भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1757 से 1947 तक (Indian Freedom Struggle In Hindi)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1757 से 1947 तक (Indian Freedom Struggle In Hindi)

दुनियाँ के मानचित्र में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र रहा हैं जिस पर हर एक योद्धा शासन करने को आतुर रहा हैं। जैसी ही हम भारत के गुलामी के समय पर बात करते हैं तो सहज ही हमारे मस्तिष्क में  अंग्रेज़ो के भारत पर हुकुमत और मोहनदास करमचंद गांधी का संघर्ष दस्तक देने लगता हैं लेकिन यह गुलामी और अत्याचार अंग्रेज़ो के आने के कई वर्षो पहले से देश में अपने पैर पसारे था और साथ ही इतना ही पुराना इसका संघर्ष रहा हैं। कई महान वीरों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये अपने जीवन को दाओं पर लगाया हैं। अंग्रेज़ो की हुकूमत के पहले भारत पर आर्य, फारसी, मुगल, ईरानी ने हमारा किया जिनका अपने – अपने प्रांत में बड़े जोश के साथ हिन्दू राजाओं, मराठो, राजपूतो ने डटकर सामना किया ।

भारत पर पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का राज प्लासी के युद्ध से शुरू हुआ जो कि 1857 की क्रांति तक देश में फैला हुआ था अर्थात 1757 से 1858 तक । इसके बाद भारत पर 1858 से 1947 तक भारत पर अंग्रेजों का राज रहा जो कि 15 अगस्त 1947 को खत्म हुआ और इस तरह पाकिस्तान का जन्म हुआ । जिसके बाद 15 अगस्त भारत का स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी भारत का गणतन्त्र दिवस घोषित किया गया ।

इस आर्टिकल में हम भारत में अंग्रेज़ो के आगमन और उनके गमन के बीच हुये कई महत्वपूर्ण किस्सों और आंदोलनों के बारे में जानेंगे ।

Indian Struggle for Freedom

ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुवात :

अंग्रेज़ो को भारत में व्यापार के अच्छे अवसर मिलने लगे और उन्होने बड़े स्तर पर इसे शुरू करने का तय किया। अंग्रेज़ो ने सन 1600 के अंत में रानी एलिज़ाबेथ के आदेश पर व्यापारियों का एक बड़ा दस्ता भारत भेजा। यह व्यापार पूर्वी भारत से शुरू हुआ। मुख्यतः भारत एवं दक्षिणी एशिया से यूरोपियन व्यापारियों ने व्यापार किया। इस तरह इस कंपनी का नाम “ईस्ट इंडिया कंपनी” रख दिया गया । 1617 में सर थॉमस रोए ने मुगल शासक जहाँगीर से सूरत में फेक्टरी डालने की इजाजत ली और जहाँगीर ने उन्हे इजाजत दे दी। दस सालो में इनका व्यापार इतना बढ़ गया कि इन्होने बॉम्बे में भी एक फेक्ट्री शुरू की। कुछ समय में ही भारत तीन प्रेसीडेंसी में बट गया जिनका नाम बॉम्बे, कलकत्ता एवं मद्रास प्रेसीडेंसी था । सभी प्रेसीडेंसी अपने नियमों के मुताबिक कार्य करती थी लेकिन सभी लंदन की अदालतों के प्रति उत्तरदायी थी।

अंग्रेजों ने व्यापार की त्रिकोणीय व्यवस्था बनाई। वे अपने सोने और चाँदी के सिक्को के बदले भारतीय अनाज खरीदते थे और इस अनाज का उपयोग चीन से सब्सिडाइज्ड समान लेने में करते थे। इससे अंग्रेज़ो को काफी लाभ मिला और वे इस तरह धनवान होते चले गये। अंग्रेज़ो यह व्यापार ईमानदारी से नहीं किया था जैसे- जैसे उनकी शक्ति बढ़ने लगी थी उन्होने देश की जनता पर अत्याचार शुरू कर दिये थे। अंग्रेज़ भारतीयो से लगान वसूलने लगे थे और लगान न देने की सूरत में गरीबों को ऋण भी अंग्रेज़ ही देते थे। ऐसे में अगर गरीब जनता ऋण ना चुका पाये तो अंग्रेज़ उनकी जमीन जायजाद पर हक जमा लेते थे। इस तरह अंग्रेज़ो की शक्ति हर तरफ से बढ़ती ही जा रही थी। इस तरह के कई कारणों के कारण अंग्रेजों का विरोध किया गया और प्लासी का युद्ध छिड़ गया ।

भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध :

भारत में ब्रिटिशर्स और फ्रांसीसी दोनों ही अपना व्यापारिक आधिपत्य चाहते थे । इसलिए इन दोनों के मध्य बहुत युद्ध लड़े गये । यह सभी युद्ध सन 1748 के आस पास लड़े गये । इस पूरे संघर्ष में फ्रांस की हार हुई जिसका मुख्य कारण फ्रांसीसी सेना के पास धन की कमी था क्यूंकि फ्रांस को भारत में उतनी रुचि नहीं थी जितनी ब्रिटिशर्स को थी इसलिए उनके पास इतना धन नहीं था । इस तरह आंग्ल सेना की जीत हुई ।

प्लासी का युद्ध: 

प्लासी का युद्ध अंग्रेज़ कंपनी और मुगलो के बीच हुआ था। यह युद्ध गंगा के तट पर प्लासी नामक स्थान पर वर्ष 23 जून 1757 को हुआ था। ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्मी का नेत्रत्व रॉबर्ट क्लाइव ने किया था और मुगलों की सेना का नेत्रत्व नवाब सिराज़ुद्दौला ने किया था, यह मुगल सेना बंगाल की थी। इस युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत हुई थी क्यूंकि नवाब सिराज़ुद्दौला के सेना नायक ने उन्हें धोखा दिया और अंग्रेजों के साथ मिल कर इस युद्ध को बंगाल की तरफ से नहीं लड़ा। और प्लासी के युद्ध की इस जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के साथ- साथ भारत की राजनीति में भी प्रवेश कर लिया और यहाँ से ब्रिटिश शासन का जन्म हुआ।

1765 में अंग्रेजों ने बंगाल पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और बिहार में भी मुगलो शासकों के नाम से लगान वसूलने लगे और अन्य स्थानों पर भी मुगल शासकों के शासन की अव्हेलना की। उस समय बंगाल का गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स था। इसके बाद अंग्रेज़ो ने 1764 में बक्सर का युद्ध जीता। अंग्रेजों ने 1799 में टीपू सुल्तान से युद्ध किया। टीपू सुल्तान को हराना आसान नहीं था अंग्रेज़ो ने उन्हे भी धोखे से मारा और उनके राज्य पर अपना अधिकार जमा लिया ।

मराठा और अँग्रेजी युद्ध :

मराठो से जितना भी अंग्रेजों के लिए बहुत मुश्किल था लेकिन वहाँ भी अँग्रेजी सेना ने मराठों के बीच पड़ी फुट का फायदा उठाया । मराठो के साथ 3 युद्ध किए जिनमे पहला 1775 – 1782 में हुआ, दूसरा 1803 – 1805 एवं तीसरा 1817 – 1819 में हुआ यह तीनों ही युद्ध अंग्रेजों से जीते।

टीपू सुल्तान की मृत्यु :

मैसूर और अंग्रेजों के बीच 33 वर्षों तक युद्ध चलता रहा । अंग्रेजों के बढ़ते क्रम में मैसूर अर्थात टीपू सुल्तान बहुत बड़ी रुकावट था । टीपू सुल्तान ने अँग्रेजो को कई सालों तक टक्कर दी उन दिनों इंग्लैंड और फ्रांस के बीच भी युद्ध चल रहा था तब टीपू के फ्रांस की मदद भी ली लेकिन भाग्य ने टीपू का साथ नहीं दिया और 4 मई 1799 को अंग्रेजों ने टीपू को मार दिया और उसकी तलवार को इंग्लैंड ले गये। टीपू की मृत्यु के साथ ही वहाँ अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हो गया ।

