दादासाहब फाल्के का जीवन परिचय | Dadasaheb Phalke Biography in Hindi

दादासाहब फाल्के का जीवन परिचय (Dadasaheb Phalke Biography in Hindi)

ये सच हैं कि आज भी भारत का युवा वर्ग दादासाहेब फाल्के के नाम सिर्फ इतना ही परिचित हैं कि इस पर कोई अवार्ड मिलता हैं, लेकिन वास्तव में दादासाहेब के किये गये कामों की सूची काफी बड़ी हैं. फाल्के देश के जाने-माने फिल्म-मेकर, स्क्रीन राइटर थे जिनकी पहचान भारतीय सिनेमा के पिता के रूप में भी हैं. वो हमेशा से कलाकार प्रवृति के व्यक्ति थे. उनके नाम को सम्मान देते हुए ही प्रतिवर्ष दादासाहेब फाल्के अवार्ड दिया जाता हैं, लेकिन इसका कारण ये हैं कि दादासाहेब ने ब्रिटिश इंडिया में कम संसाधनों में आर्थिक समस्यायों से जूझते हुए भी भारतीय फिल्म जगत की नींव रखी थी.

Dadasaheb Phalke

क्र. म.(s.No.) परिचय बिंदु (Introduction Points) परिचय (Introduction)
1.    पूरा नाम ((Full Name) धुन्दिराज गोविंद फाल्के
2.    जन्म दिन (Birth Date) 30 अप्रैल  1870  
3.    जन्म स्थान (Birth Place) त्र्यम्बकेश्वर,महाराष्ट्र
4.    पेशा (Profession) फिल्म मेकिंग
5.    राजनीतिक पार्टी (Political Party)
6.    अन्य राजनीतिक पार्टी से संबंध (Other Political Affiliations)
7.    राष्ट्रीयता (Nationality) भारतीय
8.    उम्र (Age) 73 वर्ष
9.    गृहनगर (Hometown)
10.           धर्म (Religion) हिन्दू
11.           जाति (Caste) मराठी ब्राह्मिन
12.           वैवाहिक स्थिति (Marital Status) विवाहित
13.           राशि (Zodiac Sign) कुंभ
14.           मृत्यु (Death) 16 फरवरी 1944

दादा साहेब का प्रारम्भिक जीवन और बचपन (Dada Saheb’s Childhood & Early Life)

दादासाहेब ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा 1885 में सर.जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट, मुंबई से ली थी. 1890 में उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की थी और बडौदा में कला भवन में प्रवेश लिया. अपनी स्नातक पूरी होने के बाद उन्होंने फोटोग्राफर, ड्राफ्ट्समैन जैसे कई काम किए. फाल्के ने लिथोग्राफी और ओलियोगग्राफ में स्पेशलाइजेशन भी किया था

दादासाहब का निजी जीवन और परिवार  (Dada saheb’s Personal Life & Family)

उनकी पहली पत्नी का देहांत 1900 में हो गया था, बाद में उन्होंने सरस्वतीबाई से विवाह किया था, उनकी पत्नी उनके कार्यों में काफी सहयोगी थी.

पिता (Father) धुंधीराज फाल्के
पत्नी (Wife) सरस्वतीबाई फाल्के
पुत्र (Son) भालचंद्र फाल्के
ग्रांडसन (Grandsons) चन्द्रशेखर पुसालकर

दादासाहब का शुरूआती करियर (Dada saheb’s Career in early life)

  • दादासाहब ने अपना करियर गोधरा में बतौर फोटोग्राफर शुरू किया था लेकिन निजी कारणों से इसे छोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए ड्राफ्ट्समैन के तौर पर काम किया.
  • फाल्के ने बिजनेस में भी हाथ आजमाया और प्रिंटिंग का बिजनेस भी शुरू किया वो अपनी प्रेस के लिए नई से नई जानकारी लेने, नई मशीनरी और टेक्नोलोजी सिखने के लिए जर्मनी तक गए. लेकिन पार्टनर के साथ समस्या होने पर उन्होंने इसे बंद कर दिया.
  • दादा साहेब भारत के सुप्रसिद्ध पेंटर राजा रवि वर्मा के लिए भी काम किया जो की धार्मिक देवी देवताओं की पेंटिंग बनाने के लिए प्रसिद्ध थे.

