चौरी चौरा कांड| Chauri Chaura incident in hindi

आधुनिक भारत का इतिहास | चौरी चौरा कांड 1927 (Chauri Chaura incident in hindi)

देश की स्वतंत्रता से पहले बहुत से घटनाक्रम ऐसे हुए जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए लिखी जाने वाली पटकथा को बदल दिया, क्योंकि उनके कारण हुए परिणामों ने ना केवल तात्कालिक समय में कुछ लोगों को प्रभावित किया बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई अध्यायों की प्रस्तावना को बदलकर रख दिया. असहयोग आन्दोलन के दौरान हुआ चौरा चौरी काण्ड भी एक ऐसी ही घटना हैं,जिसके कारण गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन को स्थगित कर दिया.

चौरी चौरा कांड 1927

घटनाचौरी-चौरा काण्ड
घटना का दिन (Chori Chora kand kab hua)5 फरवरी 1922
घटना स्थलगोरखपुर जिला,उत्तर प्रदेश
घटना का कारणपुलिस का असहयोग आन्दोलन में भाग ले रहे प्रदर्शनकारियों पर फायर करना और अंग्रेजों के प्रति आम-जन में आक्रोश
मुख्य घटनाप्रदर्शनकारियों का पुलिस स्टेशन को जला देना
परिणामआम-नागरिक और 22-23 पुलिस कर्मियों का जिन्दा जल जाना जिससे नाराज होकर गांधीजी का असहयोग आन्दोलन स्थगित करना
आरोपियों को मिली अंतिम सजा का दिनइलाहबाद हाई कोर्ट ने 20 अप्रैल 1923 को सजा सुनाई.
आरोपियों को सजा19 आरोपियों को फांसी की सजा और 110 को आजीवन कारवास की सजा सुनाई गयी

चौरी-चौरा काण्ड एक घटना थी, जिसका कोई उद्देश्यया या कारण नहीं था. ना ही इसमें क्रांतिकारियों का किसी भी प्रकार का योगदान था. ये पूरी तरह से आम-लोगों द्वारा असहयोग आन्दोलन के दौरान किये जा रहे प्रदर्शनों के दौरान हुई एक हिसंक घटना थी. वास्तव में उस समय देश भर में गांधीजी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन चल रहा था, जिसकी औपचारिक शुरुआत 1 अगस्त 1920 को हुयी थी,लेकिन चौरा-चौरी काण्ड में हुयी हिंसा ने इस आंदोलन की नियति को बदल दिया था.

 

चौरी चौरा कांड क्या है घटना (What is Chora Chori Incident)

