ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत क्यों आई |East India Company History in Hindi

ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत क्यों आई (East India Company History in Hindi)

ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना( Establishment of East India Company)

31 दिसम्बर 1600 को कुछ व्यापारियों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की थी. 1600 में ही एलिजाबेथ प्रथम ने सर थोमस स्मिथ को पूर्वी हेमिस्फियर तक जाने के लिए रॉयल चार्टर उपलब्ध करवाया था. कालान्तर में कम्पनी को और नाम भी मिले जैसे गवर्नर एंड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ लन्दन ट्रेडिंग इनटू दी ईस्ट इंडीज(Governor and Company of Merchant of London Trading into the East Indies) (1708-1873) और यूनाइटेड कंपनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैंड ट्रेडिंग टू दी ईस्ट इंडीज (United Compnay of Mechant of England trading to the Easr Indies) कम्पनी भी शामिल थे. इन दोनों ही नामों से साफ़  समझ आता हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी का जन्म साउथ ईस्ट एशिया और भारत के व्यापार के लिए हुआ था, इस कारण ही ईस्ट इंडिया कम्पनी को इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी कहा गया था. 

ईस्ट इंडिया कम्पनी का इतिहास
ईस्ट इंडिया कम्पनी की समुंद्री यात्रा (East India Company ki Samudri Yatra)

21 अप्रैल 1601 में जेम्स लंकास्टर (lancaster) के नेतृत्व में 5 जहाजों को ब्रिटेन से रवाना किया गया, उनके पास महारनी के हस्ताक्षर किये हुए लेटर थे. इस यात्रा में वो मसाले और कालीमिर्च  खरीदकर इंग्लॅण्ड लाने में सफल हुए. 1603 के दौरान ही कम्पनी ने इंडोनेशिया के बैंटम(bantam) में ट्रेडिंग पोस्ट बनाया. 25 मार्च 1604 को सर हेनरी मिडल्टन के नेतृत्व में एक जहाज साउथ अफ्रीका की तरफ रवाना हुआ,जो कि इंडोनेशिया के सुमात्रा पंहुचा, इसके बाद 12 मार्च 1607 को विलियम के निर्देशन में एक जहाज इंडोनेशिया के बाँदा(banda) पंहुचा जहां से इंग्लॅण्ड लौटते हुए उसने कोकोस आइलैंड की खोज की. इतने देशों में व्यापार का अनुभव लेने  के बाद 1608 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत का रुख किया. लार्ड डलहौज़ी के बारे में जानने के लिए यहाँ पढ़े। 

ईस्ट इंडिया कम्पनी का भारत में आगमन (Arrival of East India Company in India)

ईस्ट इंडिया कम्पनी की कैप्टन हॉकिन्स (Hawkins) के नेतृत्व में भारत की तरफ यात्रा शुरू हुई और कम्पनी का पहला जहाज व्यापार के उद्देश्य से भारत में सुरत के बन्दरगाह पर 24 अगस्त 1608 में पंहुचा था. जिसे पहले तो जहांगीर से व्यापार की अनुमति और छूट भी मिल गयी,उसने सुरत में अपनी फेक्ट्री भी स्थापित कर ली थी, लेकिन पुर्तगालियों ने जहांगीर को भड़काकर कम्पनी के व्यापार पर रोक लगवा दी. वास्तव में ब्रिटिश व्यापारियों के साथ फ्रेंच,पुर्तगाली और डच भी भारत में अपना व्यापार फैलाने की कोशिश कर रहे थे, लेकीन आखिर में जीत ईस्ट इंडिया कम्पनी की हुयी. हालांकि उससे पहले इन सभी विदेशी व्यापारियों के मध्य और भारत के विभिन्न राजाओं से भी ईस्ट इंडिया कम्पनी का संघर्ष हुआ. लार्ड कैनिंग के बारे में जानने के लिए यहाँ पढ़े।

सर थॉमस रॉय का भारत में आगमन (Arrival of Sir Thomas Roy in India)