सिख और अंग्रेज़ युद्ध  :

सिखो और अंग्रेजों के बीच 2 युद्ध हुये जिसमें पहला 1845-46 के बीच हुआ यह युद्ध पाँच चरणों में हुआ जिसमें रणजीतसिंह अंगर्जों को मुंह तोड़ टक्कर दी लेकिन अन्य सिख राजाओं ने इनका साथ नहीं दिया और अङ्ग्रेज़ी हुकूमत के आगे झुक गए । इस तरह यह युद्ध अंग्रेजों ने जीता । इसके बाद २० फ़रवरी १८४६ को अंग्रेज़ लाहौर पहुंचे और सिख और अंग्रेजों के बीच संधि हुई और लारेंस को अधिकार सौंप दिये गए । और महाराज दिलीप सिंह के परिवार को पेंशन देने का निर्णय लिया गया । अब पंजाब का आधिपत्य बचा हुआ था ।

दूसरा युद्ध 1848-49 के बीच हुआ । यह दो चरणों में हुआ पहला चरण 13 जनवरी 1849 को  चिलियाँवाला में हुआ जहां दोनों पक्ष भारी पड़े और किसी की  हार नहीं हुई । दूसरा चरण 21  फरवरी गुजरात में हुआ जहां सिख सेना को बहुत नुकसान हुआ और सिखो की हार हुई इस तरह पंजाब भी पूरी तरह अंग्रेज़ो के आधीन हो गया ।

1848 में लॉर्ड डलहौजी और केनिन ने भारत में प्रवेश किया और देश में कंपनी की कमान संभाली। इन दोनों ही भ्रष्ट तरीके अपनाकर देश के कई हिस्सों को अपने अधीन कर लिया जिनमें संभालपुर, बघत, झाँसी, नागपुर और अवध थे ।

1853 में अंतिम मराठा नाना साहेबसे उनकी विरासत छिन लेने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की ताकत बहुत बढ़ गई और इस तरह अंग्रेज़ो ने पूरी तरह से भारत को अपने आधीन कर लिया ।

1857 : भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम

1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता हैं । यह लड़ाई मुख्य रूप से 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुई थी जो कि धीरे से देशव्यापी हो गई । वैसे तो इस लड़ाई में भी नेत्रत्व की कमी थी और इसी कारण आपसी फुट को हथियार बनाकर अंग्रेजों ने इस संग्राम को जीत लिया. यह वह समय था जब अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था । और भारत को तेजी से अपने में मिलाने के लिए लॉर्ड डलहौजी ने हड़प नीति [जिस राजा की स्वयं की संतान ना हो उस राज्य को अंग्रेजों को सौंप देना] शुरू कर दी थी जिसे कोई राजा मानना नहीं चाहता था ।

इसके अलावा अंग्रेजों ने संपत्ति के अधिकारों को लेकर भी नीतियों में बड़े बदलाव किए जिसके अनुसार जो व्यक्ति क्रिश्चय नहीं हैं उन्हे पूर्वजों की संपत्ति नहीं मिलेगी और भी कई तरीकों से अंग्रेजों ने भारतियों के धर्म बदलने की कोशिश की, इस तरह का बर्ताव सेनिकों के साथ भी किया गया। लॉर्ड केनिन ने कई नीतियों में बदलाव किया जैसा कारण उस समय देश में हर तरफ लोगों में अङ्ग्रेज़ी हुकूमत के किलाफ़ बहुत गुस्सा था तब ही सेनिको को ऐसे कारतूस इस्तेमाल में दिये गये जिसमें गाय और सूअर के मांस की चर्बी थी जो कि उनके धार्मिक रीतियों का मज़ाक था इससे आक्रोशित होकर मंगल पाण्डेय ने 10 मई 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया । इस तरह जगह – जगह अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़े बुलंद होने लगी, पहले भी कई आंदोलन (संन्यासी आंदोलन चुनार आंदोलन, किसान आंदोलन, फराइजी आंदोलन आदि) हुये लेकिन वे सब क्षेत्रीय स्तर पर ही  प्रभावित रहे, लेकिन 1857 की क्रांति ने व्यापक रूप ले लिया जो पूरे देश में फैला लेकिन कई कारणो से 1857 की क्रांति समाप्त हो गई और इस तरह 14 महीनो बाद लॉर्ड केनिन ने घोषणा की कि आंदोलन समाप्त हो चुका हैं लेकिन आंदोलन के कारण हड़प नीति का अंत हुआ और भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर महारानी विक्टोरिया के हाथों में चला गया ।

