महाराणा प्रताप का जीवन परिचय | Maharana Pratap Biography in Hindi

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय (Maharana Pratap Biography in Hindi)

“माई ऐडा पूत जण जैडा राणा प्रताप”

राजस्थान में प्रचलित इस कहावत में हर जननी से महाराणा प्रताप जैसे पुत्रों को जन्म देने का आह्वान किया गया हैं, इसके पीछे राणा की वीरता और साहसी जीवन ही प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत हैं, और मेवाड़ी हो या राजस्थानी या कोई भारतीय, सबको प्रताप जैसे वीरों पर गर्व हैं. प्रताप का जीवन राजस्थान के गौरवशाली इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखा गया वो अध्याय हैं जिसकी आभा सदियों तक आम-जन को प्रेरित करती रहेगी.    

Maharana Pratap

क्र. म.(s.No.) परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1.    पूरा नाम ((Full Name) महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया
2.    जन्म दिन (Birth Date) 9 मई 1540
3.    जन्म स्थान (Birth Place) कुम्भलगढ़ किला,राजस्थान
4.    पेशा (Profession) उदयपुर और पुरे मेवाड़ के राजा
5.    राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
6.    उम्र (Age) 56 वर्ष
7.    गृहनगर (Hometown) मेवाड़
8.    धर्म (Religion) हिन्दू
9.    जाति (Caste) राजपूत
10.           वैवाहिक स्थिति (Marital Status) विवाहित
11.           राशि (Zodiac Sign) वृषभ
12.           मृत्यु (Death) 19 जनवरी 1597

  प्रारम्भिक जीवन और बचपन (Early Life and Childhood)

  • प्रताप का जन्म भारतीय तिथि के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल की तृतीय को हुआ था , इस कारण आज भी प्रतिवर्ष इस दिन महाराणा प्रताप का जन्म दिन मनाया जाता हैं. राणा उदय सिंह द्वितीय के 33 बच्चे थे, जिनमें प्रताप सिंह सबसे बड़े पुत्र थे, प्रताप बचपन से ही स्वाभिमानी और देशभक्त थे, साथ ही वो बहादुर और संवेदनशील भी थे. उन्हें खेलों और हथियार के प्रशिक्षण में रूचि थी.
  • वास्तव में प्रताप को मेवाड़ के प्रति अपनी जिम्मेदारी की समझ बहुत जल्द आ गयी थी, इस कारण बहुत कम उम्र में ही उन्होंने हथियार, घुड़सवारी, युद्ध का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया. वो सभी राजकुमारों में सबसे ज्यादा प्रतिभावान और बलशाली राजकुमार थे. महाराणा प्रताप जयमल मेडतिया के शिष्य थे, जो बहुत वीर था, जब बहलोल खान जयमल को युद्ध के ललकारा तो उन्होंने खान के घोड़े के साथ उसके दो टुकड़े कर दिए.
  • 1567 में चित्तोड़ को अकबर की मुगल सेना ने चित्तोड़ को सब तरफ से घेर लिया था, ऐसे में मुगलों में हाथों में पड़ने की जगह महाराणा उदय सिंह ने अपने परिवार के साथ गोगुंदा जाने का निश्चय किया, हालांकि उस समय भी राजकुमार प्रताप वही रहकर युद्ध करना चाहते थे लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियां होने के कारण उन्हें अपने परिवार के साथ गोगुंदा जाना पड़ा. उदय सिंह और उनके मंत्रियों ने गोगुंदा में ही अस्थायी शासन शुरू किया.

निजी जानकारी और परिवार

महाराणा के 11 पत्नियाँ थी जिनमे उनकी पहली और प्रिय पत्नी महारानी अजबदे पंवार थी, उनके 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ थी. 