1612 में किंग जेम्स प्रथम ने सर थॉमस रॉय को ये समझाकर भारत भेजा था कि वो जाकर मुगल शासक नूरुद्दीन सलीम जहांगीर से मिले और व्यापारिक समझौता करे. सर थोमस रोए (Sir Thomas Roe ) मुगल राजा जहांगीर के दरबार तक तो पहुच गया, लेकिन जहांगीर ने उसे व्यापार करने की अनुमति नहीं दी,और कुछ शर्तें रखी जो किंग जेम्स को अनुकूल नहीं लगी, लेकिन इसके 3 साल बाद 1615 के दौरान जेम्स प्रथम ने नुरुद्दीन सलीम जहांगीर की शर्तें मान ली,और एक संधि की. जिसके अनुसार ईस्ट इंडिया कम्पनी को सुरत में फेक्टरी बनाने का अधिकार मिल गया. इसके बाद आगरा,बरूच और अहमदाबाद में कम्पनी ने अपनी फक्ट्री स्थापित कर ली.

 भारत में कई जगहों पर फेक्ट्री की स्थापना (Establishment of factories in India)

पुर्तगालियों को अंग्रेजों का सूरत में फैक्ट्री खोलने का विचार पसंद नहीं आया इसलिए 29-30 नवम्बर 1612 को ईस्ट इंडिया कम्पनी और पुर्तगाली व्यापारियों के बीच में सुरत में युद्ध हुआ था, जिसमे कम्पनी की जीत हुयी थी. 1619 में जहांगीर की संधि में तय हुयी शर्तों के अनुसार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सुरत को अपना ट्रेडिंग पोस्ट बना लिया

अंग्रेजों के लिए दक्षिण में व्यापार करना बहुत आसान था क्युकी वहाँ पर सशक्त शासन का अभाव था.अंग्रेजों ने दक्षिण में अपनी पहली फैक्ट्री 1611 में मसुलीपट्टम में स्थापित की. लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी गतिविधियाँ मद्रास में शुरू कर दी, जहाँ के लोकल राजा ने 1639 में उन्हें लीज पर दिया था. राजा ने उन्हें मुनाफे का हिस्सा बांटने की शर्त के साथ जगह और प्रशासन की सुविधा दी थी. यहाँ पर अंग्रेजों ने अपनी फेक्ट्री के पास ही एक छोटा सा किला भी बना लिया,जिसे फोर्ट सेंट जॉर्ज कहा गया.  मद्रास में अपना ट्रेडिंग सेंटर स्थापित करने के बाद 1661 में कम्पनी ने बॉम्बे के बंजर द्वीप को चार्ल्स द्वितीय से 10 पाउंड में खरीद लिया, और 1687 तक तो इसे पश्चिमी समुद्री किनारे का सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना बना दिया था.

ईस्ट इंडिया कम्पनी का कलकत्ता तक पहुँचना (Arrival of East India Company in Calcutta)

कम्पनी ने 1633 में उड़ीसा के हरीहरपुर में महानदी के डेल्टा पर फेक्टरी स्थापित की. 1634 में मुगल शासक ने अंग्रेजों को कलकता में आकर व्यापार करने का निमन्त्रण दिया.1650 में गब्रिल बौघटन (Gabriel Boughton) ने बंगाल में व्यापार करने का लाइसेंस प्राप्त कर लिया, 1651 में हुगली के पास फैक्ट्री स्थापित की गयी. भारत में कोई राजनीतिक स्थायित्व ना देखकर कम्पनी को व्यापार की नई नीतियां अपनाने में कोई परेशानी नहीं आई.

1690 में जॉब चार्नोक (job charnock) ने एक फैक्ट्री स्थापित की. और 1698 में एक फैक्ट्री के किले में तब्दील किया गया जिसका नाम फोर्ट विल्लियम रखा. सुतानती (sutanati),कालीकट (kalikata) और गोबिंद्पोर को एक सिंगल एरिया के रूप में विकसित किया गया जिसका नाम कलकता रखा गया. 1717 में मुगल शासक फारुख –सियार (1713-19) ने अंग्रेजों को पूर्व में बसने का मौका दिया. इसके लिए उसने उन्हें कलकता के नजदीक 38 गांव दिए,जिससे कि कलकता की आर्थिक प्रगति हो सके और यहाँ से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो सके.

