खिलाफत आंदोलन | Khilafat movement in Hindi

खिलाफत आंदोलन (Khilafat movement in Hindi)

20 वीं सदी के प्रारम्भ में जब भारत में कई तरह के राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हो रहे थे, तब ये देखा गया कि कुछ घटनाएँ भारत के भीतर की स्थितियों से नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों से प्रभावित हो रही थी, इसी श्रंखला में से एक घटना जिसे खिलाफत आंदोलन कहा जाता हैं, भी शामिल था. ये आंदोलन उस समय भारत के मुस्लिमों में मध्य फैले असंतोष की उपज था, लेकिन देश की स्वतंत्रता में बराबर योगदान देने वाले इस वर्ग पर कुछ अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का भी प्रभाव पड़ रहा था. Khilafat movement

आंदोलन का नाम (Movement name) खिलाफत आंदोलन
आंदोलन के नेता (Movement leaders) शौकत अली खान, मुहम्मद अली और अबुल कलाम आज़ाद और अन्य मुस्लिम नेता
आल इंडिया खिलाफत दिवस का आयोजन (All india khilafat day) 17 अक्टूबर 1919 और 19 मार्च 1920

 क्या थे खिलाफत आंदोलन होने के कारण? (Reasons of Khilafat Movement)

 1876 से 1909 तक ओटोमेन साम्राज्य का शासक अब्दुल हामिद द्वितीय था, कालिफ होने के कारण दुनिया भर के सुन्नी मुस्लिमों के लिए ओटोमेन साम्राज्य बहुत ही धार्मिक और प्राथमिक था. प्रथम विश्व युद्ध में इस देश ने केन्द्रीय शक्तियों का साथ दिया लेकिन इनकी हार हुयी, और 1919 में हुए वेर्सेली की संधि के अनुसार ओटोमेन राज्य की सीमाएं कम हो गयी. इसी दौरान तुर्की में मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय आंदोलन हुआ था, उसे पश्चिमी देशों से शक्तियाँ मिली थी और उसने कालिफ (caliph) के पद को ही समाप्त कर दिया, इस कारण भारत में भी मुस्लिम ब्रिटिश के खिलाफ हो गए क्योंकि उनके धार्मिक गुरु के प्रभाव और शक्तियों को कम करने की किया गया था.  मुस्लिम समुदाय में  डर का जन्म 1911 में तुर्की पर इटली के और 1912-13 में बाल्कन के हमलों से बढ़ गया था.

 खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व (Leaders of Khilafat movement) 

  • कालिफ की सुरक्षा के लिए भारत में भी मुस्लिम भाईयों ने एक मुहीम चलाई थी, इन भाईयों के नाम शौकत अली खान और मुहम्मद अली और अबुल कलाम आज़ाद थे. इन नेताओं ने देश की स्वतंत्रता के लिए चलाए जाने वाले महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में योगदान दिया था.
  • वास्तव में भारत के मुस्लिम, भविष्य में अपने पूजा के स्थलों को लेकर चिंतित थे, ऐसे में कई मुस्लिम बुद्धिजीवी और अन्य मुस्लिम नेता जैसे डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी,रईस-उल-मुहाजिरीन बेरीस्टर जान मुहम्मद जुनेजो, हस्तर मोहानी, मौलाना अबुल कलाम आज्जाद और डॉक्टर हाकिम अजमल खान भी लखनऊ में आल इण्डिया खिलाफत कमिटी में शामिल हो गये थे.
  • इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महुम्मद अली और शौकत अली  दिल्ली में न्यूज पेपर एडिटर थे जबकि कलकता से जर्नलिस्ट और इस्लामिक स्कॉलर मौलाना अबुल बरी  और देवबंद के मदरसों के मुखिया महमूद उल-हसन इसे दिशा दे रहे थे. इन सब राजनीतिज्ञों और उलेमाओं ने समझा कि यूरोपियन का खलीफा पर  आक्रमण  इस्लाम पर हमला हैं इसलिए उन्हें ब्रिटिश शासन में मुस्लिम की स्वतंत्रता पर खतरा महसूस हुआ.
  • खिलाफत आंदोलन के घोषणा पत्र के आने के बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस और खिलाफत आंदोलन के मध्य संधि हुयी थी, जिससे गांधीजी ने उन्हें असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए आह्वान किया.

