जय प्रकाश नारायण जीवन परिचय | Jai Prakash Narayan Biography in hindi

जय प्रकाश नारायण जीवन परिचय (Jai Prakash Narayan Biography in hindi)

जयप्रकाश नारायण एक क्रांतिकारी थे जिन्होंने देश की स्वतंत्रता से पहले स्वतंत्रता संग्राम में और स्वतंत्रता के बाद राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. इसके अलावा आम-जन के हितों और न्याय के लिए किये गये उनके कार्यों के कारण ही उन्हें लोकनायक कहकर सम्बोधित किया जाता हैं.

Jai Prakash Narayan

क्र. म.(SNo.) परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1.    पूरा नाम ((Full Name) लोकनायक जयप्रकाश नारायण
2.    पेशा (Profession) राजनीतिज्ञ
3.    राजनीतिक पार्टी (Political Party) पहले कांग्रेस,बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी   
4.    राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
5.    उम्र (Age) 77 वर्ष (Died)
6.    गृहनगर (Hometown) पटना
7.    धर्म (Religion) हिन्दू
8.    जाति (Caste) कायस्थ
9.    वैवाहिक स्थिति (Marital Status) विवाहित
10.           राशि (Zodiac Sign) तुला
11.           मृत्यु (Death) 8 अक्टूबर 1979
12.           मृत्यु स्थान (Death Place) पटना

 जय प्रकाश नारायण प्रारम्भिक जीवन,जन्म  (Jai prakash Narain Early life, Birth)

जयप्रकाश जी का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के एक छोटे से जिले में हुआ था. जयप्रकाश अपने माता-पिता की चौथी सन्तान थे, उनके पिता राज्य सरकार के कैनाल विभाग में जूनियर ऑफिसर थे. जयप्रकाश को प्यार से बुल (baul) कहकर पुकारा जाता था. बचपन से ही जयप्रकाश को भारत के राजा-महाराजाओं की वीरता काफी प्रभावित करती थी, और वो उनके किस्से-कहानिया पढ़ते हुए बड़े हुए थे.

जय प्रकाश नारायण प्रारम्भिक जीवन, शिक्षा (Jai prakash Narain Early life, Education)

  • जेपी अपने दादा के साथ सिताबदियारा में रहते थे, क्योंकि उनके गाँव में कोई हाई स्कूल नहीं थी, इसलिए बाद में जयप्रकाश को आगे की पढाई के लिए पटना आना पड़ा, इस तरह स्कूल से ही पढाई में उपलब्धियाँ हासिल करते हुए 1918 में वो डिस्ट्रिक्ट मेरिट स्कॉलरशिप के साथ वो पटना कॉलेज पहुंचे. पटना में उन्हें पढने का शौक बढ़ गया,क्योंकि यहाँ काफी पुस्तकें भी उपलब्ध थी, इस तरह सरस्वती, प्रभा और प्रताप जैसे साहित्य के साथ ही उन्होंने भगवद गीता जैसी धार्मिक किताबें भी पढ़ी.
  • जयप्रकाश नारायण काफी प्रतिभाशाली छात्र थे, स्कूल के दिनों में उन्होंने लेखन में अपनी प्रतिभा दिखाते “बिहार में हिंदी की वर्तमान स्थिति (दी प्रेजेंट स्टेट ऑफ़ हिंदी इन बिहार) पर निबंध लिखा था,जिसे काफी प्रोत्साहन और प्रशंसा मिली थी.

जयप्रकाश नारायण का निजी जीवन (Jai Prakash Narain Family)

  • जयप्रकाश का विवाह 1920 में मात्र 18 वर्ष की उम्र में हुआ था, उनके विवाह के समय उनकी पत्नी मात्र 14 वर्ष की थी. प्रभादेवी एक स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली महिला थी,साथ ही वो क्रांतिकारी, उदारवादी और गांधीवादी महिला थी और गांधीजी के कार्यों में उत्साह के साथ भाग लेती थी. जयप्रकाश जब यूएस पढने के लिए गए तब वो गांधीजी के आश्रम पढ़ने को चली गई थी.