भारतीय सिनेमा में दादासाहब का योगदान (Dada saheb’s Contribution in Indian Cinema)

  • दादा साहेब के जीवन में टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने एक साइलेंट मूवी लिस्ट ऑफ़ क्राइस्ट देखी जिसे देखने के बाद वो इतने प्रभावित हो गये कि उन्होंने भारतीय देवताओं को स्क्रीन पर इमेजिन कर लिया. ये इवेंट उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बन गया और उन्होंने भारत में सिनेमा-मेकिंग का सपना देखना शुरू किया.
  • वो फिल्म बनाने की तकनीक और बारीकियां सीखने के लिए लंदन तक गये थे और वहां से लौटकर उन्होंने एक बंगला उधार लिया और अपना स्टूडियो शुरू किया. उन्होंने पहली भारतीय मोशन पिक्चर राजा हरिश्चन्द्र बनाई, जिसने भारतीय सिनेमा की नींव रखी. इसके बाद उनके सतत प्रयासों से भारतीय सिनेमा सफलता के पायदान चढ़ता चला गया और आज भारत की पहचान में बॉलीवुड सबसे आगे हैं.

पहली भारतीय फिल्म राजा हरिश्चन्द्र (First Indian Film Movie Raja Harishchandra)

  • दादासाहब फाल्के ने कुछ पैसे उधार लिए और उन्होंने 1912 में इन्डियन सिनेमा की पहली मोशन फिल्म (हिलती-डुलती) फिल्म बनाई जिसका नाम “राजा हरिश्चन्द्र” रखा. इस मूवी को 3 मई 1913 को मुंबई के कोरोनेशन सिनेमा में दिखाया गया,जनता के लिए ये अविश्वसनीय अनुभव था, इसके लिए उन्होंने काफी सराहना भी मिली थी.
  • वास्तव में उनकी डेब्यू फिल्म राजा हरिश्चन्द्र भारतीय सिनेमा के लिए दिया गया उनका अविस्मरणीय योगदान हैं. ये पहली चलती-फिरती दिखाई देने वाली फिल्म थी,जिसने देश में फिल्ममेकिंग की नींव रखी थी.
  • फाल्के ने अपने प्रोजेक्ट के लिए प्रोड्क्शन,राइटिंग और डायरेक्शन सब कुछ किया था,उन्होंने खुद एक सेट तैयार किया था और 7 महीने 21 दिन तक शॉट लिया था. दादा साहेब के पूरा परिवार ने उनकी लिजेंड्री फिल्म राजा हरिश्चन्द्र बनाने में सहयोग दिया था, उनकी पत्नी ने कलाकारों के कपड़े डिजाइन किये थे और पूरी कास्ट और और फिल्म में काम करने वाले सदस्यों के लिए खाना बनाया था. जबकि उनके बेटे ने मूवी में हरिश्चन्द्र के बेटे का किरदार निभाया था. हरिश्चन्द्र मूवी में महिला किरदार तारामती के लिए भी पुरुष को ही चुना गया था क्योंकि तब कोई भी महिला फिल्मों में काम करने को तैयार नहीं हो सकती थी. दादा साहेब ने हरिश्चन्द्र फिल्म पर 15000 रूपये लगाये थे.
  • दादासाहब जब अपनी पहली फिल्म में मुख्य भूमिका के लिए कलाकार खोज रहे थे, तब उन्होंने इसके लिए एक विज्ञापन निकाला, जिसके कारण इतने सारे एप्लीकेशन आ गये कि दादासाहब को उसमे एक लाइन जोडनी पड़ी कि बुरे चेहरे वाले एप्लाई न करे.

