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गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय | Guru Teg Bahadur Biography In Hindi

गुरु तेग बहादुर का जीवन परिचय(Guru Teg Bahadur Biography In Hindi)

सिख धर्म के प्रसिद्ध गुरु तेग बहादुर सिखों के नौवें गुरु थे. गुरु तेग बहादुर सिंह जी को 20 मार्च 1664 को सिक्कों का गुरु बनाया गया. गुरु तेग बहादुर सिंह जी सिक्खों के गुरु के रूप में 24 नवंबर 1675 तक सिख गुरु की गद्दी पर आसीन रहे थे. इनको सिखों द्वारा प्रेम से ‘हिंद की चादर’ के नाम से भी सम्मानित किया जाता था. गुरु तेग बहादुर एक महान शिक्षक के रूप में जाने वाले एक उत्कृष्ट योद्धा, विचारक और कवि भी थे. सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी ने आध्यात्मिक एवं अन्य बातों के अलावा ईश्वर, मन , शरीर और शारीरिक जुड़ाव की प्रकृति का विस्तृत विवरण लिखा हुआ था. उनके द्वारा लिखित लेखन को “गुरु ग्रंथ साहिब” ग्रंथ में 116 काव्यात्मक भजनों के रूप में प्रस्तुत किया गया है. गुरु तेग बहादुर जी प्रसिद्ध यात्री भी थे और जिन्होंने पूरे भारत के उपमहाद्वीप में उपदेश केंद्र स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अपने इस यात्रा के मिशन में पंजाब में चाक – नानकी नामक शहर की स्थापना की. बाद में यह आनंदपुर साहिब का हिस्सा बन गया. तो आइए जानते हैं , इस लेख में सिखों के प्रसिद्ध नौवें गुरु , गुरु तेग बहादुर सिंह के बारे में.

Guru Teg Bahadur

परिचय बिंदु (Introduction Points)

 

परिचय (Introduction)
पूरा नाम (Full Name)
गुरु तेग़ बहादुर सिंह
जन्म दिन(Birth Date)

 

18 अप्रैल, 1621
जन्म स्थान (Birth Place)

 

अमृतसर, पंजाब
पेशा (Profession)

 

सिक्खों के नौवें गुरु
राजनीतिक पार्टी (Political Party)

 

——
राष्ट्रीयता (Nationality)

 

भारतीय
उम्र (Age)

 

54 वर्ष
गृहनगर (Hometown)

 

—–
धर्म (Religion)

 

सिख़
वंश (Genus)

 

——
जाति (Caste)

 

सिख़
वैवाहिक स्थिति (Marital Status)

 

विवाहित
राशि (Zodiac Sign)

 

—–

गुरु तेग बहादुर सिंह जी का प्रारंभिक जीवन परिचय –

सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर सिंह जी का जन्म पंजाब के अमृतसर में 1 अप्रैल 1621 में हुआ था. गुरु तेग बहादुर सिंह जी का बचपन का नाम त्याग मल था . उनके पिताजी का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह था. तेग बहादुर जी की मां का नाम माता नानकी था. तेग बहादुर जी के पिता सिखों के छठवें गुरु थे. त्याग मल जी ने बचपन में श्रद्धेय विद्वान, भाई गुरदास से संस्कृत, हिंदी और गुरुमुखी सीखा. इतना ही नहीं त्याग मल जी ने घुड़सवारी और तीरंदाजी की शिक्षा बाबा बुध जी द्वारा प्राप्त की और गुरु हरगोबिंद जीने उनको तलवार चलाना सिखाया था. जब त्याग मल जी सिर्फ 13 वर्ष के आयु के थे, तब उन्होंने अपने पिताजी गुरु हरगोबिंद सिंह जी के साथ मिलकर मुगलों के खिलाफ लड़ाई लड़े और करतारपुर में घेराबंदी कर दी. गुरु हरगोबिंद सिंह जी और त्याग मल जी के पराक्रम के वजह से ही करतारपुर को सिखों ने सफलतापूर्वक मुगलों से बचा लिया था. इस युद्ध में त्याग मल के द्वारा  महान वीरता और बेहतर सैन्य पराक्रम देखकर गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने अपने बेटे को ‘तेग बहादुर’ की उपाधि से संबोधित किया. तेग बहादुर का शाब्दिक अर्थ ‘बहादुर तलवारधारी’ होता है. इसके बाद से त्याग मल, तेग बहादुर के नाम से जाने जाने लगे.

