बिपिन चन्द्र पाल जीवन परिचय | Bipin Chandra Pal Biography in Hindi

बिपिन चन्द्र पाल जीवन परिचय (Bipin Chandra Pal Biography in Hindi)

स्वतन्त्रता की लड़ाई में प्रसिद्ध लाल बाल पाल में लाला लाजपत राय , बाल गंगाधर तिलक और तीसरे थे बिपिन चन्द्रपाल, जिनके बारे में आज हम इस आर्टिक्ल में पढ़ेंगे । बिपिन चन्द्र पाल ने भी स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना बड़ा योगदान दिया जिसमें विदेशी कपड़ो का बहिष्कार, विदेशी सामान की होली जलाना, ब्रिटिश के आधीन आने वाले व्यापारों का विरोध करना ऐसे कई कार्य शामिल हैं । कहते हैं लाल बाल पाल ने मिलकर अँग्रेजी शासन की नाक में दम कर दिया था । यह भी कहा जाता हैं कि क्रांतिकारी विचारों की उत्पत्ति इन्ही से हुई थी । इंडियन नेशनल काँग्रेस को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में इनका बड़ा हाथ रहा हैं । इनके जीवन के पहलुओं को जानने के लिए पूरा आर्टिकल पढ़े।

Bipin Chandra Pal

1 नाम (Name) बिपिन चन्द्रपाल
2 प्रसिद्धि (Famous) लाल बाल पाल
3 राष्ट्रियता (Nationality) भारतीय
4 जन्म एवं मृत्यु (Birth – Death) 7 नवंबर 1858 एवं 20 मई 1932
5 आयु (Age) 74 वर्ष
6 जन्म स्थान (Birth Place) हबीबगंज जिले पोइल गाँव [बांग्लादेश]
7 मृत्यु स्थान (Death Place) कोलकाता
8 धर्म (Religious) हिन्दू
9 जाति (Caste) बंगाली कायस्थ (वैष्णव)
10 राशि (Sign) वृश्चिक
11 पैशा (Profession) शिक्षक, समाचार पत्र संपादक, वक्ता, लेखक एवं क्रांतिकारी देशभक्त
12 वैवाहिक स्थिती (Marital Status) विवाहित

प्रारम्भिक जीवन

जन्म तिथी, स्थान : बिपिन चन्द्र पाल जी का जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था जो कि हिन्दू बंगाली कायस्थ (वैष्णव) कहे जाते थे । इनकी जन्म तिथि 7 नवंबर 1858 हैं एवं जन्म स्थान गुलाम भारत के हबीबगंज जिले पोइल गाँव में हुआ था वर्तमान में इस जिले का कुछ भाग बांग्लादेश एवं कुछ भाग आसाम भारत में आता हैं ।

शिक्षा : बिपिन चन्द्रपाल एक पढ़े लिखे विद्वान थे, प्रारम्भिक शिक्षा मौलवी के सानिध्य में हुई बाद में इन्होने सेंट पॉल कैथेड्रल मिशन कॉलेज कलकत्ता से अध्यन किया लेकिन पढ़ाई बीच में छोड़ दी और 1879 में विद्यालय मे पढ़ाने का कार्य करने लगे, ये कोलकाता में एक पुस्तकालय में भी काम करते थे। इन्हे पढ़ने का बहुत शौक था इसलिए इन्होने गीता, उपनिषध का अध्ययन किया ।

पारिवारिक परिचय :

विपिन चन्द्र पाल जी के पिता विद्वान थे और उस समय भूमि मालिक होने के कारण धनवान भी थे साथ ही उन्हे फारसी का स्कॉलर कहे जाते थे। इनके पिता का नाम रामचन्द्र पाल था ।

बिपिन चन्द्रपाल सामाजिक कुरीतियों के विरोधी थे और खुलकर इसका विरोध करते थे. ऐसा नहीं की केवल शब्दों में ही यह विरोध था, अपितु कर्मों में भी यह साफ दिखाई देता था. यह इससे उजागर होता हैं कि उन्होने उस सदी में एक विधवा महिला से शादी की थी, जिसका उनके परिवार ने बहुत विरोध किया पर उन्होने पत्नी को सम्मान दिलाने और अपने विचारों को मान देने के लिए परिवार को त्याग दिया ।

बिपिन चन्द्रपाल के पुत्र का नाम निरंजन पाल था, जो बॉम्बे टॉकीज के संस्थापकों में से एक था, एवं इनकी एक पुत्री भी थी, जिनके पति का नाम एस.के. डे था, जो कि आईसीएस ऑफिसर थे जो बाद में केन्द्रीय मंत्री पद पर विराजमान हुये।

