मदन मोहन मालवीय  का जीवन परिचय | Madan Mohan Malviya Biography in Hindi

मदन मोहन मालवीय  का जीवन परिचय (Madan Mohan Malviya Biography in HIndi)

मदन मोहन मालवीय जी ने भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रेसिडेंट भी रहे थे,और उनका महत्वपूर्ण कार्य बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना करना था. भारत में स्काउटिंग की शुरुआत उन्होंने ही की थी.

मदन मोहन मालवीय

जन्म और पारिवारिक जानकारी (Birth and Family Details)

नाम (Name)मदनमोहन मालवीय
जन्म दिन (Birth date)25 दिसम्बर 1861
जन्मस्थान (Birth place)इलाहबाद,उत्तर प्रदेश
माता (Mother)मून देवी
पिता (Father)बृजनाथ
जाति (Cast)चतुर्वेदी (ब्राह्मिण)
धर्म (Religion) हिन्दू
पेशा (Occupation)जर्नलिस्ट,लॉयर,शिक्षाविद,राजनीतिज्ञ,स्वतंत्रता सेनानी
विवाह (Marriage)1878 में
पत्नी (Wife)मिर्जापुर की कुंदन देवी
पुत्र (Son)रमाकांत,मुकुंद,राधाकांत,गोविन्द
पुत्रियाँ (Daughters)रमा और मालती

 वो अपने माता-पिता की 5वी संतान थे,उनके अतिरिक्त पांच भाई और दो बहनें भी थी. वास्तव में उनके पूर्वज मूल रूप से मालवा, मध्य प्रदेश के संस्कृत विद्वान थे, इसलिए उन्हें ‘मालवीय’ कहा जाता था, जबकि उनका वास्तविक उपनाम/जाति चतुर्वेदी थी. उनके पिता संस्कृत में विद्वान और कथावचक थे, वो ‘श्रीमद् भागवत’ की कहानियों को पढ़ा करते थे,यही कारण था कि मदनमोहन भी उनकी तरह कथावचक बनना चाहते थे. उनके सबसे छोटे पुत्र पंडित गोविन्द मालवीय भी एक स्वतन्त्रता सेनानी थे और पार्लियामेंट के सदस्य थे, अभी उनकी पोते की पत्नी श्रीमती सरस्वती मालवीय अपनी पुत्रियों के साथ इलाहबाद में रहती हैं.

मदन मोहन मालवीय  शिक्षा (Madan Mohan Malviya  Education)

उन्होंने पांच साल की उम्र में अपनी शिक्षा संस्कृत में शुरू की थी,वो अपनी प्राथमिक शिक्षा को पूरा करने के लिए पंडित हरदेव के धर्म ज्ञानोपदेश पथशाला में गए, उसके बाद विधान वर्धिनी सभा द्वारा चलाए जाने वाले  स्कूल में दाखिला लिया.   इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद जिला स्कूल में दाखिला लिया जो कि अंग्रेजी माध्यम का स्कूल था जहां उन्होंने कविताए लिखना शुरू किया,यही कविताएँ बाद में कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई. उन्होंने एक  उपनाम ‘मकरंद’ के साथ कविताएँ लिखी थी, जिन्हें बाद में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ पत्रिका में 1883-84 के दौरान प्रकाशित किया गया था,इसके अलावा उनके  समकालीन और धार्मिक विषयों पर उनके लेख ‘हिंदी प्रदीपा’ में प्रकाशित हुए थे. वर्ष 1879 में, उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय (मुइर सेंट्रल कॉलेज) से अपना मैट्रिकुलेट का एक्जाम पास किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में बीए की डिग्री करने चले गए. उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था,जिसे देखकर ही हैरिसन कॉलेज’ के प्रधानाचार्य ने उन्हें मासिक छात्रवृत्ति के साथ मदद की थी.