जयप्रकाश नारायण की पारिवारिक जानकारी (Jayaprakash Narayan’s family details)

माता (Mother) फूलरानीदेवी
पिता (Father) हरसू दयाल श्रीवास्तव
पत्नी (Wife) प्रभावती
ससुर (Father-in-law) ब्रिज किशोरप्रसाद

जयप्रकाश नारायण का करियर (Jayprkasha Narayan’s carrier)

  • जयप्रकाश अपने मित्रों के साथ असहयोग आन्दोलन (जिसे गांधीजी ने 1919 में आये रोलेट एक्ट के विरुद्ध शुरू किया था) के दौरान मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के भाषण को सुनने गये थे, और उस समय उन पर मौलाना अबुल के शब्दों का प्रभाव हुआ और उन्होने अपने एग्जाम से 20 दिन पहले ही कॉलेज छोड़ दिया.
  • 1922 में उच्च शिक्षा के लिए जयप्रकाश ने देश छोड़ दिया और इसी वर्ष 8 अक्टूबर को वो कैलीफिर्निया पहुंचे. जयप्रकाश ने यूनाइटेड स्टेट्स में अपनी शिक्षा का खर्चा उठाने के लिए उन्होंने कई तरह की नौकरियां की, और इन अनुभवों ने ही उन्हें वर्किंग क्लास के सामने आने वाली समस्याओं के प्रति जागरूक कर दिया. बर्कले में उन्होंने अंगूर तोड़ने, जेम पैकर, वेटर, सेल्समेन और बर्तन धोने का काम भी किया था.
  • जयप्रकाश ने पहले बर्कले (Berkeley) में प्रवेश लिया और फिर यूनिवर्सिटी ऑफ़ लोवा में स्थानांतरण लिया, इसके बाद भी उन्हें कई अन्य यूनिवर्सिटी में ट्रांसफर लेना पड़ा. इस तरह यूएस में कई तरह की समस्याओं का सामना करते हुए भी जेपी ने अपने पसंदीदा विषय समाज-शास्त्र में पढाई की, और प्रोफेसर एडवर्ड रोस से इस विषय में मार्गदर्शन लिया. यही पर कार्ल मार्क्स के दास केपिटल ने उन्हें काफी प्रभावित किया, जिसे पढकर उन्हें ये समझ आया कि मार्क्सिज्म में बहुत सी समस्याओं का समाधान मिल सकता हैं, इस तरह इस विचारधारा से प्रभावित होकर  वो मार्क्सिस्ट बन गए. जेपी ने भारतीय विद्वान और कम्युनिस्ट एम.एन रॉय की किताबो को भी पढ़ा, उन्होंने लेनिन, ट्रोटस्काई(Trotsky) के किये गये कामों का भी अध्ययन किया.
  • जयप्रकाश की माताजी की तबियत खराब होने के कारण उन्हें अपनी पीएचडी की डिग्री की छोडनी पड़ी. लन्दन में जेपी रजनी पाल्मे दत्त और अन्य क्रांतिकारियों के साथ पारिवारिक सम्बंध बन गये थे. पटना के कदम कुआं में वो अपने करीबी मित्र गंगा शरण सिंह (सिन्हा) के साथ रहते थे,जो कि उनकी तरह ही राष्ट्रवादी थे.
  • 1929 में जेपी भारत लौटे, और वापिस लौटकर जवाहर लाल नेहरु के कहने पर वो इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गये. महात्मा गांधी भी युवा जेपी से काफी प्रभावित थे और उन्हें अपने दल में शामिल कर लिया,इस तरह जयप्रकाश नारायण गांधी के अनुयायी बन गए.
  • जय प्रकाश ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन में भी योगदान दिया, और इस कारण ही उन्हें 1932 में जेल भी जाना पड़ा. जेल में उनकी मुलाकात राम मनोहर लोहिया, मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन,अशोक मेहता,युसूफ देसाई और अन्य कई राष्ट्रीय नेताओं से हुयी.
  • इसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में धीरे-धीरे उनका योगदान बढने लगा और 1939 में उन्हें फिर से जेल हो गयी. इस बार उनके जेल जाने का कारण ये था कि उन्होंने भारत के ब्रिटेन की तरफ से विश्व युद्ध द्वितीय में शामिल होने का विरोध किया था.
  • 1942 में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की शुरुआत की थी,जिसमें जयप्रकाश नारायण ने काफी उत्साह के साथ भाग लिया उनके साथ सूरज नारायण सिंह,गुलाब चंद गुप्ता और रामानंद मिश्रा थे जो भूमिगत हो गये थे लेकिन 1943 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वापिस पकड़ लिया.  आखिर में 1946 में जयप्रकाश को जेल से छोड़ा गया, लेकिन तब तक स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुए उन्होंने कांग्रेस नेता के रूप में अपनी छवि सशक्त कर ली थी.