1 पिता का नाम रामचन्द्र पाल
2 माता का नाम ज्ञात नहीं
3 पत्नी ज्ञात नहीं (विधवा स्त्री से विवाह )
4 पुत्र का नाम निरंजन पाल
5 पुत्री का नाम ज्ञात नहीं
6 दामाद का नाम एस.के. डे

 प्रारम्भिक राजनैतिक जीवन (Bipin Chandra Pal Political Career)

इनके प्रारंभिक जीवन में जब ये कोलकाता में एक लाइब्रेरियन के तौर पर काम कर रहे थे, तब इनकी मुलाक़ात कुछ राष्ट्रवादी नेताओं से हुई उनमें केशव चंद्र सेनंद, शिवनाथ शास्त्री, बीके गोस्वामी और एसएन बनर्जी थे । वे सभी बिपिन चंद्रपाल की विचारधारा से प्रभावित थे और बिपिन इन नेताओं की तरफ आकर्षित थे, इस तरह इन नेताओं ने बिपिन को सक्रिय राजनीति में आने का न्यौता दिया। इसके साथ ही गंगाधर तिलक और अरबिंदो के कार्यो से भी बिपिन अत्यंत प्रभावित हुये ।

उनके राजनैतिक कार्य (Political Ideas of Bipin Chandra Pal)

1886 में वे भारतीय राष्ट्रिय काँग्रेस का हिस्सा बने । इनकी विचारधारा काफी भिन्न थी और इस कारण उनका कार्यकर्ताओं के साथ मतभेद होता रहता था तभी 1907 में जब काँग्रेस का विभाजन हुआ तब उन्होने काँग्रेस को छोड़ दिया । इसके बाद 1916 के लखनऊ सेशन में उन्होने काँग्रेस को वापस जॉइन किया, लेकिन वे मोहनदास करमचंद गांधी की विचारधाराओं से सहमत नहीं थे और खुलकर उनका विरोध भी करते थे और उसी दौरान 1921 में इन्होने फिर से काँग्रेस को छोड़ दिया ।

बंदे मातरम जनरल :

बिपिन चन्द्रपाल में दृढ़ता के साथ विरोध प्रदर्शन करने का सामर्थ्य था इसलिए उन्होने स्वदेशी तथा बहिष्कार आंदोलन की पहली वर्षगांठ पर सन 1906 में “वन्दे मातरम्” एक इंग्लिश पत्र को लॉंच करने का साहसी कदम उठाया इस पत्र का विषय भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन का इतिहास था । इस पत्र के सम्पादन के लिए अरबिंदो घोष को न्यौता दिया गया और उन्होने इसे सहर्ष स्वीकार किया । अरबिंदो एक कुशल लेखक थे और बिपिन एक हौनहार वक्ता, इन दोनों की साजेदारी में बंदे मातरम का काम आगे बढ़ा ।

18 सितंबर 1906 में इस बंदे मातरम पत्र में लिखा गया कि यदि हम बल से बल को नहीं काट सकते तो हमे ब्रिटिश सरकार के प्रशासन को कमजोर बना देना चाहिये अर्थात उन्हे सेवा देना बंद कर देना चाहिये । इसी जनरल में अप्रैल 1907 में अरबिंदो ने लिखा कि सरकार का विरोध दो तरह से किया जा सकता हैं हिंसा और अहिंसा । जब सरकार हमारे अधिकारों का हनन बल पूर्वक करती हैं तो उसका जबाब हिंसात्मक होगा, लेकिन सरकार के लिए कोई कार्य ना करना उसके प्रशासन को अवरुद्ध करेगा और यही चरमपंथियों का मुख्य उद्देश्य हैं ।

बहिष्कार आंदोलन :

काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में दिसम्बर 1906 में अंबिका चरण मजूमदार ने स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार आंदोलन के साथ बिपिन चंद्रपाल का सहयोग किया । उस समय बिपिन चंद्रपाल ने एक ज्वलंत भाषण दिया जिसमें था कि बहिष्कार आंदोलन के अर्थ को समझो यह एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु, एक शहर से दूसरे शहर, एक प्रांत से दूसरे प्रांत तक बढ़ेगा और व्यापक बनेगा जब तक कि सभी लोग स्वराज का एहसास नहीं कर लेते ।