 मदन मोहन मालवीय राजनीतिक एवं संपादकीय जीवन (Madan Mohan Malviya political and Editorial Career)

A. संपादकीय जीवन

  • दिसम्बर 1886 के समय कलकत्ता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में उन्होंने अपने विचारों और ओजस्वी भाषण से दादभाई नैरोजी को प्रभावित कर दिया,जो कि उस सेशन के चेयरमैन थे. इसके अतिरिक्त इन्होने वहाँ उपस्थित प्रतापगढ़ जिले के राजा रामपाल सिंह पर भी प्रभाव डाला, जो कि उस समय अपने हिन्दुस्तान नाम की साप्ताहिक पत्रिका के लिए संपादक खोज रहे थे. उन्होंने तुरंत इस पद के लिए मालवीय को ऑफर दिया जिसे उन्होंने एक्सेप्ट (accept) भी कर लिया. 
  • मदन मोहन ने अपनी स्कूल में शिक्षक की नौकरी छोडकर जुलाई 1887 में संपादक का काम शुरू कर दिया. उन्होंने ये कार्य अगले ढाई वर्षों तक किया,उसके बाद वो इलाहबाद लौट आये और लॉ की डिग्री की पढ़ाई करने लगे.
  • लॉ पढ़ते हुए ही 1889 में वो इंग्लिश डेली के लिए काम कर रहे थे. इसके अलावा उन्होंने संपादक के रूप में बहुत से महत्वपूर्ण पत्रिकाए प्रकाशित की. जिनमें 1907 में छपने वाला अभ्युदय से लेकर कई अन्य इंग्लिश न्यूज़ पेपर भी शामिल हैं.
  • 1909 में उन्होंने लीडर नाम के इंग्लिश न्यूज़ पेपर की शुरुआत की थी, जिसमें उन्होंने 1911 तक संपादक का काम देखा.  इसके बाद कांग्रेस के प्रेसिडेंट रहते हुए (1911-1919) उन्होंने हिंदी पेपर मर्यादा भी शुरू किया.
  • इसके बाद 1924 में तो उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स को बंद होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई,जिसमें एम.आर जयकार,लाल लाजपत राय और घनश्याम दास बिरला ने उनका सहयोग किया. 1936 में उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स का हिंदी एडिशन निकालना शुरू किया जिसका नाम “हिन्दुस्तान” रखा गया.

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B. राजनीतिक जीवन और वकालात (Political Life and Law career)

  • एल.एलबी करने के बाद 1891 में इलाहबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में उन्होंने प्रैक्टिस शुरू कर दी थी. उनको जीवन में 4 बार क्रमश: 1909 और 1918,1930,1932 में इंडियन नेशनल कांग्रेस का प्रेसिडेंट चुना गया था. और बतौर प्रेसिडेंट मालवीय जी ने बहुत से महत्वपूर्ण कार्य किये. इसी के साथ 1916 में नर्म दल के नेता गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा प्रस्तावित लखनऊ पैक्ट का इन्होने विरोध भी किया था.
  • स्वयं को पूरी तरह से शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित करने के लिए 1911 में मालवीयजी ने लॉ की  प्रैक्टिस छोड दी और सन्यासी के समान जीवन जीना शुरू किया. हालाकि 1922 में हुए चौरा-चौरी काण्ड के बाद 1924 में वो इलाहबाद हाई कोर्ट में गए थे और उन्होंने 177 क्रांतिकारियों को बचाया था, जिन्हें सेशन कोर्ट ने फांसी की सजा सूना दी थी,और इनमें से 156 को वें निर्दोष साबित करने में भी सफल रहे थे.
  • 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज’ की स्थापना करने वाली एक ब्रिटिश महिला अधिकार कार्यकर्ता, समाजवादी, थियोसोफिस्ट, वक्ता और लेखक एनी बेसेंट ने अप्रैल 1911 में मदन मोहनमालवीय जी से मुलाकात की थी. इन दोनों ने मिलकर ही वाराणसी में एक हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार किया,इस तरह वे आने वाले समय में विश्वविद्यालय के हिस्से के रूप में ‘सेंट्रल हिंदू कॉलेज’ को भी शामिल करने के लिए भारत सरकार को सिफारिश भेजने और अन्य औपचारिकताए पूरी करने लगे.इस तरह 1916 में “पार्लियामेंट्री लेजिस्लेशन दी बी.एच.यू. एक्ट 1915” पारित होने के बाद  एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय, ‘बनारस हिंदू विश्वविद्यालय’ की स्थापना हुयी  जहां पर मदन मोहन मालवीय 1939 तक विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने रहे.
  • 1912 में वह ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ के सदस्य बने जिसे 1919  ​​में “सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल” में परिवर्तित कर दिया गया, इसलिए उनकी सदस्यता 1926 तक बनी रही. 
  • मालवीय जी ने 1928 में ‘साइमन कमीशन‘ का विरोध किया. 30 मई, 1932 को इन्होने जवाहरलाल नेहरू और लाला लाजपत राय और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर  एक घोषणापत्र प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने देशवासियों से ‘स्वदेशी खरीदें’ (Buy indian) आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया. 
  • 1931 में उन्होंने एक प्रतिनिधि के रूप में ‘सेकंड राउंड टेबल’ में भाग लिया. उसके बाद 1932 में दिल्ली में आयोजित  कांग्रेस के सत्र की अध्यक्षता भी की. हालांकि खिलाफत आंदोलन में मालवीयजी ने कांग्रेस की भागीदारी का विरोध किया लेकिन उन्होंने असहयोग आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
  • 25 अप्रैल, 1932 को मालवीयाजी के साथ लगभग 450 कांग्रेस स्वयंसेवकों को दिल्ली में गिरफ्तार किया गया था. 25 सितंबर, 1932 को उनके और डॉ अम्बेडकर के मध्य ‘पूना पैक्ट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए थे, इसने अलग मतदाताओं के निर्माण के बजाय प्रांतीय विधायिकाओं में सामान्य मतदाताओं में निराश वर्गों (हिंदुओं के बीच अस्पृश्यों को दर्शाते हुए) के लिए आरक्षित सीटें प्रदान कीं.  इसके बाद कांग्रेस के भीतर उनके मतभेद बढ़ जाने से वो कांग्रेस से अलग हो गए.
  • 1934 में उन्होंने माधव श्रीहरी आने के साथ मिलकर कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की, उस साल पार्टी ने इलेक्शन में सेन्ट्रल लेजिस्लेचर में 12 सीट्स जीती हैं.1937 में उन्होंने राजनीतिक जीवन से सन्यास ले लिया.   