पिता उदय सिंह द्वितीय
माता महारानी जैवंता बाई
दादा राणा सांगा
दादी रानी कर्णावती
चाचा/ताऊ (अंकल) भोज राजा
चाची/ताई मीरा बाई
भाई जगमाल सिंह,मीर शक्ति सिंह, कुंवर विक्रम्देवा, सागर सिंह
बहिनें चाँद कंवर, माँ कंवर
पत्नियाँ अजबदे पंवार, अम्बाबाई राठौड़, रत्नावतीबाई परमार, जसोबाई चौहान, फूलबाई राठौड़, शाह्मतीबाई हाडा, चम्पाबाई, खीचर आशा बाई, आलाम्दे बाई चौहान, लाख बाई, सोलन्खीनीपुर बाई
पुत्र अमर सिंह, साहसमल, कुंवर दुर्जन सिंह, शेख सिंह, कुंवर पूरणमल, कुंवर हठीसिंह, कुंवर जसवंत सिंह, कुंवर कल्याण दास, कुंवर माल सिंह, कुंवर नाथ सिंह, कुंवर सनवाल दस्ल सिंह,कुंवर रैभाना सिंह, चंदा सिंह, कुंवर गोपाल,भगवान दास,कुंवर राम सिंह
पुत्री चम्पा (बाकि चार के नाम ज्ञात नहीं है)

कुंवर प्रताप से महाराणा प्रताप तक का सफर  

उदय सिंह ने मरने से पहले अपनी सबसे छोटी रानी के पुत्र जगमल को राजा नियुक्त किया और प्रताप ने सबसे बड़ा और योग्य पुत्र होते हुए भी ये स्वीकार  कर लिया, लेकिन मंत्री इस बात से सहमत नहीं हुए क्योंकि जगमल  में राजा बनने के गुण नहीं थे. 1572 में उदय सिंह की मृत्यु हो गयी. इसलिए सबने मिलकर ये निर्णय दिया कि सत्ता महाराणा प्रताप को दी जायेगी, महाराणा प्रताप सिंह ने भी उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए गद्दी सम्भाल ली, इस कारण जगमल को क्रोध आ गया और वो अकबर की सेना में शामिल होने के लिए अजमेर के लिए रवाना हो गया और अकबर की मदद के बदले जहाजपुर की जागीर हासिल करना ही उसकी मंशा थी.

महाराणा प्रताप और अकबर   

  • महाराणा प्रताप के समय अकबर दिल्ली का शासक था, उसकी रणनीति थी कि वो हिन्दू राजाओं की शक्ति को अपने अधीन करके उन पर शासन करता था. इसी क्रम में युद्ध को नजरअंदाज करते हुए बहुत से राजपूतों ने युद्ध की जगह अपनी बेटियों के डोले अकबर के हरम में भेज दिए जिससे कि संधि हो सके, लेकिन मेवाड़ ऐसा राज्य नहीं था, यहाँ अकबर को काफी संघर्ष करना पड़ा.
  • उदयसिंह के समय राजपूतों ने जब चित्तोड़ छोड़ दिया था तो मुगलों ने शहर पर कब्जा कर लिया हालांकि वो पूरे मेवाड़ को हासिल करने में नाकाम रहे और अकबर पूरे हिन्दुस्तान पर शासन करना चाहता था इसलिए पूरा मेवाड़ उसका लक्ष्य था.
  • केवल 1573 में ही अकबर ने 6 बार द्विअर्थी प्रस्ताव भेजे लेकिन प्रताप ने सबको अस्वीकार कर दिया, अकबर के पांच बार संधि वार्ता भेजने के बाद प्रताप ने अपने बेटे अमर सिंह को अकबर के दरबार में संधि अस्वीकार करने के लिए भेजा, इसके बाद सबसे अंतिम प्रस्ताव अकबर के बहनोई मान सिंह लेकर आये थे और अंतिम बार भी संधि प्रस्ताव के नही मानने से अकबर बेहद क्रोधित हुआ और उसने मेवाड़ पर हमला कर दिया.
  • वैसे कहा जाता हैं कि अकबर ने राणा प्रताप से ये तक कहा था कि वो यदि अकबर से संधि कर ले तो अकबर प्रताप को आधा हिंदुस्तान दे देगा लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया.