1885 : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

1857 की क्रांति के बाद भारत सीधे – सीधे अंग्रेजों का गुलाम हो गया था क्यूंकि अब कंपनी का राज समाप्त हो चुका था और महारानी विक्टोरिया ने देश पर शासन शुरू कर दिया था । इस सबके कारण जगह जगह विद्रोह होता ही रहता था। कभी भी भारतियों ने इस परतंत्रता को उदासीनता से स्वीकार नहीं किया था। हमेशा अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन होते रहे हैं ।

ऐसे में अँग्रेजी हुकूमत और भारतीय जनता के मध्य तालमेल की कमी को देख कहा जाता हैं अँग्रेजी हुकूमत ने ही भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना का मंच तैयार किया और इस तरह 1885 में ए. ओ. ह्यूम एवं जनरल लॉर्ड डफर ने 28 दिसंबर 1885 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई जिसका सबसे पहला अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बेनर्जी को बनाया गया । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के पहले ही भारत में दादा भाई नौरोजी जैसे व्यक्तियों ने कई दल बनाने की कोशिश की पर वे राष्ट्र स्तर पर बन ना सके । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारतीयों का पहला राजनीतिक दल बना जिसने पूरे देश को एक किया ।

1905 : अंग्रेजों द्वारा बंगाल का विभाजन

बंगाल विभाजन अंग्रेज़ो की “फूट डालो और राज करो” की नीति का एक बहुत बड़ा उदाहरण हैं । यह विभाजन बंग-भंग के नाम से जाना जाता हैं और इसे लॉर्ड कर्ज़न ने किया था । बंगाल विभाजन की शुरुवात 1903 से ही शुरू हो गया था लेकिन 1904 में इसका ऐलान किया गया । असल में बंगाल एक बड़ा स्थान था और यहाँ के व्यक्ति अधिक पढ़े लिखे एवं समझदार होते थे। और बंगाल ही एक ऐसा स्थान था जहां से अंग्रेजों के खिलाफ आवाज ज्यादा बुलंद होती थी इसलिए अंग्रेजों ने इसे भारत से अलग करने का फैसला लिया । इस अधिनियम पर कई बहस हुई और अंतिम फैसला 19 जुलाई 1905 को लिया गया और इस तरह 16 अक्टूबर 1905 में बंगाल का विभाजन प्रारंभ हुआ ।

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना :

1906 अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में अखिल भारतीय मुहम्मडन शैक्षिक सम्मेलन में की गई । बंगाल विभाजन के दौरान बनी विकट परिस्थितियों के कारण अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का जन्म हुआ । इसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समाज के हितों के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेना था । उस समय दो ही राजनैतिक पार्टियां थी भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस एवं  अखिल भारतीय मुस्लिम लीग । अखिल भारतीय मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रिय काँग्रेस ने एकजुट होकर कई बार अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन किए थे। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने देश विभाजन में मुख्य भूमिका निभाई थी ।

1915 होम रूल लीग की स्थापना की :

