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नई दिल्ली भारत की नई राजधानी कब ,कैसे और क्यों बना ?

नई दिल्ली भारत की नई राजधानी कब , कैसे  और क्यों बना(When and How New Delhi Became India’s Capital in Hindi)

नई दिल्ली, सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत की राजधानी है जिसको आज हर कोई जनता है,  आजादी से पूर्व अंग्रेजों के शासनकाल मे तय हो चूकी थी. भारत में मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद तथा मद्रास, बैगलोर जैसे कई बड़े शहर थे पर उनमे से सबको छोड़ कर दिल्ली को ही क्यों चुना गया यह एक बड़ा प्रश्न था. इसके अलावा और भी कई सवाल हैं जैसे नई राजधानी कब,कैसे और क्यों बना?   

नई दिल्ली भारत की राजधानी कब , कैसे  और क्यों बना                            

नई राजधानी कैसे बना – भारत की राजधानी कोलकाता बनना तय थी पर बहुत ही बारीकी से एक-एक बात पर मंथन हुआ यह तय करना भी बहुत मुश्किल था. बहुत विरोध हुए कुछ दिल्ली के समर्थन मे तो कुछ कोलकाता के समर्थन मे थे. उस समय मुंबई, मद्रास, कोलकाता,लखनऊ तथा हैदराबाद हर बात मे दिल्ली से अग्रिम थे. कोलकाता में राजधानी बनने के लिए सभी चीजे मौजूद थी उसे कई चीजों मे विशेषाधिकार थे. दिल्ली की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब थी. लाख कमियों के बाद भी जानकारों को भविष्य दिख रहा था इसलिये अच्छे सभी शहरों कों छोड़ कर दिल्ली कों चुना गया. 1900  के दशक मे यह कोलकाता को छोड़ कर दिल्ली को राजधानी बनाने का फैसला लिया गया. दिल्ली को तैयार करने की जिम्मेदारी सर एडविन लुटियंस तथा सर सरबर्ट बेकर को सौपी थी इन्होंने दिल्ली को लेकर जों योजना बनाई थी उसे मंजूरी मिल गई थी. उसके बाद इन्होंने दिल्ली के निर्माण का कार्य शुरू किया जिसमे इन्होंने शोभा सिंह को कुछ काम सौपकर एक अनुबंध किया. 

नई राजधानी कब बना – सन् 1911 की बात है जब भारत के राजा जार्ज पंचम का शासनकाल था इन्होंने अपने दरबार मे यह तय कर लिया था की दिल्ली ही भारत की राजधानी बनेगी. राजा जार्ज पंचम तथा उनकी रानी क्वीन मैरी ने मिलकर हजारों की भीड़ मे इसकी घोषणा की, सभी की मौजूदा पदाधिकारियों की सलाह तथा मंजूरी के बाद अंतिम रूप से तय हो चूका, कि कोलकाता नही दिल्ली ही राजधानी बनेगी. उसके बाद एक अप्रैल 1912 को औपचारिक रूप से दिल्ली को राजधानी का नाम दिया गया. 

दिल्ली को बहुत तीव्र गति से बदला गया और प्रथम विश्व युद्ध के बाद एक नया स्वरूप  दिया गया. इसके बाद इसे धीरे-धीरे और बढ़ाया गया एक बार शहर का चयन करने के बाद, शहर को विस्तारित करने के लिये अलग-अलग योजना आना शुरू हो गई. कई आर्कीटेक्ट ने अपनी सलाह दी लेकिन उनमें से बहुत सारे पर विचार किया व अधिकांश को वाइसराय ने खारिज कर दिया. ख़ारिज करने के मुख्य कारण लागत था उस समय कम पैसे मे अच्छा काम महत्वपूर्ण था क्योंकि राजस्व भारत के पास नही होता था बहुत मुश्किलों के साथ राजधानी का विस्तार हुआ. लागत के अनुसार पहले किसी भी मुख्यालयों का उत्तर दिल्ली में अस्थायी भवन के रूप मे निर्माण किया जाता था कई महत्वपूर्ण कार्यालय इस जगह पर चले गए ताकि सामान्य काम प्रभावित न हो. फिर धीरे-धीरे इन्हें स्थायी रूप में बदला गया. यह भी दिलचस्प है कि तत्कालीन ब्रिटिश भारतीय सरकार के विभिन्न कार्यालयों के उचित संचालन के लिए, कर्मचारियों को मद्रास प्रेसीडेंसी, कलकत्ता प्रेसिडेंसी, से दिल्ली लाया गया.  दिल्ली में लाने के पहले कर्मचारी पास के इलाकों में रहते थे और बाद में नई दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित आवासीय क्षेत्रों में इनको जगह मिली. 

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जिसमे इनको लगभग दो से अधिक दशक लग गये तथा वह तय होने के बाद 13 फरवरी सन् 1941 को लार्ड इरविन ने दिल्ली को नई दिल्ली का नाम देकर एक बार फिर भारत की राजधानी की नीव रखी. तब से नई दिल्ली भारत का केन्द्र बनी तथा हर एक चीज के मुख्यालय नई दिल्ली मे बनाये गए, ताकि उन मुख्यालयों से पूरे देश को संचालित किया जा सके. इसके साथ वायसराय का आवास भी यही होगा यह भी तय हुआ.  

नई राजधानी क्यों बना – दिल्ली को राजधानी बनाने के कई प्रमुख कारण थे जैसे,

  • यह भारत देश के सेंटर में स्थित था, जिसे आसानी से केन्द्र बनाया जा सकता था, जिससे हर किसी कों हर क्षेत्र मे सुविधा हो.
  • इसके अलावा दूसरा प्रमुख कारण था ब्रिटिश काल में कई बड़े शासकों ने दिल्ली मे रह कर शासन चलाया था जिसके कारण उनको अनुभव तथा दिल्ली की निजी जानकारी बहुत ही अच्छे से थी.  
  • दिल्ली की सर जमीन पर मुगलों ने भी राज किया था तथा कई बदलाव किये. कोलकाता भारत के पूर्व तट पर स्थित था जबकि, दिल्ली उत्तर के हिस्से मे इस बात पर भी चितन हुआ तब यह महसूस हुआ दिल्ली से आवा-जाही बहुत सुविधाजनक होगी . दिल्ली ना केवल भारत के सभी शहरोँ के मध्य था बल्कि कई देशों को जोड़ने के लिये सबसे सीधा रास्ता तय कराता था यह बात भी बहुत मायने रखती थी यहाँ से जलमार्ग तथा वायुमार्ग भी आसान हो.
  • यहाँ के रहने वाले लोगों को अंग्रेजी बोलना नही आती थी पर जिससे विदेशी यहाँ आना कम पसंद करते थे. देखा जाये तो हर दृष्टि से यह कमजोर था पर राजधानी के बनते ही इसके विकास पर जोर दिया गया तथा दिन-रात इसके विस्तार पर ध्यान दिया गया और एक दिन यह आया की दिल्ली की शक्ल बदल गई. अब वह नई दिल्ली बन गया तथा भारत का सबसे बड़ा तथा हर क्षेत्र मे शक्तिशाली शहर बना जिसने कई छोटे-छोटे कस्बों, गाँव तथा शहर को खुद मे मिलाया तथा कई देशों से सीधे जुड़ने के रास्ता तय किया और आज अंग्रेजों को सही साबित कर भारत की सही राजधानी बना.           

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