खिलाफत आंदोलन की मांगें (Demands of Khilafat movement)

खिलाफत आंदोलन 2 ही मांगों पर ही आधारित था,ये अलग बात हैं कि ये दोनों मांगे ही पूरी नहीं हुयी.

  1. कालिफ सुल्तान को पर्याप्त जगह मिलनी चाहिए जिससे कि वो पूरी दुनिया में इस्लाम धर्म और इसमें विश्वास को बनाये रख सके.
  2. वो जगह जो जज़िरात-उल-अराब कहलाती हैं जिसमें अरेबिया,सीरिया,इराज और पेलेस्टिन शामिल हैं,वो सभी मुस्लिम आधिपत्य में ही रहेंगे.

खिलाफत आन्दोलन में हुए घटनाक्रम (Khilafat movement-Timeline)

  • विश्व-युद्ध के दौरान अली बंधुओ को गिरफ्तार कर लिया गया था और उन्हें तब ही छोड़ा गया जब युद्ध समाप्त हो गया. समय के साथ ये आंदोलन बंगाल,नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस और पंजाब तक पहुँच गया था. 17 अक्टूबर 1919 को आल इंडिया खिलाफत दिवस मनाया गया,इसमें हिन्दुओं ने भी मुस्लिमों का साथ दिया.
  • 23 नवम्बर 1919 आल इण्डिया खिलाफत कांफ्रेंस का आयोजन नई दिल्ली में किया गया और बाद में खिलाफत का घोषणा पत्र भी जारी हुआ था, जिसमें ब्रिटिशर्स से कालिफेट (Caliphate) की सुरक्षा की मांग की गयी.
  • इसके बाद खिलाफत आंदोलन के नेताओं ने असहयोग आन्दोलन में सहयोग देने के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस से हाथ मिला लिया. 19 मार्च 1920 को वापिस खिलाफत दिवस मनाया गया और इसी वर्ष इलाहाबाद में जून में पार्टी कांफ्रेंस हुयी जहां आंदोलन के एजेंडे तय हुए:-
  1. सरकार द्वारा दिए जाने वाले सम्मान का बहिष्कार करना
  2. सिविल सर्विस,आर्मी और पुलिस और अन्य सरकारी ऑफिस का बहिष्कार किया जाए.
  3. सरकार को टैक्स नहीं दिया जाए.

खिलाफत आंदोलन के परिणाम (Khilafat movement-consequences)