प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत के ब्रिटेन का साथ दिया था जिसके पीछे भारत की एक ही शर्त भी वो थी भारत की आजादी, लेकिन ब्रिटेन के आला अफसरो के बर्ताव से यह साफ जाहीर होने लगा था कि वे इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएंगे जिस कारण भारतियों में बहुत आक्रोश उत्तपन्न हो गया था । तब ही 1915  में होम रूल लीग की स्थापना की स्थापना की गई जिसमें दो होम रूल आए जिसमें पुणे होम रूल लीग’ जिसकी स्थापना बाल गंगाधर तिलक ने और ‘मद्रास होम रूल लीग’ की स्थापना एनी बेसेंट द्वारा सन 1915 और 16 के बीच की गई । इस लीग का मुख्य उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग था । इस लीग को सभी के सामने ताकतवर बनाने के लिए इसका ध्वज भी तैयार किया गया था जिसमें पांच लाल और चार हरी तिरछी पट्टियाँ बनाई गई थी । इस लीग का उद्देश्य केवल स्वशासन की मांग था लेकिन इसकी बड़ी शर्त यह थी कि हथियारों का उपयोग किसी भी स्थिती में नहीं किया जायेगा । होम रूल लीग बहुत दिनों तक नहीं चला और 1920 में यह भारतीय राष्ट्रिय काँग्रेस में शामिल हो गया ।

खिलाफत आन्दोलन, जलियांवाला हत्याकांड, रौलट एक्ट एवं असहयोग आंदोलन :

यह आंदोलन 1920 में हुआ था। इसे पूरे देश में गांधी जी ने नेत्रत्व में लागू किया गया था । यह समय प्रथम विश्व युद्ध का था जिसमे भारत के अंग्रेजों का साथ दिया था लेकिन उस समय अंग्रेजों ने अत्याचार की सभी सीमायेँ पार कर दी थी और 1919 में देश मे रोलेट एक्ट लाने का प्रस्ताव रखा यह एक ऐसा एक्ट जिसमें भारतियों के बोलने तक की स्वतंत्रता छीन ली सकती थी जिसे भारतीयों के लिए अंधा कानून कहा जा सकता था । इसी समय 1919 में पंजाब में जालियाँवाला बाग हत्याकांड भी हुआ जिसमे जनरल डायर ने भरी सभा में गोलीबारी कर हजारों लोगो की बेरहमी से हत्या कर दी थी। 1919 से 1922 के बीच खिलाफत आंदोलन हुआ जिसका कारण यह था कि प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की हार गया था और ब्रिटेन ने तुर्की के खलीफा को पद से हटाने का हुक्म दिया जिस कारण मुस्लिम समुदाय ने तुर्की को समर्थन देने के लिए खिलाफत आंदोलन शुरू किया गया । इस तरह रोलेट एक्ट और जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में और खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने के उद्देश्य से गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का ऐलान किया जिसके तहत सभी से यह अपील की गई कि वे अँग्रेजी हुकूमत को किसी भी कार्य में सहयोग ना दे, साथ ही उनके द्वारा दिये गए खिताबों को लौटा दे। गांधी जी को अंग्रेजों ने कैसरे हिन्द का खिताब दिया था जिसे इन्होने असहयोग आंदोलन के समय लौटा दिया । असहयोग आंदोलन पूरे देश में सफलता पूर्वक चलता रहा ।