चौरी-चौरा काण्ड का घटनाक्रम निम्न चरणों में घटित हुआ-

  • असहयोग आंदोलन’ के दौरान, प्रदर्शनकारियों का एक समूह, मांस की बढ़ी हुयी कीमतों के विरोध में, 2 फरवरी 1922 को चौरी-चौरा बाजार में पहुंचा, लेकिन स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उनके विरोध में बाधा डाली, और प्रदर्शनकारियों पर बल का प्रयोग करके,  रैली का नेतृत्व कर रहे नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, अचानक से हुए पुलिस के हमले से रैली में शामिल कई लोग घायल हो गए.·        
  • इस बात ने प्रदर्शनकारियों को और अधिक आक्रोशित कर दिया  और उन्होंने 5 फरवरी को फिर से प्रदर्शन किया. उस दिन 2,000 से 2,500 प्रदर्शनकारियों का एक समूह चौरी चौरा बाजार की ओर बढ़ गया, जहां उन्होंने अपने विरोध के हिस्से के रूप में एक शराब की दुकान पर धरना देने का फैसला किया था लेकिन  पुलिस ने एक बार फिर से बलप्रयोग करते हुए प्रदर्शन कर रहे नेताओं में से एक को गिरफ्तार कर लिया. इसने प्रदर्शनकारियों को नाराज कर दिया और उनमें से कुछ लोगों का समूह चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ गया, जहां उनके नेताओं को बंद किया गया था. ·        
  • एकत्रित भीड़ ने पुलिस स्टेशन के बाहर नारे लगाने शुरू किये, और अपने नेताओं की रिहाई का आग्रह किया. स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए, पुलिस अधिकारियों ने हवा में कुछ गोलियां चलाई, जिसके बाद प्रदर्शनकारी थोडा और आगे बढ़े. और अंतत:  उन्होंने पुलिस पर पत्थरों से वार करना शुरू कर दिया.·        
  • तीन लोगों की हत्या और कईयों के घायल होने के बावजूद, पुलिस आगे बढ़ने वाली भीड़ को रोकने में असमर्थ थी. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की ओर से आगे बढ़कर उन्हें डराना तब तक जारी रखा जब तक कि पुलिस को चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन में छिपने के लिए मजबूर नहीं कर दिया. इस रणनीति ने उनके खिलाफ काम किया क्योंकि गुस्से में भीड़ को उन लोगों के साथ पुलिस स्टेशन को जलाने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुयी. ·        
  • जलते हुए चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन के अंदर फंसे हुए कई भारतीय पुलिसकर्मी और आधिकारिक दूत थे जिन्हें ‘चपरासिस’ कहा जाता था. इस घटना में 22 पुलिसकर्मियों के मारे जाने का का दावा किया गया और स्टेशन के प्रवेश द्वार पर भी कई लोग मारे गए थे जबकि वे आग से बचने की कोशिश कर रहे थे. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, इस घटना में 23 पुलिसकर्मी मारे गए थे क्योंकि उनमें से एक बाद में अस्पताल में मरा था.  ·        
  • यह घटना जंगल की आग की तरह फैल गई और अंग्रेज इससे बहुत नारज हो गये, हालांकि कई भारतीयों ने इसे वीरता और साहसिक कार्य के रूप में देखा. लेकिन सभी भारतीय इससे खुश नहीं थे. असल में, कुछ लोग इस अमानवीय कृत्य से बहुत निराश थे और उनमें से एक महात्मा गांधी भी थे, जिन्होंने इस घटना को निंदनीय कहा था.

चौरी-चौरा काण्ड के परिणाम (Chora Chori Movement Results)

  • ·चौरी चौरा घटना के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण कार्रवाई हुयी वो  ‘असहयोग आंदोलन’ को स्थगित करना था. गांधीजी ने चौरीचौरा की घटना को बर्बरता और हिंसा माना और उन्होंने इस रक्तपात की ज़िम्मेदारी ली. चूंकि यह घटना गांधीजी के ‘असहयोग आंदोलन’ के आह्वान के बाद हुई थी, इसलिए महात्मा को लगा इसमें गयी जानों के लिए वो ही जिम्मेदार हैं. उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने अपने देशवासियों को ‘असहयोग आंदोलन’  से पहले अहिंसा आन्दोलन के लिए पर्याप्त प्रेरित नही किया था,जिसका परिणाम ये घटना हैं. इस कारण उन्होंने उपवास किया और उनका उपवास एक तपस्या के रूप में, पांच दिन तक चला . उन्होंने तुरंत प्रभाव से असहयोग आन्दोलन को बंद करने का निर्णय दिया. ·         
  • असहयोग आंदोलन’ को बंद करने के निर्णय का उन प्रमुख नेताओं ने विरोध किया, जिन्हें महात्मा के फैसले में तर्क नही समझ आया. सी राजगोपालाचारी सहित उनके कई सशक्त समर्थकों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे इस निर्णय से परेशान थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 12 फरवरी, 1922 को ‘असहयोग आंदोलन’ का आह्वान किया. ·        
  • अंग्रेजों ने गांधी को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें छह साल की कारावास की सजा सुनाई गयी. फरवरी 1924 में, गांधी को उनके खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया. ·        
  • असमय और अचानक से  ‘असहयोग आंदोलन’ को स्थगित कर देने के निर्णय का प्रभाव उस समय चल रहे  ‘खिलाफत आंदोलन‘ पर भी पड़ा. उस समय कांग्रेस के कुछ सदस्यों के अलावा खिलाफत आन्दोलन में भाग लेने वाले सदस्यों ने भी इस फैसले को विश्वासघात कहा.