1632 में तेग बहादुर की शादी माता गुजरी से हुई.  फिर इसके बाद अपनी शादी के कुछ समय उपरांत तेग बहादुर अधिकांश समय ध्यान में बिताना पसंद करने लगे और फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने आप को लोगों से अलग कर दिया. 1644 में गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने तेग बहादुर को अपनी पत्नी और अपनी मां के साथ बकाला नामक एक गांव में स्थानांतरित होने के लिए कहा. इसके बाद अगले 2 वर्षों तक तेग बहादुर जीने बकाला गांव में एक भूमिगत कमरे में ध्यान करते हुए अपना अधिकतर समय बिताने लगे फिर जहां पर, उन्हें बाद में नौवें सिख गुरु के रूप में पहचाना गया. बकाला में रहने के दौरान तेग बहादुर जी ने बड़े पैमाने पर यात्राएँ की  और यहां तक कि आठवें सिख गुरु, गुरु हर कृष्ण जी से मिलने के लिए दिल्ली तक भी पहुंच गए थे.

पारिवारिक परिचय (Introduction Of Family )

 

परिचय (Introduction)
माता / पिता  (Mother & Father )गुरु हरगोविंद सिंह और माता नानकी
 पत्नी ( Wife )माता गुजरी
 पुत्र ( Son )गुरु गोविंद सिंह

गुरु तेग बहादुर सिंह जी की धर्म यात्राएं –

धर्म के प्रचार के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने कई स्थानों की यात्राएं की. कई स्थानों के भ्रमण करते हुए वे आनंदपुर साहब से किरतपुर, रोपण, सैफाबाद से होकर वह ख़िआला यानी ‘खदल’ पहुंच गए. ख़िआला में धर्म उपदेश देते हुए वे , दमदमा साहब से होकर कुरुक्षेत्र पहुंच गए. कुरुक्षेत्र से होते हुए तेग बहादुर जी ने यमुना के किनारे से होकर कड़ामानकपुर पहुंच गए और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूक दास जी का उद्गार किया.  गुरु तेज बहादुर जी ने धर्म प्रचार एवं लोगों के लिए सहज मार्ग हेतु कई अनेक स्थानों की यात्राएं की जैसे प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में यात्रा करते हुए पहुंचे. उनके द्वारा की गई इन क्षेत्रों में यात्राओं में ज्यादातर आध्यात्मिक, सामाजिक , आर्थिक उन्नत के लिए एवं रचनात्मक कार्य भी सम्मिलित थे. गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने मानव कल्याण हेतु, आध्यात्मिकता , धर्म , सच्चाई का ज्ञान लोगों को वितरित किया. इतना ही नहीं उन्होंने रूढ़ियों , अंधविश्वासों की आलोचना की और नए आदर्शों की स्थापना भी की.

तेग बहादुर जी ने मानव कल्याण हेतु  कुएँ खुदवाना , धर्मशालाएं बनवाना आदि जन परोपकार के लिए कार्य भी किए . इन्हीं जनकल्याण एवं धर्म यात्राओं के बीच 1666 में गुरु जी के यहां पटना साहब में पुत्र धन की प्राप्ति हुई. गुरुजी का यही पुत्र आगे चलकर सिखों के दसवें गुरु , ‘गुरु गोविंद सिंह’ जी के नाम से जाने गये .

गुरु जी के द्वारा लेखन कार्य –

सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी ने बहुत सी रचनाएं लिखी जो ग्रंथ साहब के महला 9 में संग्रहित हैं. तेग बहादुर जी ने अपनी रचनाओं को  शुद्ध हिंदी में सरल एवं भाव युक्त ‘पदों’ और ‘साखी’ जैसी रचनाओँ को लिखकर प्रस्तुत किया. गुरु जी ने मानव कल्याण हेतु एवं धर्म की रक्षा के लिए स्वयं एवं अपने दो शिष्यों के साथ खुद को बलिदान कर दिया. उन्होंने अपने देश एवं देश के नागरिकों के हित के लिए अपने देश की संस्कृति को सुदृढ़ बनाया और धार्मिक, संस्कृति वैचारिक  को जनता के नाते लोगों को स्वतंत्र एवं निर्भरता के साथ जीवन जीने का रास्ता दिखाया.