चौरी चौरा काण्ड

भारतीय किसान और कई लोग अंग्रेजों के अत्याचार से बहुत नाराज थे तब देश में असहयोग आंदोलन जोरों पर था तब ही एक मोर्चा निकाला गया जो 2 फरवरी 1922 को चौरी चौरा स्थान से गुजर रहा था इस मोर्चे में लगभग 2500 लोग थे । पुलिस ने सभी पर लाठी चार्ज किया तब मोर्चे में शामिल लोगो को गुस्सा आ गया और लोगों ने मिलकर चौरी – चौरा नामक स्थान बनी पुलिस चौकी को जला दिया जिसमें 22 पुलिस कर्मी जिंदा जल गए इसे चौरी चौरा कांड कहा गया । यह खबर पूरे देश में फ़ेल गई, कइयों ने इसे भारतियों की हिम्मत कहा, तो कइयों ने इसकी खुलकर निंदा की । लेकिन चोरी चोरा नामक स्थान पर हिंसात्मक गतिविधियाँ हुई जिनमें नौजवान क्रांतिकारियों का नाम हिंसा के साथ जुड़ता देख, गांधी जी को काफी निराशा हुई और उन्होने असहयोग आंदोलन वापस लेने का आदेश दे दिया । गांधी जी के इस निर्णय का कई क्रांतिकारियों ने विरोध किया जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, और भगत सिंह जैसे वीरों के नाम शामिल थे और इसके कारण काँग्रेस का दो दलों में विभाजन हो गया । वे दल थे नरम दल एवं गरम दल ।

साइमन आयोग :

1927 में भारत में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन को भेजा इस कमीशन का शुरुवाती नाम भारतीय संवैधानिक आयोग था लेकिन इसके अध्यक्ष सर जॉन आलसेब्रूक साइमन थे इसलिए इसका नाम “साइमन कमीशन’ रखा गया । साइमन कमीशन का मुख्य उदेश्य भारत के संविधान में कुछ सुधार करना था जिससे उसका विकास हो सके और इसके लिए सात सदस्यो को भारत भेजा गया था जिसमें एक भी भारतीय नहीं था क्यूंकि लॉर्ड बिरकनहेड (ब्रिटेन की राजनैतिक पार्टी के अध्यक्ष) का मानना था कि भारतीय इस योग्य नहीं कि उन्हे इस तरह के कमीशन का हिस्सा बनाया जाये । इस तरह के अपमान को भारतवासी ने सहन नहीं किया और साइमन कमीशन का खुलकर विरोध किया गया जिसके लिए “गो बेक साइमन” के नारे लगाए जाने लगे ।   

जब यह कमीशन लाहौर पहुंचा तब इसका विरोध लाला लाजपत राय की अगुवाई में किया गया तब अँग्रेजी हुकूमत (जेम्स ए स्कॉट) ने लाठी चार्ज का हुकुम दे दिया और लाला लाजपत राय को गंभीर चोटे आई जिससे वे उभर नहीं पाये  और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई और यही कारण बना भगतसिंह जैसे नेता ने असेंबली में बम फोड़ा क्यूंकि वे भी राय जैसे बहुमूल्य नेता की मृत्यु से आहात थे ।

साइमन कमीशन का बहुत विरोध हुआ इस कारण इसे संशोधित रूप में 1930 में लागू किया गया लेकिन इस कमीशन ने भारतियों को अपने देश का संविधान बनाने के प्रति जागरूक किया।

पूर्णस्वराज, दाण्डी यात्रा और नमक सत्याग्रह, प्रथम गोलमेज सम्मेलन

26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज की मांग करते हुये उस दिन को देश का स्वतंत्रता दिवस मनाया गया उसके पहले लाहौर में आधिकारिक रूप से झण्डा फहराया गया । पूर्ण स्वराज एक बड़ा आंदोलन था । इसी को आगे बढ़ाते हुये गांधी जी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक की पैदल यात्रा की जिसे दांडी यात्रा कहा जाता था जिसे गांधी जी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती से शुरू किया था, जिसमें कई अनुयायी शामिल हुये और इस यात्रा का पूरे देश में हर्षोउल्लास से स्वागत किया गया । इस यात्रा में दांडी नामक स्थान पर गांधी जी ने समुद्री पानी ने नमक बनाकर अंग्रेजों का नमक कानून तोड़ा और अहिंसा से अँग्रेजी सरकार का विरोध किया । नमक तोड़ कर देशवासियों ने अंग्रेजों द्वारा वसूले जाने वाले नमक कर का विरोध किया । इस आंदोलन में सभी वर्गो, समुदायों, जातियों एवं महिलाओं ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया ।  भारतवासियों ने मिलकर आंदोलन किया और जगह – जगह नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा गया ।