  • 1919 से 1924 तक चले खिलाफत आन्दोलन भारत के मुस्लिमों में राष्ट्रवाद का जागरण किया था. ओटोमेन के साम्राज्य के टूटने के बाद भी वहाँ के सुल्तान खलीफा को सत्ता में बनाये रखना ही इसका मुख्य उद्देश्य था. इस तरह मुस्लिम युद्ध के बाद 1914 में ओटोमेन की सीमाओं को वापिस बनाते हुए संधि बनाना चाहते थे,जबकि तुर्क की केंद्र के साथ हुए गठ्बन्धन की हार हुयी थी.
  • खिलाफत में भारतीय समर्थकों ने 1920 में अपना केस रखा लेकिन ब्रिटिश सरकार ने पेन इस्लामिक की तरफ अलग व्यवहार दिखाते हुए तुर्की के विरुद्ध कोई नीति में परिवर्तन नहीं किया.  इस तरह भारतीय मुस्लिम की सेवर की संधि पर पड़ने वाला प्रभाव कम हो गया, और यूरोपियन शक्तियाँ जिनमे ग्रेट ब्रिटेन और फ़्रांस था ने ऑटोमेन और अरब की जमीन का सौदा कर लिया.
  • खिलाफत आन्दोलन का प्रभाव पैन-इस्लामिक पर कम पड़ा लेकिन राष्ट्रवादी आन्दोलन पर इसका काफी प्रभाव हुआ. खिलाफत आन्दोलन के नेताओं ने राजनीतिक संधियां करते हुए पश्चिमी शिक्षाविद  मुस्लिमों और उलेमा के साथ धार्मिक चिन्ह के रूप में संधि करते हुए खिलाफत बनाया था.
  • भारत के मुसलमानों में खिलाफत आंदोलन ने ब्रिटिशर्स के खिलाफ एक आक्रोश को बढ़ावा दिया जो 1914 में ओटोमेन पर हुए हमले की घोषणा में पैदा हुआ था. खिलाफत नेता जो युद्ध के दौरान बंदी बनाये गये थे पहले से स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे. 1919 में उनके जेल से रिहा होने पर उन्होंने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की जिससे  किभारतीय मुस्लिमों को एंटी-ब्रिटिश किया जा सके, खिलाफत आंदोलन को राष्ट्रवादियों हिन्दू-मुस्लिम सहयोग से भी फायदा मिला  जिसके कारण 1916 में इन्डियन नेशनल कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच में लखनऊ पैक्ट हुआ था.
  • गांधीजी ने भी अपने असहयोग आंदोलन में खिलाफत आन्दोलन की इसीलिए सहायता की थी जिससे राष्ट्रवाद में मुस्लिमों मका सहयोग मिल सके. अली भाइयों ने इसलिए ही असहयोग आंदोलन में बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम समर्थक एकत्र किये थे.

खिलाफत आंदोलन का महत्व  (Importance of the Khilafat Movement)

खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ होने वाला पहला आंदोलन था जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एक साथ होकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध होकर खड़े थे. जिसमें गांधीजी द्वारा सत्याग्रह और अहिंसा का योगदान था. इस तरह बड़े स्तर पर धर्म को आधार बनाकर जिस तरह से लोगों को एकत्र किया था ब्रिटिश सरकार पूरी तरह हिल गयी थी. 1921 की अंत तक सरकार ने आंदोलन को दबाने की कोशिश भी की थी,इसके लिए नेताओं को गिरफ्तार किया गया.

कैसे खत्म हुआ खिलाफत आंदोलन? (How Khilafat movement ended)   

  • 1920 में हिजरत के कारण आंदोलन तब कमजोर हो गया जिसमें भारत से लगभग 18,000 मुस्लिन अफगानिस्तान की तरफ चले गये. दक्षिण भारत के मालाबार में 1921 में मुस्लिम मोपला द्वारा किये गये विद्रोह से और ज्यादा कलंकित हो गया, इन सबसे हिन्दुओं की स्थिति और खराब हो गयी थी.
  • गांधी जी ने मार्च 1922 में जब असहयोग आंदोलन स्थगित किया और उनकी गिरफ्तारी हुयी तो खिलाफत आंदोलन भी कमजोर पड़ गया. 1922 में ही ओटोमेन सल्तनत के खत्म होने और 1924 में खलीफा के खत्म होने पर ये आन्दोलन भी खत्म हो गया.
  • 1919 से लेकर 1922 तक जहां हिन्दू-मुस्लिम एकता की हवा चल रही थी ची खिलाफत आंदोलन के समाप्त होने के बाद माहौल पूरा बदल गया था. 1922 के बाद खिलाफत आंदोलनकारी और असहयोग आंदोलन नेताओं के मध्य मतभेद बढने लगे थे. हिन्दू-मुस्लिम एकता की जगह कट्टरवाद बढने लगा था, और ये परिवर्तन देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन में टर्निंग पॉइंट बना.

वास्तव में खिलाफत आन्दोलन का उद्देश्य ये था कि भारतीय मुस्लिम द्वारा ब्रिटिश सरकार पर ये दबाव बनाया जाए कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद ओटोमेनके सुलतान खलीफा को बनाये रखा जाए, लेकिन खिलाफत जितना जल्दी आया उतनी ही जल्दी खत्म भी हो गया.

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