स्वतंत्रता के पश्चात जयप्रकाश नारायण का जीवन (Jayaprakash Narayan’s life after country’s independence)

  • ये सही हैं कि जयप्रकाश नारायण ने भारत की स्वतंत्रता में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और काफी संघर्ष किया लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी वो देश के प्रति जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटे और राजनीति के साथ ही लोक-कार्यों में संतुलन बनाते हुए लोकनायक के साथ ही सुप्रसिद्ध राजनेता के रूप में ख्याति अर्जित की.
  • 1947 में भारत को जब स्वतंत्रता मिली, तो कुछ अन्य सोशलिस्ट के साथ जेपी ने भी 1948 में कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया. स्वतंत्रता और महात्मा गांधी के देहांत के पश्चात जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और बसवोन (Basawon) सिंह ने कांग्रेस के विपक्षी पार्टी के रूप में सीएसपी (कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी) को सम्भाला जो कि बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बन गयी. जेल से छूटने के बाद उन्होंने कांग्रेस सोशियलिस्ट पार्टी में भी योगदान दिया, जो कि कांग्रेस पार्टी में लेफ्ट का विंग था, इसमें वो जनरल सेक्रेटरी बने, और इस तरह 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाने में उनकी मुख्य भूमिका रही.
  • वैसे इससे पहले ही काफी ज्यदा समय तक पार्टी की राजनीति के कारण जयप्रकाश थक चुके थे इसलिए उन्होंने अपना जीवन विनोबा भावे द्वारा चलाए जाने वाले भूदान योजना आंदोलन को समर्पित करने का निश्चय कर लिया था. लेकिन उस समय देश की परिस्थितियों को देखते हुए 1950 के पास उनकी रूचि फिर से राजनीती के प्रति जागृत हो गयी, और वो फिर से राजनीति में सक्रिय हो गये.
  • 19 अप्रैल 1954 को जयप्रकाश नारायण ने गया में ये घोषणा की कि वो अपना आजीवन विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन और भूदान आन्दोलन को समर्पित करेंगे, जिसका उद्देश्य हरिजनों के अधिकारों की रक्षा करना और जमीन दिलवा था. उन्होंने हजारीबाग में अपनी जमीन छोड़ दी,और गांव के उत्थान हेतु काम करना शुरू किया.
  • 1957 में जयप्रकाश ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से रिश्ता तोड़ लिया, इस दौरान उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि लोकनीति विभाजनकारी नहीं कल्याणकारी होने चाहिए और इसलिए उन्होंने इसे सर्वोदय कहा. जयप्रकाश नारायण देश भर में सर्वोदय कार्यकार्ताओं के मध्य बहुत लोकप्रिय हो गये थे.
  • 1960 के दशक में उन्होंने जन-आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया. 1970 में हुए बिहार आन्दोलन में अपनी उम्र को नजर अंदाज करते हुए जेपी ने भाग लिया.
  • 1964 में हिन्दुस्तान टाइम्स में छपे एक आर्टिकल से जयप्रकाश नारायण ने खुलकर आपति जताई थी जिसमें लिखा था की भारत की जिम्मेदारी हैं कि वो जम्मू कश्मीर में ऑटोनोमी (स्वायत्ता) की रक्षा करे.
  • 1960 के दशक के अंत तक उन्होंने वापिस सम्मुख राजनीति में प्रवेश किया और 1960 के दशक में वो एक सशक्त राजनीतिज्ञ बनकर उभरे. 1974 में बिहार में छात्रों के आन्दोलन का नेतृत्व किया, इस आन्दोलन के दौरान ही जयप्रकाश ने वी.एम तार्कुंडे के साथ मिलकर शांतिपूर्ण सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया.
  • 1974 में जब देश बेरोजगारी और अन्य कई समस्याओं से जूझ रहा था तब तब गुजरात के नव-निर्माण आन्दोलन ने जयप्रकाश से शांतिपूर्ण आन्दोलन करने की अपील की.
  • जयप्रकाश ने अपने जीवन के सातवे दशक में पटना में एक शांतिपूर्ण आन्दोलन किया, तब रैली पर लाठी चार्ज कर दिया गया लेकिन ये सब देशभक्त को पीछे नहीं कर पाया. 5 जून 1974 को उन्होंने बहुत बड़ी जनसभा को संबोधित किया और सम्पूर्ण क्रान्ति की मांग की,इस तरह के इवेंट्स ही बिहार क्रान्ति कहलाये.
  • प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के गैर-लोकतांत्रिक कार्यों के नाराज होकर जयप्रकाश नारायण ने आम लोगों के हितों के लिए वी.एम तारकुंडे के साथ मिलकर 1974 में  सिटीजन ऑफ़ डेमोक्रेसी और 1976  में पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज नाम के एनजीओ की स्थापना की.
  • 1974 में बिहार में छात्रों ने कुछ आन्दोलन किया था जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने किया,इसे टोटल रिवोल्यूशन मूवमेंट (सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन) और जेपी आन्दोलन भी कहा जाता हैं, बाद में ये प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध आन्दोलन का सत्याग्रह बन गया. 5 जनवरी 1975 को  जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान किया, और पटना के गांधी मैदान में एक ऐतिहासिक रैली आयोजित की.