ईस्ट इंडिया कम्पनी और भारत (East India Company and India)

शुरुआत में तो ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में सिल्क,इंडिगो,डाई,कॉटन, चाय और अफीम का व्यापार किया, लेकिन 17वी शताब्दी के अंत तक तो भारत ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए महत्वूर्ण देश बन गया था. यहा से काती हुयी सूत की गुणवत्ता उच्च स्तर की मानी जाती थी,जिसका बड़े स्तर पर विदेशों में निर्यात किया जाता था, ब्रिटिश क्षेत्राधिकार में आने वाले फैक्ट्री में कपड़े बनाए जाते थे. 1750 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया. मुगल शासकों ने भी अंग्रेजों खतरे को नही समझा,और उन्हें इजाजत दे दी. डच और फ्रेंच की तरह ब्रिटिश भी चांदी और कॉपर के सिक्कों से ट्रांजेकशन  करते थे, जिसे मुगल राज्य के राजस्व में फायदा और आम व्यापारी को भी लाभ मिलता था. ईस्ट इंडिया कम्पनी का मुख्य काम टैक्स एकत्र करना था. जमीनी सौदों में किसानों से उत्पादन का  का एक तिहाई टैक्स ले लिया जाता था, और ब्रिटिश सरकार को भेजा गया था,और कुछ हिस्सा कम्पनी अपने पास रखती थी. वास्तव में अंग्रेज भारत को पिछड़े हुए देश के रूप में देखते थे.इसलिए वो यहाँ का विकास करना चाहते थे.

ईस्ट इंडिया कम्पनी पर ब्रिटिश सरकार नियन्त्रण / ईस्ट इंडिया कम्पनी की इंग्लॅण्ड में समस्याए

इंग्लैंड में भी कम्पनी को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा था. कम्पनी की मोनोपोली को वहाँ पर व्यापारिक स्वीकृति नहीं मिल पा रही थी,और व्यापार में उसके काफी दुश्मन तैयार हो रहे थे. सबसे पहले 1635 में किंग चार्ल्स प्रथम ने कम्पनी के प्रतीध्व्न्धी कोर्टीन एसोसिएशन (courteen) का समर्थन किया, इसके बाद  ओलिवर क्रोमवेल ने 1657 तक के लिए वर्चुअल फ्री ट्रेड की अनुमति दी थी. बाद में 1688-89 में स्टुअर्ट के समय कम्पनी को थोडे अच्छे समय की उम्मीदे बंधी जो कि व्हिग (whig) के ग्लोरियस रिवोल्यूशन और भारत में हो रहे युद्ध के साथ धराशयी हो गयी. विह्ग ने 1698  में नयी कम्पनी को प्रमोट किया,जो कि कुछ समय के संघर्ष के बाद बंद हो गयी. 1702 में सरकार ने मेर्गेर (merger) पर जोर दिया,जो कि1708-09 में यूनाइटेड कंपनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैंड ट्रेडिंग टू ईस्ट  इंडीज के नाम  से पूरी हुयी.

ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्थापना के समय ये कम्पनी सम्पन्न, धनी और कुलीन वर्ग के ही शेयर होते थे. ब्रिटेन की सरकार का कंपनी में कोई शेयर नहीं होता था,ना सीधा नियन्त्रण होता हैं. लेकिन 1773 में ब्रिटिश सरकार ने रेग्युलेटिंग एक्ट पास किया जिससे कम्पनी का अस्तित्व खतरे में पड़ गया. अब से भारत में कम्पनी के शासित क्षेत्रों पर सीधे ब्रिटिश सरकार का नियन्त्रण हो गया जिसके लिए ब्रिटिश गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया जिससे ईस्ट इंडिया कम्पनी का धीमे-धीमे राजनैतिक और आर्थिक स्वायत्ता समाप्त हो गयी. 1813 में आये पार्लियामेंट्री एक्ट ने कम्पनी की मोनोपोली समाप्त कर दी,और 1834 तक तो ये ब्रिटिश सरकार की भारत में मेनेजिंग एजेंसी बन गयी गई.

भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का अन्य व्यापारियों से संघर्ष 

1750 में फ्रेंच और ब्रिटिश व्यापारियों में संघर्ष शुरू हुआ जिसका अंत 1763 में हुआ,और ब्रिटिश ने अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरू कर दिया. 1764 तक तो अंग्रेजों ने कलकता,बंगाल,बिहार,उड़ीसा और दक्षिण भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया. 1773 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने कलकता में अपनी राजधानी स्थापित कर ली,और वारेन हास्टिंग को पहला गवर्नर जनरल बनाकर भारत की सरकार सौंप दी. लेकिन अंग्रेजों का भारत में अन्य यूरोपियन व्यापारियों से संघर्ष 16 वी सदी में ही शुरू हो गया था. वास्तव में उस समय  भारत में अकबर का शासन अफगानिस्तान से लेकर दक्खन के पठार तक शासन था, इसलिए अंग्रेजों का अन्य यूरोपियन व्यापारियों के बीच में यहाँ अपनी जगह बना पाना किसी चुनौती से कम नहीं था.

भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन (Rule of East India Company In India)

  • 1763 तक अंग्रेजों की फ़ौज 26,000 तक पहुच गयी थी जो किसी भी व्यापारिक कम्पनी के लिए एक बड़ी सफलता थी.
  • 1773 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मोनोपोली चलाते हुए बंगाल में अफीम की खेती शुरू कर दी,और अन्य पौधों की खेती पर रोक लगा दी, अफीम को कलकता में बेचा जाता था जहां से इसे अवैधानिक रूप से अच्छे पैसे के साथ चाइना भेजा जाता था. 10 मई 1773 को ईस्ट इंडिया कम्पनी को दिवालिया होने से बचाने के लिए टी एक्ट पास किया गया, इसके कारण कम्पनी को अमेरिकन उपनिवेशों से आयात करने पर टैक्स में छूट मिलने लगी, इसके कारण इन उपनिवेशों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से आयात होने वाली चाय का बहिष्कार किया.
  • 1775 में अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम हुआ. 21 जुलाई 1813 को पास हुए ईस्ट इंडिया कंपनी एक्ट के कारण कम्पनी भारत में व्यापार में एकाधिकार समाप्त हुआ.
  • 1820 में कोलेरा के कारण ब्रिटिश सेना के 10,000 जवान और हजारों भारतीय सैनिक मारे गये जिससे अंग्रेजों की फ़ौज को भारी क्षति हुई.
  • 1824 में ईस्ट इंडिया कम्पनी के 2 कर्मचारी चार्ल्स एलेक्जेंडर और रोबर्ट ब्रूस ने आसाम की चाय की खोज की. 1838 में आसाम की चाय का पहला जहाज इंग्लॅण्ड पंहुचा,
  • 1848 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रोबर्ट फार्च्यून नाम के बोटेनिस्ट को नियुक्त किया जिसने दार्जलिंग में चाय की खेती शुरू की.

ईस्ट इंडिया कम्पनी का अंत और ब्रिटश शासन की शुरुआत (End of East India Compnay and Start of Britsh Rule)

1853 में गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट पास हुआ,जिसके अनुसार अगले निर्णय तक कम्पनी का भारत में शासन ज़ारी रखना था. 1857 में भारत में प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम छिड गया. जिसके बाद 2 अगस्त 1858 को ईस्ट इंडिया कम्पनी ने गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट पास किया, जिसके अनुसार भारत की सत्ता अब ईस्ट इंडिया कम्पनी से ब्रिटेन की सरकार के नियन्त्रण में चली गयी थी.

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