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मदन मोहन मालवीय से जुड़े रोचक तथ्य  (Interesting facts about Madan Mohan Malviya)

  • मदन मोहन मालवीय जातिवादी विचारधारा की घोर विरोधी थे,इस कारण ही उन्हें ब्राह्मिण जाति से निष्कासित भी कर दिया गया था. हरिद्वार के हर की पौड़ी में गंगा आरती की शुरुआत इन्होंने ही की. वास्तव में मालवीय जी ने समाज के हित मे बहुत कार्य किए थे,उन्होंने मंदिरों में होने वाले सामजिक भेदभाव का ना केवल विरोध किया बल्कि रथ यात्रा के दिन कालाराम मंदिर में हिन्दू दलितों का प्रवेश,और गोदावरी में मन्त्रों के जाप के साथ पवित्र स्नान भी करवाया. 
  • इन्हे महात्मा गांधी ने महामना की उपाधि से सम्मानित किया था, वो पंडितजी को अपने बड़े भाई के जैसा सम्मान देते थे. गांधीजी ने उन्हें “मेकर्स ऑफ़ इंडिया” भी कहा था. भारत के दुसरे राष्ट्रपति डॉक्टर राधकृष्णन ने उनके निस्वार्थ काम के लिए करम योगी का टाईटल भी दिया था. पंडित जवाहर लाल नेहरु का   कहना था कि वो एक महान आत्मा हैं,जिन्होंने नवीन भारत के राष्ट्रवाद की नींव रखी हैं. 
  • उन्होंने ब्रिटिश सरकार को इस बात के लिए भी मनाया था कि न्यायालय में देवनागरी लिपि का उपयोग किया जाए,जिसे उनकी बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता हैं.
  • मालवीय जी कट्टर हिन्दू थे,और गौ-हत्या के विरोधी थे, उन्होंने 1922 में लाहौर और 1931 में कानपूर में एकता पर प्रसिद्ध और ओजस्वी भाषण दिया था.