गोलमेज सम्मेलन:

साइमन कमीशन के कड़े विरोध और नमक कानून तोड़कर सभी भारतियों को संगठित होता देख अँग्रेजी हुकूमत को समझ आ गया था कि अब भारतवासी को कम आंकना सही नहीं हैं और इस तरह साइमन कमीशन में सुधार अर्थात संविधान में सुधार के लिए भारतीय को गोलमेज़ सम्मेलन का न्यौता दिया गया ।

1930 से 32 के बीच में तीन गोलमेज़ सम्मेलन आयोजित किये गए इन सभी में भारत को शामिल किया गया ।

  1. पहला गोलमेज़ सम्मेलन : यह नवंबर 1930 से जनवरी 1931 के बीच चला । लेकिन इसमे काँग्रेस से किसी ने भी भाग नहीं लिया क्यूंकि जब तक वे सभी जैल मे थे । इस सम्मेलन में कोई ठोस निर्णय नहीं लिए जा सके ।
  2. दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन : यह सितंबर 1930 से दिसंबर 1931 तक चला । इसमें काँग्रेस की तरफ से गांधी जी ने भाग लिया । इस सम्मेलन में संप्रदाय के अनुसार सीटों के बँटवारे पर बातचीत हुई जिसमे मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों का साथ दिया और इस तरह सांप्रदायिक तौर पर सीटों का बंटवारा होना तय हुआ । इस सम्मेलन में गांधी और इरविन समझौते पर भी बातचीत की गई जिसमें यह तय हुआ कि आंदोलनकारियों को जेल से मुक्त किया जाये, सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लिया जायेगा ।
  3. तीसरा गोलमेज़ सम्मेलन : यह सम्मेलन नवम्बर 1932 से दिसम्बर 1932 के बीच चला जिसके परिणाम स्वरूप एक श्वेत पत्र जारी किया गया । जिसके परिणाम स्वरूप भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित किया गया ।

आजाद हिन्द फौज :

सुभाष चन्द्र बोस ने असहयोग आंदोलन के दौरान काँग्रेस का हिस्सा बने और सारे आंदोलनों में अपना योगदान दिया । 1938 में वे काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए लेकिन कई मुद्दो पर वो गांधी जी की विचारधार से सहमत नहीं थे । और इस तरह 1939 में उन्होने काँग्रेस को त्याग दिया । और अपनी एक नई पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया । इस पार्टी ने उस वक़्त काँग्रेस के सामने विपक्ष दल का कार्य किया था । द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाष चन्द्र बोस 1943 में सिंगापूर पहुंचे और इंडियन इंडिपेंडेंट लीग का नेत्रत्व अपने हाथों में लिया और आजाद हिन्दी फ़ौज का गठन किया । इंडियन इंडिपेंडेंट लीग एक ऐसा समूह था जिसमें युद्ध बंदी भारतीय एवं वे भारतीय जो दक्षिण पूर्वी एशिया में रह रहे थे वे शामिल थे । इसका गठन राष बिहारी बोस ने किया था वे एक भारतीय क्रांतिकारी थे जिसने भारत से भागकर जापान में रहकर देश की आजादी के लिए लोगो को एकत्र किया था ।

नेताजी ने एक महिलाओं की टुकड़ी भी तैयार की थी जिसका नाम रानी झांसी रेजीमेंट और इसकी कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन थी । आजाद हिन्द फौज ने भारत की आजादी में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई लड़ाइयाँ लड़ी। आजाद हिन्द फौज से भारत को बहुत बड़ा सहयोग मिला जिसका फायदा गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उठाया ।

भारत छोड़ो आंदोलन :