हल्दीघाटी का युद्ध

  • 1576 में अकबर ने राजपूत सेनापति मानसिंह प्रथम और असफ खान को प्रताप पर आक्रमण करने के लिए भेजा, जबकि प्रताप ने ग्वालियर के राम शाह तंवर और उनके तीन पुत्र रावत कृष्णादासजी चुडावत, मानसिंह झाला और चन्द्र सेनजी राठौड़ और अफगान से हाकिम खान सुर के अलावा भील समुदाय के मुखिया राव पूंजा की मदद से एक छोटी सी सेना गठित की. मुगल सेना में जहां 80,000 सैनिक थे वहीं राजपूत सेना मात्र 20,000 सैनिकों की थी.
  • इस तरह उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर हल्दीघाटी में युद्ध सम्मुख युद्ध शुरू हुआ. यह युध्द 18 जून 1576 को 4 घंटे के लिए हुआ, मुगल सेना को प्रताप के भाई शक्ति सिंह ने गुप्त मार्ग बता दिया,जिससे ,मुगलों को आक्रमण की दिशा मिल गयी.
  • मुगल सेना के घुड़सवारों का नेतृत्व मानसिंह प्रथम कर रहे थे, प्रताप ने मान सिंह का सामना खुद करने का निश्चय किया और अपना घोडा उनके सामने ले गए लेकिन चेतक और प्रताप दोनों मानसिंह के हाथी से घायल हो गए. इसके बाद मानसिंह झाला ने अपना कवच प्रताप से बदल लिया था जिससे कि मुगल सेना में भ्रम पैदा हो सके,और राणा प्रताप बचकर निकल सके.
  • हल्दी घाटी के युद्ध के बाद अरावली के कुछ हिस्सों को छोडकर पूरा मेवाड़ मुगलों के हाथ में चला गया लेकिन मुगल प्रताप को पकडकर या मरने में सफल रहे. कुम्भलगढ़ किले का इतिहास जानने के लिए यहाँ क्लिक करें 
  • जुलाई 1576 में प्रताप ने गोगुंदा को मुगलों से वापिस कब्जे में ले लिया और कुम्भलगढ़ को अपनी अस्थायी राजधानी बनाया, लेकिन अकबर ने खुद प्रताप पर चढाई कर दी और गोगुन्दा, उदयपुर एवं कुम्भलगढ़ पर कब्जा कर लिया जिससे महाराणा वापिस पहाड़ों में लौटने को मजबूर हो गये.
  • लेकिन महाराणा ने वापिस अपना राज्य हासिल करने के लिए संघर्ष जारी रखा और अगले कुछ वर्षों में कुम्भलगढ़ एवं चित्तोड़ में अपनी खोयी हुयी सम्पति को वापिस कब्जे में ले लिया और साथ ही गोगुन्दा,रणथम्भोर और उदयपुर को भी छीन लिया.
  • जब महाराणा प्रताप ने अकबर के सामने झुकने से मना कर दिया तब अकबर ने युद्ध की घोषणा कर दी. महाराणा ने अपनी राजधानी चित्तोड़ से हटाकर अरावली की पहाड़ियों में कुम्भलगढ़ ले गए, जहां उन्होंने आदिवासियों और जनजातियों को सेना में शामिल करना शुरू किया. इन लोगों को युद्ध का कोई अनुभव नहीं था, महाराणा ने उन्हें प्रशिक्षण दिया, इस तरह उन्होंने समाज के दो वर्गों को एक उद्देश्य के लिए एक दिशा में लाने का प्रयास किया.
  • 1579 के बाद अकबर की बंगाल,बिहार और पंजाब पर ध्यान होने के कारण मेवाड़ पर पकड ढीली होने लगी, इस परिस्थिति का फायदा उठाकर प्रताप ने दान शिरोमणि भामाशाह के दान किये धन से कुम्भलगढ़ और चित्तोड़ के आस-पास के क्षेत्र पर वापिस कब्जा कर लिया, उन्होंने 40,000 की सेना एकत्र करके गोगुंदा,कुम्भलगढ़, रणथम्भोर और उदयपुर को भी मुगलों से मुक्त करवा लिया.
  • 6 महीने बाद अकबर ने फिर से हमला किया लेकिन फिर से उसे मुंह की खानी पड़ी और आखिर में अकबर ने 1584 में जगन्नाथ को बड़ी सेना के साथ मेवाड़ भेजा लेकिन 2 वर्ष के संघर्ष के बाद भी वह राणा प्रताप को नही पकड सका. 
  • इस तरह हल्दीघाटी का युद्ध हो या इसके पश्चात के छोटे-बड़े सम्मुख/गुरिल्ला युद्ध दोनों पक्षों ने कभी हार नहीं स्वीकार की, और इन सबमें राष्ट्र के लिए जो आज भी गौरव का विषय हैं वो राणा प्रताप का निरंतर संघर्ष और मेवाड़ को मुक्त करवाने की जिजीविषा हैं,जो उनकी मृत्यु तक उनके साथ थी.