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समाज में मालवीय जी का योगदान (Madan Mohan Malviya Cntributtion for Society)

  • बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए मालवीयजी ने फंड की व्यवस्था के लिए निजाम के दरबार में भी गये जहां निजाम ने उनका अपमान करते हुए  उन पर जुता फैंक दिया,मालवीयजी शांत रहे और उन्होंने उस जुते को बाहर ले जाकर नीलामी में लगा दिया,जिससे निजाम ने शर्मिंदा होकर उन्हें वापिस बुलाया और उचित सहायता प्रदान की.
  • 1918 में कुंभ मेले,बाढ़,भूकंप, और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए अखिल भारतीय सेवा समिति ने कई जगह अपने केंद्र स्थापित किए. इसी वर्ष इसका सब-यूनिट मॉडल जैसा बॉय स्काउट (Boy scout) शुरू हुआ,इसका महत्वपूर्ण विभिन्नता यह थी कि इसमें ब्रिटिश नेशनल एंथम की जगह वन्दे मातरम गाया जाता था,इस तरह मदन मोहन मालवीयजी ने ना केवल बॉय स्काउट (Boy scout) की शुरुआत की बल्कि देशवासियों को प्रेरित भी किया कि वो ब्रिटिश नेशनल एंथम की जगह वन्दे मातरम  गाए.
  •  मालवीय जी ने गांधीजी को कहा था कि विभाजन के देश की स्वतंत्रता को स्वीकार ना करे,लेकिन उन्होंने मालवीयजी की बात को सुना नहीं.
  •  उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर बहुत जोर दिया था क्योंकि उन्होंने इसे ही सांस्कृतिक पुनरुद्धार का प्रमुख हिस्सा माना था.वह उस दौरान भारत में हो रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थान से प्रभावित थे, जो उनके भाषणों, विचारों में देखा जा सकता था. सक्रिय राजनीति और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारियों के बाद भी, उन्होंने सनातन धर्म सभा में अपनी क्रियाशीलता को बनाये रखा, जिसका कार्यालय उनके निवास पर था, ये कार्यालय धार्मिक विद्वानों को प्रोत्साहन  और पुरस्कार देने के अलावा गाय संरक्षण और कल्याण के लिए काम करता था. सम्मान (Award) 
  • 1918 में जब वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रेसिडेंट थे तब उन्होंने सत्यमेव जयते का नारा दिया था. इन्हे हाल ही में साल 2015 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया है.

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मदन मोहन मालवीय का देहांत (Madan Mohan Malviya Death) 

पंडित मदन मोहन मालवीय का देहावासन 12 नवम्बर 1946 को उतर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था. तब तक भारत स्वतंत्र तो नहीं था लेकिन देश की स्वतन्त्रता निश्चित हो चुकी थी. आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मालवीय जी की मृत्यु के समय लिखा था, “एक महान आत्मा ने हमें छोड़ दिया है, उनका नाम और कार्य भविष्य की पीढ़ी को प्रेरित करेगा और संदेश देगा कि उस महान व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं है, उनके द्वारा की गयी राष्ट्र के लिए उनकी सेवा शब्दों से परे है, उनकी मृत्यु से उत्पन्न वैक्यूम भरा नहीं जा सकता है, क्योंकि वही एक सच्चे देशभक्त थे”.  

मदनमोहन मालवीयजी के नाम पर धरोहर (Monuments based on Madan Mohan Malviya ji)

  • बीएचयू के मुख्य द्वार पर पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा लगी हुयी हैं. गंगा में एक छोटा द्वीप हैं,जिसका नाम मालवीय द्वीप रखा गया हैं.
  • 1961 में उनके नाम पर सरकार ने एक पोस्टल स्टाम्प छपवाया था और 22 जनवरी 2016 को उनके नाम पर एक ट्रेन “महामना एक्सप्रेस” भी शुरू की गई.
  • दिसम्बर 2011 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंडित मदन मोहन मालवीय के 150वे वर्षगाँठ पर बीएचयू में उनके नाम पार स्कालरशिप और शैक्षिक अवार्ड के साथ ही एक मालवीय स्टडीज सेंटर स्थापित करने का भी घोषणा की.
  • इसके अलावा कई शहरों जैसे  दिल्ली,जयपुर,लखनऊ,इलाहाबाद और भी कई जगह पर बहुत सारे इंस्टिट्यूट,होस्टल,कैंपस के नाम भी मालवीयजी के नाम पर रखे गए. जिनमें गोरखपुर में मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और जयपुर में मालवीय नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण शिक्ष्ण संस्थान हैं.

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