जनवरी 1907 में बिपिन ने बहिष्कार आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन को एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पहुंचाया और इसके लिए वे पूर्वी बंगाल के इलाको में गये, इसके बाद वे कटक, उड़ीसा, विशाखा पट्टनम आखरी में मद्रास आदि स्थानो पर गये और अपने जोशीले भावपूर्ण भाषण के जरिये अपनी विचारधार को आगे बढ़ाया । इन्होने  2 मई, 1907 से 9 मई, 1907 तक मद्रास बीच पर पांच भाषण दिये, जिसमें उन्होने राष्ट्रीय आंदोलन की रूपरेखा, लक्ष्य एवं कार्यक्रम को विस्तार से समझाया । महाकवि भारती, सुब्रमणिया शिव एवं श्रीनिवास शास्त्री ने बिपिन के पांचों भाषणो को ध्यान से सुना ।

स्वदेशी आंदोलन का योगदान :

बिपिन स्वदेशी आंदोलन को देश का सबसे जटिल आंदोलन कहा था और यह देखा भी गया क्यूंकि स्वदेशी आंदोलन ने बंगाल से एक नये युग की शुरुवात की थी । यह एक गहन आध्यात्मिक आंदोलन था और इसका उद्देश्य हर भारतीय के लिए हर मायने में भारत की मुक्ति था। इस आंदोलन में ब्रिटिश वस्तुओं, स्कूलों, अदालतों और प्रशासन का  बहिष्कार किया गया । साथ ही राष्ट्रीय आह्वान के साथ, स्वदेशी निर्माण, राष्ट्रीय शिक्षा, भाषा, साहित्य और इन सबसे ऊपर “स्वराज” या राजनीतिक स्वतंत्रता आदि की अपील की गई ।

मृत्यु [Bipin Chandra Pal Death]

उग्रवादी विचार धारा वाले विपिन चन्द्रपाल ने कई बार गांधी जी का खुल कर विरोध किया हैं और शायद मतभेदों के कारण 1922 में स्वयं को राजनीति से अलग कर दिया, जिसके बाद वे कभी राजनीति से नहीं जुड़े और इस तरह दस वर्षो बाद  20 मई, 1932 को कलकत्ता में बिपिन चन्द्र पाल की मृत्यु हो गई ।

बिपिन चन्द्र पाल की रचनाये [पुस्तकें, समाचार पत्र]

बिपिन चन्द्र पाल एक कुशल वक्ता से साथ – साथ एक कुशल लेखक भी थे, जिसका प्रयोग उन्होने देश के स्वतंत्रता संग्राम में भलीभाँति रूप से किया । उनकी लिखावट में राष्ट्रीयता के साथ – साथ धार्मिक नीतियाँ भी देखने मिलती थी । उनकी वाणी और शब्दो में इतना जोश एवं उत्साह था कि वे आसानी से हजारों की भीड़ को अपना बना लेते थे ।

  1. उन्होंने राष्ट्रवाद और स्वराज की विचारधारा को फैलाने के लिये कई पुस्तके, साप्ताहिक पत्रिकायेँ एवं समाचार पत्र लिखे । उनकी प्रमुख पुस्तकों में भारतीय राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता और साम्राज्य, स्वराज और वर्तमान स्थिति, सामाजिक आधारशिला, भारत की आत्मा, नई आत्मा और हिंदू धर्म में अध्ययन आदि आती हैं ।
  2. इन्होने कई समाचार पत्रो का सम्पादन भी किया जिनमें डेमोक्रेट और इंडिपेंडेंट शामिल हैं ।
  3. हिन्दी के साथ – साथ ये अँग्रेजी और बंगला में भी लिखा करते थे । जिनमें परिदर्शक (1886 बंगाली साप्ताहिक), न्यू इंडिया (1902-अंग्रेजी साप्ताहिक) और बंदे मातरम (1906 -बंगाली दैनिक) और “स्वराज” उनके द्वारा शुरू की गई कुछ पत्रिकाएँ हैं।

धरोहर (Legacy)

बिपिन चन्द्र पाल की मृत्यु के बाद उनकी रचनाएँ ही उनकी धरोहर के रूप में आज भी जीवंत हैं । अपने कार्यो और विचारो के रूप में वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं । 1958 में जब इनके जन्म को 100 वर्ष हुये, तब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने उदद्घोष में इन्हे याद किया और कहा कि यह एक ऐसे देश भक्त थे जिन्होने राजनैतिक और धार्मिक दोनों ही लड़ाइयों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और देश के स्वाधीनता संग्राम की अग्नि को सभी के अंदर ज्वलंत किया ।

बिपिन चन्द्रपाल जो कि लाल बाल पाल के रूप में विख्यात रहे के बारे में जितना कहे कम हैं वे ही एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होने स्वदेशी आंदोलन को सही रूप में जाना था और उसके लिये काम किया था । आज इतिहास के पन्ने उनके इस कार्य के गवाह हैं ।

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