महाराणा प्रताप और चेतक

  • प्रताप के विश्वसनीय घोड़े का नाम चेतक था, जो कि 11 फीट लम्बा था. चेतक पर नीले रंग का निशान था इसलिए राणा प्रताप को “नीले घोड़े रा असवार: कहा जाता हैं,जिसका मतलब “नीले घोड़ी की सवारी करने वाला” होता हैं.
  • हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह के साथ युद्ध करते हुए महाराणा प्रताप और उनका घोडा घायल हो गया था, फिर भी 26 फीट चौड़ी नदी पार करने उसने अपने मालिक का सहयोग किया था,लेकिन इसके बाद वो ज्यादा जीवित नहीं रह सका. चेतक ने अपनी जान देकर भी अपने मालिक की जान बचाई थी, महाराणा चेतक की मृत्यु पर बच्चे के जैसे रोये थे. चेतक की मृत्यु के बाद ही शक्ति सिंह को अपनी गलती का एहसास हुआ था और उसने अपन घोडा प्रताप को दे दिया.
  • प्रताप चेतक को नहीं भूल सके थे, और बाद में उन्होंने उस जगह पर एक उद्यान बनवाया, जहां पर चेतक ने अंतिम सांस ली थी.

महाराणा प्रताप का वनों-कंदराओं में संघर्ष

  • प्रताप की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि उनके पास ना पर्याप्त धन था ना सैनिक थे, इसलिए धन के अभाव में ही सैनिकों की व्यवस्था करना एक चुनौती थी. अकबर के पास विशाल सेना थी लेकिन प्रताप ने किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटने की ठान रखी थी इसीलिए उन्होंने हर चुनौती का सामना किया, अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करवाना ही उनका उद्देश्य था. उन्होंने अपने साथ सभी मंत्री की बैठक बुलाई और उनके सामने ये शपथ ली कि वो जब तक मेवाड़ को स्वतंत्र नही करवा लेते तब तक सोने और चांदी की थाली में खाना नहीं खायेंगे, नर्म गद्दों पर नही सोयेंगे और महलों में नहीं रहेंगे. वो घास की पत्तियों पर खाना खायेंगे, जमीन पर सोयेंगे और झोपडी में अपना जीवन बिताएंगे, और जब तक चित्तोड़ स्वतंत्र नहीं हो जाता तब तक दाढ़ी भी नहीं बनायेंगे. उन्होंने अपने वीर साथियों से सहयोग के लिए अपील की और इसका उन सभी पर बहुत प्रभाव पड़ा, सबने एक स्वर में रक्त की अंतिम बूंद तक प्रताप का सहयोग करने का आश्वासन दिया, और कहा कि राणा के संकेत मात्र से वो मातृभूमि के चरणों में अपना जीवन अर्पण करने को तैयार हैं. इस तरह प्रताप ने घास की रोटी खाने और घास पर ही सोने की जो दृढ-प्रतिज्ञा की थी, वो उन्होंने मृत्यु पर्यन्त निभायी. उनके सम्मान में आज भी राजपूत वंश के लोग अपने खाने की थाली के नीचे एक पत्ती रखते हैं और बिस्तर के नीचे घास का तिनका रखकर सोते हैं.
  • संघर्ष के दिनों में महाराणा प्रताप जब जंगल, पहाड़ों और घाटियों में भटक रहे थे तब उन पर सदा दुश्मनों के आक्रमण का खतरा बना रहता था, ना खाने को पर्याप्त भोजन मिलता था ना सोने की कोई सुविधा थी. ऐसे ही एक बार महारानी जब भाकरी (रोटी) बन रही थी, उन्होंने अपनी बेटी को आवाज़ दी लेकिन तभी वहां एक बिल्ली आई और वो रोटी लेकर भाग गयी, एक रोटी भी अपने बच्चे के नसीब में नहीं देखकर प्रताप बेहद दुखी और काफी निराश हुए. उन्होंने तुरंत अकबर से संधि करने का सोचा और तभी पृथ्वीराज नाम के कवि ने राजस्थानी भाषा में एक कविता लिखी, जो इतिहास में कालजयी सिद्ध हुयी, क्योंकि इस कविता ने राणा प्रताप को प्रेरित किया था, इसके कारण प्रताप ने तुरंत समर्पण और संधि विचार छोड़कर अपनी सेना को मजबूत करना शुरू किया

