंप दे, और कासिम नवाब बन गया. लेकिन मीर कासिम के तेवर को देखते हुए जल्द ही कम्पनी ने 1763 में वापिस मीर जफर को नवाब बना दिया.

मीर जाफ़र की मृत्यु और धरोहर ( Mir Zafar: Death and Legacy)

1765 में अपनी मृत्यु तक मीर जाफर गद्दी पर रहा. मीर जाफर ने जाफरगंज में एक महल बनवाया,हालांकि आज इस महल के बड़े से दरवाजे (देहरी) के अलावा कुछ नहीं बचा हैं. प्लासी के युद्ध के बाद मिरान ने सिराजुदोल्लाह को महल के एक कमरे में मारा था,इसलिए इसे नमकहराम देहरी (ट्रेटर्स गेट) भी कहते हैं.

Other Links:

  1. हल्दीघाटी का युद्ध 
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