जयप्रकाश नारायण की मृत्यु  (Jayaprakash Narayan’s Death)

24 अक्टूबर 1975 को जेपी की तबियत बिगड़ गयी और पुलिस ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया, जयप्रकाश को जेस्लोक हॉस्पिटल बोम्बे ले जाया गया जहां उन्हें किडनी फ़ैल  होने का पता चला, और इसके बाद वो कुछ वर्षों  (मृत्यु) तक डायलेसिस पर ही रहे. जेपी की मृत्यु उनके 77 वे जन्मदिन से 3 दिन पहले 8 अक्टूबर 1979 बिहार के पटना में हुयी थी.

जयप्रकाश नारायण को मिले सम्मान और उपलब्धियां (Awards & Achievements)

  • 1965 में जयप्रकाश नारायण को जन-कार्यों के लिए रमन मेग्नेसे पुरूस्कार से सम्मानित किया गया.
  • जेपी के सामजिक कार्यों के लिए 1999 में उनको भारत का सर्वोच्च समान भारत रत्न भी दिया गया.

जयप्रकाश नारायण के नाम पर धरोहर (Legacy on Jayaprakash Narayan’s name)

जयप्रकाश नारायण स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान देने वाले प्रथम पंक्ति के नेता थे जिनके नाम पर देश में बहुत सी संस्थाए, हॉस्पिटल, कॉलेज इत्यादि हैं. 