धर्म के लिए गुरु तेग बहादुर की बलिदान गाथा –

उस समय की बात है, औरंगजेब का जब शासन काल था, तो उसके दरबार में एक विद्वान पंडित आकर “भागवत गीता” का श्लोक पड़ता और उसका अर्थ औरंगजेब को समझाता था. गीता का श्लोक सुनाते समय पंडित औरंगजेब को कुछ गीता के श्लोकों एवं उसके अर्थों का वर्णन नहीं किया करता था. एक दिन दुर्भाग्यवश पंडित की तबीयत खराब हो गई और उसने औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए अपने पुत्र को भेज दिया.  परंतु उसने अपने पुत्र को यह नहीं बताया कि , कुछ गीता के श्लोकों को वह औरंगजेब के सामने वर्णित नहीं किया करता था. पंडित के बेटे ने जाकर गीता का संपूर्ण रूप उसके अर्थ के साथ से वर्णन औरंगजेब के सामने कर दिया. जिससे औरंगजेब को यह ज्ञात हो गया, कि हर जाति के धर्मों का अपना एक अलग ही महत्व है एवं हर धर्म अपने में महान धर्म होता है.

परंतु औरंगजेब केवल अपने धर्म को ही महत्वता देता था, और किसी अन्य धर्म की प्रशंसा सुनना ही पसंद करता था. फिर तुरंत औरंगजेब के सलाहकारों ने उसे यह बताया कि सभी धर्मों के लोगों को केवल इस्लाम धर्म ही धारण करवा देना चाहिए. औरंगजेब को यह सलाह पसंद आई और उसने सबको इस्लाम धर्म धारण करने का आदेश दिया और इस कार्य को पूरा करने के लिए कुछ लोगों को जिम्मेदारी भी सौंप दी.
उसने यह सख्त आदेश जारी करवाया की सभी धर्मों एवं जाति के लोगों को केवल इस्लाम धर्म ही कबूल करना होगा अन्यथा उनको मौत के घाट उतार दिया जाएगा. इस तरह औरंगजेब ने जबरदस्ती अन्य धर्मों के लोगों को इस्लाम धर्म धारण करने पर मजबूर करना शुरू कर दिया और उन्हें प्रताड़ित भी किया.

औरंगजेब के इस प्रताड़ना से प्रभावित होकर कश्मीर के पंडित गुरु तेग बहादुर सिंह जी के पास पहुंच गए और उन्हें बताया कि औरंगजेब ने किस तरीके से इस्लाम धर्म को अन्य धर्म के लोगों को धारण करने का आदेश दिया है और उन लोगों को बहुत ही दुख दायक तरीके से प्रताड़ित किया जा रहा है. इतना ही नहीं उन्होंने बताया कि उनकी बहू-बेटियों की इज्जत को बहुत खतरा रहता है और जिस जगह पर वे लोग पानी भरने जाते हैं वहां पर हड्डियां एवं अन्य प्रकार की धर्म भ्रष्ट हेतु की चीजें फेंक दी जाती हैं. यह सब कुछ समस्याओं का वर्णन उन्होंने गुरु तेग बहादुर सिंह जी के सामने किया और कहा कि हमें और हमारे धर्म को सुरक्षित करें.

जिस वक्त कश्मीरी पंडित अपनी समस्याओं का वर्णन गुरु तेग बहादुर सिंह जी के सामने कर रहे थे, उसी समय वहां पर उनके 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंद सिंह) पहुंच गए और अपने पिताजी से यह पूछने लगे कि यह सभी लोग इतने उदास एवं भय पूर्ण क्यों लग रहे हैं ? और पिताजी आप इतने गंभीरतापूर्वक किस चीज का विचार कर रहे हैं ? गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने कश्मीरी पंडितों की सभी समस्याओं का वर्णन अपने सुपुत्र बाला प्रीतम के सपने किया .

गुरु जी के पुत्र ने गुरु जी से पूछा कि कैसे इन लोगों की सहायता करके इनको विषम परिस्थिति से बाहर निकाला जा सकता है ? इस पर गुरुजी ने अपने पुत्र को जवाब दिया कि इस विषम परिस्थिति से उभरने के लिए बलिदान देना होगा. इसके जवाब में उनके सुपुत्र बाला प्रीतम जी ने कहा कि, इस जनहित के कार्य को करने के लिए आप जैसा कोई -और योग्य पुरुष नहीं है. भले ही आपको इसके लिए बलिदान देना पड़े आप बलिदान दीजिए परंतु इनके धर्म की रक्षा अवश्य करें.