इस बात ने मोतीलाल नेहरू और मौलाना अब्दुला सहित कई प्रमुख नेताओं को नाराज कर दिया. अब्दुल्ला ने कहा कि वह गांधी के भविष्य पर विश्वास नहीं करते क्योंकि राष्ट्रीय नेता ने अभी तक अहिंसक विरोधों के माध्यम से कुछ भी हासिल नहीं किया था.

आरोपियों को सजा

  • घटना के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया जिससे चौरा-चौरी और उसके आस-पास के क्षेत्र का नियन्त्र मिलिट्री के अधीन हो गया. उम्मीद के अनुसार बहुत सी जगह छापे मारे गये और सैकड़ों लोगों को पकड़ा गया. बहुत से लोग भाग गये तो बहुतों को पकडकर यातनाएं दी गयी और पूछताछ की गयी.
  • 228 लोगों को ट्रायल में लाया गया, उन्हें दंगे करने और आगजनी फ़ैलाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था. ये ट्रायल लगभग 8 महीनों तक चला. इनमें से 6 लोग तो ट्रायल के दौरान ही मर गये जबकि 172 को फांसी की सजा सुनाई गयी.
  • इस फैसले से लोगों में आक्रोश फ़ैल गया, बहुतों ने अदालत के फैसले की निंदा की. भारतीय कम्युनिस्ट नेता एमएन के नेतृत्व में विरोध में सैकड़ों और हजारों लोग शामिल हुए. रॉय ने इस फैसले को ‘कानूनी हत्या’ कहा. उन्होंने हड़ताल भी की, जिसने अदालत को फैसले की समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया.
  • इलाहाबाद में उच्च न्यायालय ने 20 अप्रैल 1923 को फैसले की समीक्षा की, जिसके परिणामस्वरूप फैसले में भारी बदलाव किये गये. नए फैसले के अनुसार, 19 को मौत की सजा दी गई थी, जबकि उनमें से 110 को आजीवन के लिए जेल की सजा सुनाई गई और बाकी को लंबी अवधि के लिए कारावास की सजा सुनाई गई थी. जिन लोगों को कैद किया गया था उन्हें बाद में आजादी के समय रिहा कर दिया जाएगा,ऐसा आसवाशन दिया गया.

  स्मारक (Memorial)

  • 1923 में ब्रिटिश सरकार ने मृतक पुलिसमैन के सम्मान और याद में एक स्मारक बनाया, स्वतंत्रता के बाद जगदम्बा प्रसाद द्वारा लिखी गयी एक कविता और जय हिन्द को स्मारक पर अंकित करवाया गया.
  • 1971 में, चौरी-चौरा के लोगों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा मारे गए लोगों को भी सम्मान देने का फैसला किया. इसलिए, उन्होंने ‘चौरी-चौरा शहीद स्मारक समिति’ नाम का एक संगठन बनाया और दो साल बाद उन्होंने चौरी चौरा में एक झील के पास एक त्रिकोणीय मीनार बनाया. इसके लिए कई लोगों ने योगदान दिया,यह स्मारक 13,500 रुपये की लागत से बनाया गया.बाद में भारत सरकार ने उन लोगों के नामों का नाम स्मारक में लिखवाया और इस स्मारक के पास भारतीय आजादी से संबंधित एक संग्रहालय और पुस्तकालय भी स्थापित किया.
  •  चौरी चौरा ट्रेन (Chora Chori Train) – भारतीय रेलवे ने देश में चलने वाली बहुत सी ट्रेनों में से एक ट्रेन का नाम चौरी-चौरा एक्सप्रेस रखा, जो वर्तमान में कानपुर से उत्तर प्रदेश में गोरखपुर तक चलती हैं.

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