  • बिहार के छपरा जिले में जेपी यूनिवर्सिटी हैं.
  • दिल्ली और पटना में 2 हॉस्पिटल हैं जिनके नाम क्रमश: एलएन जेपी हॉस्पिटल और जय प्रभा हॉस्पिटल हैं.
  • देश के सबसे बड़े और सुविधा-युक्ति ट्रोमा सेंटर जय प्रकाश नारायण एपेक्स ट्रामा सेंटर भी जयप्रकाश नारायण को समर्पित किया गया हैं.

जयप्रकाश नारायण से जुडी रोचक जानकारी (Interesting fact about Jayaprakash Narayan)

  • जयप्रकाश के राष्ट्रवादी और लेखक मित्र रामवृक्ष बेनीपुरी ने जयप्रकाश नारायण की बायोग्राफी लिखी. जयप्रकाश नारायण ने डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद द्वारा युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए स्थापित, बिहार विद्यापीठ को जॉइन किया था.
  • जयप्रकाश जब बीमार थे तब उनके राष्ट्रीय क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोगी योगेन्द्र शुक्ला ने उन्हें कन्धों पर उठाकर “गया” तक लेकर गये थे और लगभग 124 किलोमीटर तक दूरी तय की थी.
  • जयप्रकाश की मृत्यु से पहले ही उनके मृत्यु की घोषणा तात्कालिक प्रधानमंत्री ने कर दी थी, उस समय वो हॉस्पिटल में एडमिट थे, बाद में जब जेपी को इस घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने इस पर मुस्कुराकर ही प्रतिक्रिया दी.
  • जय प्रकाश नारायण ने कुछ किताबें भी लिखी जिसमे सबसे ज्यादा प्रसिद्ध रिकंस्ट्रक्शन ऑफ़ इंडियन पोलिटी हैं. जेपी ने हिंदुत्व के लिए जनजागृति भी की, और इस कारण उनकी काई आलोचना भी हुयी.
  • भारत की स्वतंत्रता के बाद जयप्रकाश नारायण में हिंसा और मार्क्सवाद में कमी आई , उन्होंने 1948 अपने समाजवादी दल को कांग्रेस से अलग कर लिया और बाद में गांधी की ओरिएंटेड पार्टी में शामिल करके एक नई पार्टी पीपल्स सोशलिस्ट पार्टी बनाई. उन्हें नेहरु का उत्तराधिकारी माना जाता था लेकिन 1954 में विनोबा भावे के सिद्धांतो का अनुसरण करते हुए ना केवल अपनी राजनीति की दिशा बदली बल्कि उन्होंने गाँधी वादी विचारधारा भी राजनीति में बनाये रखने की कोशिश की,और संतीय राजनीति (Saintly Politics )की वकालत की. उन्होंने नेहरु और अन्य नेताओं से ये अपील की वो त्यागपत्र देकर आम-जन और उनकी समस्याओं को कम करने में समय बिताये.

     जयप्रकाश नारायण का राजनीति में कोई औपचारिक पद नही था, फिर भी वो पार्टी पोलिटिक्स के बाहर भी काफी सशक्त नेता की छवि रखते थे. जयप्रकाश की बेबाकी ही उनकी पहचान थी,उन्होंने ना केवल इंदिरा गाँधी की गलत नीतियों की खुलकर आलोचना की बल्कि सुधार आन्दोलन से राजनीति को एक नयी दिशा और परिभाषा दी. ये आन्दोलन बिना किसी पार्टी के ही डेमोक्रेसी की वकालत करता था, इसमें शक्ति का विकेंद्रीकरण करने की पैरवी की गयी थी, इस आन्दोलन में गाँवों को स्वायत्ता देने और प्रतिनिधियों को कार्यपालिका सम्भालने का अवसर देने की बात की गयी. इस तरह उनके एक राजनीतिज्ञ होते हुए भी सामजिक कार्यों में दिए गये योगदान ने भारतीय जन-मानस पर गहरा प्रभाव डाला.

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