बाला प्रीतम की बातों को सुनकर वहां उपस्थित सभी लोगों ने उनसे यह कहां, कि यदि आपके पिता श्री ने बलिदान दे दिया तो आप अनाथ हो जाओगे और आपकी माता को विधवा के रूप में जीवन व्यतीत करना होगा. इस पर बाला प्रीतम ने उपस्थित वहां सभी लोगों को यह जवाब दिया, कि यदि सिर्फ एक की बलिदानी से लाखों मासूम बच्चे अनाथ होने से बच जाएंगे और यदि सिर्फ मेरी माँ के विधवा होने से अनेकों माएँ विधवा होने से बच सकती है, तो मुझे यह बलिदान गर्व से मंजूर है.

इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों को एक संदेशा औरंगजेब को पहुंचाने के लिए कहा उन्होंने बोला कि , “औरंगजेब यह कह दो, कि यदि तेग बहादुर जी इस्लाम कबूल कर लेंगे तो हम भी अपनी स्वेच्छा से इस्लाम धर्म को कबूल कर लेंगे और अगर गुरु जी ने आपके इस्लाम धर्म को कबूल नहीं किया तो हम भी आपके धर्म को कबूल नहीं करेंगे और आप हम पर किसी भी प्रकार का जुल्म इस्लाम धर्म को कबूल करने के लिए नहीं करोगे  और जबरन इस्लाम धर्म को भी कबूल करने के लिए बाधित नहीं करोगे”. औरंगजेब ने उनकी कही बातों को स्वीकार कर लिया.

इसके बाद गुरु तेग बहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में अपनी स्वेच्छा से पहुंच गए. इसके बाद औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को इस्लाम धर्म कबूल करवाने के लिए अनेकों प्रकार के लालच दिए और इतना ही नहीं इस्लाम धर्म कबूल ना करने पर उनको अनेकों तरीके से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं उनको इस्लाम धर्म कबूल करवाने के लिए बंदी बनाकर उनके सामने उनके दो-शिष्यों को मौत के घाट उतार दिया गया है.जिससे औरंगजेब ने सोचा कि ऐसा करने से गुरु तेग बहादुर यह देखकर भयभीत हो जाएंगे और आसानी से इस्लाम कबूल कर लेंगे.

परंतु इससे भी गुरु तेग बहादुर जी टस से मस नहीं हुए और अपने अटल निर्णय पर डटे रहे. गुरु तेग बहादुर जी ने औरंगजेब यह कहा कि, जो तुम यें जबरन लोगों को इस्लाम धर्म कबूल कबूल करने के लिए मजबूर कर रहे हो ना , तो यह भी समझ लो, कि तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो. तुम्हारा इस्लाम धर्म तुमको यह अनुमति नहीं देता कि तुम किसी भी अन्य धर्म को जबरन अपने धर्म में परिवर्तित करो.

औरंगजेब को गुरु तेग बहादुर की यह बातें बहुत बुरी लगी और उसे बहुत गुस्सा आया. औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर जी को शीश काटकर मृत्युदंड देने का हुक्म दे दिया.

गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान –

औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर जी को 24 नवंबर 1675 को शीश काटकर मृत्युदंड देने का आदेश दे दिया. सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी के याद में उनके “शहीदी स्थल” पर गुरुद्वारे का निर्माण किया गया है, जिसका नाम “शीशगंज साहिब” है. हमें गुरु तेग बहादुर सिंह जी के जीवन परिचय से यह सीख लेनी चाहिए कि, जनसेवा एवं मानव कल्याण सबसे सर्वोपरि है. उन्होंने मानव कल्याण हेतु अनगिनत कार्य किए थे.

उन्होंने यह भी बताया है कि सभी प्रकार के धर्म अपने में बहुत महत्वपूर्ण हैं और उनका एक अपना महत्व भी होता है. कोई भी धर्म छोटा या बड़ा नहीं होता सब धर्म अपने में सामान्य होते हैं.  गुरुजी ने मानव कल्याण एवं धर्म रक्षा हेतु अपने आप को बलिदान कर दिया .आज के समय में हमें भी जरूरत है कि, उनकी बातों का आदर करें और उन्हें अपने जीवन में फॉलो करें किसी भी धर्म एवं जाति के लोगों का निरादर नहीं करना चाहिए.  सभी धर्म को सम्मान एवं महत्वता  देनी चाहिए.

इन्हीं शब्दों के साथ हम अपने इस लेख को समाप्त कर रहे हैं. अगर आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो तो इसे आप अपने परिवार जन एवं मित्रों के साथ जरूर साझा करें धन्यवाद.

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