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आजाद हिन्द फौज को दिल्ली चलो का नारा दिया उसी जोश के साथ 8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने काँग्रेस मुंबई अधिवेशन में करो या मरो का नारा दिया और भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया । यह सभी बड़े आंदोलनों में से एक था जिससे निपटना अंग्रेजों के लिए बहुत कठिन साबित हुआ था । इस आंदोलन के ऐलान के तुरंत बाद ही गांधी जी की गिरफ्तारी हो गई थी । इस आंदोलन में देश के सभी हिस्सो को एक कर लिया था और सभी जगह अंग्रेज़ो के खिलाफ आवाज़े बहुत तेज हो चुकी थी ।

नौसेना विद्रोह (मुंबई)

18 फरवरी 1946 को आजादी के तकरीबन 1 वर्ष पहले मुंबई स्थित नौ सेना के अंग्रेज़ो के खिलाफ विद्रोह कर दिया था । यह बहुत बड़ा विद्रोह था लेकिन इसका जिक्र कम मिलता हैं । यह विद्रोह मुंबई से प्रारम्भ हुआ इसे समूचे देश ने समर्थन दिया और इस तरह यह कलकत्ता और कराची मे भी देखा गया । असल में यह विद्रोह इसलिए शुरू हुआ क्यूंकि नाविकों को बहुत ही खराब खाना दिया जा रहा था साथ ही उनके साथ काले गौरे का भेद भी किया जा रहा था जिसके चलते उन्हे कम वेतन तक दिया जाता था । साथ ही अगर प्रमोशन चाहिए तो कुछ ऐसे नियम थे जिनके कारण धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती थी जिसका उपाय केवल एक था कि वे अपना धर्म बदले और नियमों का पालन करे जिससे प्रमोशन मिल सके । यह सभी बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण नाविकों ने 18 फरवरी भूख हड़ताल कर दी जिसे रोकने के लिए 20 फरवरी सेना की टुकड़ी बुलाई गई दोनों तरफ से युद्ध हुआ लेकिन दोनों में से कोई पक्ष जीत के करीब नहीं था तो युद्ध रोक दिया गया । इस विद्रोह को पूरे देश में समर्थन मिला जिसके परिणाम स्वरूप 22 फरवरी तक 78 जहाज, 20 तट और 20,000 नौसैनिक शामिल हुये । जब विद्रोह बहुत ज्यादा बढ़ गया तो काँग्रेस के सदस्यो की सहायता ली गई और इस तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल एवं जिन्ना ने सैनिको को 23 फरवरी को आत्म समर्पण करने के लिए माना लिया । इस तरह यह विद्रोह शांत किया गया ।

भारत का विभाजन एवं अंग्रेजों से आजादी

इतने संघर्षों एवं आंदोलनों के बाद वो दिन आ गया जब  भारत को स्वतंत्रता मिली लेकिन इसमे अंग्रेज़ो की फुट नीति ने अपना काम पूरा कर दिया क्यूंकि स्वतंत्रता के साथ – साथ भारत का विभाजन भी हो गया । इस विभाजन का फैसला 18 जुलाई 1947  भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 में ले लिया गया । लेकिन इसे  माउण्टबैटन योजना कहा गया और इस तरह हिन्दू बाहुल्य को भारत और मुस्लिम बाहुल्य को पाकिस्तान के रूप में अलग किया गया । दोनों ही देशों में विभाजन प्रक्रिया के लिए  माउण्टबैटन का रहना जरूरी था इसलिए 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में प्रक्रिया शुरू की गई इसलिए वहाँ 14 अगस्त आजादी का दिन माना जाता हैं और भारत में यह प्रक्रिया 15 अगस्त को की गई इसलिए भारत 15 अगस्त 1947 को आजादी मनाता हैं ।

इस तरह पूरा आर्टिकल पढ़ कर यह समझा जा सकता हैं कि भारत ने हमेशा अंग्रेज़ो का डटकर मुक़ाबला किया हैं और हमेशा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया और इस तरह भारत की आजादी का सफर चलता रहा ।

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