राजा हरिश्चन्द्र के बाद दादा साहेब का फ़िल्मी करियर (Dada saheb’s filmy career after Raja harishchandra movie)

  • दादा साहेब की पहली फिल्म की सफलता के बाद उन्होंने बहुत सी शोर्ट फिल्म्स और मूवी बनाई. जिनमें 1913 में आई मोहिनी भस्मासुर, फिर अगले वर्ष 1914 में सावित्री सत्यवान जबकि 1917,1918 और 1919 में क्रमश: लंका दहन, श्री कृष्णा जन्म और कालिया मर्दन थी.
  • जल्द ही साइलेंट फिल्म अभिव्यक्ति का एक अच्छा माध्यम बन गयी, एवं इससे काफी आर्थिक फायदा भी होने लगा. इस तरह बहुत से व्यवसायी ने उनसे सम्पर्क किया और उन्होंने 5 बिजनेसमैन के साथ पार्टनरशिप में हिंदुस्तान फिल्म्स नाम की कम्पनी खोली.
  • बिजनेसमैन का पहला एजेंडा मुनाफा कमाना था जबकि दादासाहेब फिल्म मेकिंग में कुछ क्रिएटिव करना चाहते थे, इस कारण बढ़ते मतभेदों के बीच 1920 में उन्होंने कम्पनी से इस्तीफा दे दिया. हालांकि कुछ समय बाद ही उन्होंने वापिस कम्पनी जॉइन की और कुछ फिल्मों का निर्देशन किया, लेकिन उन्हें कम्पनी के मुनाफे के मुद्दे तब भी समझ नहीं आए और उन्होंने वापिस में कम्पनी छोड़ दी, उनकी लास्ट साइलेंट मूवी 1932 में आयी सेतुबंधन नाम की मूवी थी.

दादासाहब द्वारा बनाई गयी मुख्य फिल्म्स ( Major films created by Dadasaheb)

राजऋषि अम्बारीश 1922
राम मारुती युद्ध 1923
गुरु द्रोणाचार्य 1923
अश्वथामा 1923
शिवाजीची अग्र्याहुन सुताका (Shivajichi Agryahun Sutaka) 1924
सत्यभामा 1925
राम राज्य विजय 1926
बहकर प्रहलाद 1926
हनुमान जन्म 1927
द्रौपदी वस्त्रहरण 1927
परशुराम 1928
संत मीराबाई 1929
कबीर कमल 1930

1937 में दादा साहेब ने गंगावतरण नाम की फिल्म डायरेक्ट की जो उनके करियर की लास्ट फिल्म थी, फिल्मों में लाईट, साउंड के आने से उनके काम का आंकलन कम होने लगा और आखिर में उन्होंने फिल्ममेकिंग से रिटायरमेंट ले लिया. दादा साहेब ने अपने 19 वर्ष के छोटे से फ़िल्मी करियर में 95 मूवी और 26 शोर्ट फिल्म बनाई थी.

दादा साहेब मृत्यु एवं सम्मान (Death and Awards)

दादासाहब की मृत्यु ब्रिटिश इण्डिया के बोम्बे, नासिक में हुयी थी. दादासाहेब के वंशजों में से एक शरायु फाल्के सुम्मान्वर (Sharayu Phalke Summanwar,) ने उन पर एक किताब लिखी जिसमे फाल्के निजी जीवन और फ़िल्मी करियर का विस्तार से वर्णन हैं. उनके परिवार ने भारत रत्न की मांग भी की थी. दादासाहब फाल्के अवार्ड के बाद 1971 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में उनके चेहरे वाले पोस्टेज स्टाम्प जारी किये.

दादासाहब फाल्के अवार्ड (Dadasaheb Phalke Awards)

1969 में उनके सम्मान में भारत की सरकार द्वारा  दादासाहेब फाल्के अवार्ड शुरू किया गया था. ये पुरूस्कार प्रतिवर्ष फिल्म में अच्छा एवं सराहनीय काम करने वालों को दिया जाता हैं. पहली अवार्ड की विजेता देविका रानी थी. इस अवार्ड में शाल, कैश प्राइज 10 लाख रूपये एवं स्वर्ण कमल दिया जाता हैं. दादासाहब फाल्के अकादमी उनके नाम पर तीन अवार्ड फाल्के रत्न अवार्ड, फाल्के कल्पतरु अवार्ड और दादा साहेब फाल्के अकादमी अवार्ड देती हैं.

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