महाराणा प्रताप और भामाशाह

महाराणा प्रताप के जीवन को पढ़ते हुए दानवीर भामाशाह को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. भामाशाह को जब पता चला कि उनके राजा प्रताप वनों में भटक रहे हैं तब उन्होंने अपनी सारी सम्पति, धन और सब कुछ समर्पित कर दिया, जिसके कारण महाराणा प्रताप को 12 वर्षों तक 25,000 की सेना सम्भाल सके. प्रताप ने पहले तो धन-राशि स्वीकार करने से मना कर दिया लेकिन लगातार आग्रह के कारण जब वो मान गए तो और बहुत से जागीदार आगे आये. प्रताप ने सारे धन का उपयोग सेना के लिए किया और चित्तौड़ को मुगलों से मुक्त करवाने की कोशिश की.

महाराणा प्रताप से जुडी अन्य रोचक जानकारियाँ

  • एक बार राजा मान सिंह शिकार पर थे तब प्रताप के सैनिकों को वो दिख गये, उनके लिए ये बहुत आसान था कि वो उन्हें बंदी बना ले, लेकिन महाराणा प्रताप ने कहा कि वो शत्रु का सामना केवल रण-क्षेत्र में करना पसंद करते हैं, इससे पता चलता हैं कि प्रताप एक सच्चे योद्धा थे.
  • एक बार युद्ध में विजय के बाद अमर सिंह कुछ मुस्लिम महिलाओं को बंदी बनाकर ले आये, तो प्रताप उन पर बेहद क्रोधित हुए और सम्मान के साथ महिलाओं को घर भेजा.
  • ऐतिहासिक रिकार्ड्स के अनुसार प्रताप 7 फीट 5 इंच लम्बे थे और उनका वजन लगभग 110 किलो था जबकि वो युद्ध में कुल 360 किलो का भार लेकर चलते थे जिसमें 208 किलो की 2 तलवारें और 72 किलो का कवच होता था.
  • जब महाराणा प्रताप के शत्रुओं ने मेवाड़ को चारों तरफ से घेर लिया, तब ही महाराणा प्रताप के दो भाई शक्ति सिंह और जगमल अकबर के खेमे में जाकर शामिल हो गए, लेकिन प्रताप ने आजीवन अकबर के आगे समर्पण नही किया.
  • अब्राहम लिंकन ने बुक ऑफ़ प्रेजिडेंट में लिखा हैं कि वो जब भारत आने वाले थे, तब उन्होंने अपनी माँ से पुछा था कि वो भारत से क्या लाये, तो उनकी माँ ने कहा कि वो उस हल्दीघाटी की माटी लेकर आये, जहां के राजा ने अपनी प्रजा और मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया था.

महाराणा प्रताप की मृत्यु

  • विभिन्न युद्ध और वनों में जीवनयापन करते हुए प्रताप ने कई दुर्घटनाएं देखी थी, जिनके कारण उन्हें काफी घाव भी लगे थे, और उनकी मृत्यु राजस्थान के चावंड में हुयी थी. कहा जाता हैं कि अकबर प्रताप की वीरता का इतना बड़ा प्रशंसक था कि जब उसे प्रताप की मृत्यु का पता चला तो वो रोने लगा.
  • प्रताप के बाद पुत्र अमर सिंह ने उनका सिंहासन संभाला, प्रताप ने मरते वक्त अपने पुत्र से ये कहा था कि कभी भी मुगलों के सामने घुटने ना टेकना और चित्तोड़ वापिस हासिल करना, लेकिन 1614 में उनके बेटे ने अकबर के बेटे जहांगीर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था.
  • मेवाड़ राणा प्रताप के बलिदान को कभी भुला नही सका, आज भी उदयपुर के म्यूजियम में उनके 2 भारी तलवार और भाले सुरक्षित रखे गये हैं.

           राजस्थान में प्रताप की वीरता की कहानियां आज भी आम-जन को प्रेरित करती हैं, क्योंकि वो एक कुशल प्रशासक, प्रजा-प्रिय और समाज के पिछड़े किन्तु वीर वर्ग को सम्मान दिलाने वाले राजा थे. 

                     “जो दृढ राखे धर्म को, तिही राखे करतार”

Other Links:

  1. अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का इतिहास
  2. नितिन गडकरी का जीवन परिचय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *