Monday , September 28 2020

गाँधी जी ने क्यों नहीं रोकी भगत सिंह की फांसी? क्या था गाँधी-इरविन समझौता ?

गाँधी जी ने क्यों नहीं रोकी भगत सिंह की फांसी (Why did not Gandhiji stop Bhagat Singh’s hanging)

क्या था गाँधी-इरविन समझौता (What was the Gandhi-Irwin Agreement)

23 मार्च 1931 एक ऐसे ऐतिहासिक दिन के रूप में याद किया जाता है, जब 3 नौजवान अपने देश के लिए फांसी के तख्ते पर हँसते-2 चढ़ गए थे. भगत सिंह,राजगुरु एवं सुखदेव. तीनों देश भक्तों को ब्रिटिश सरकार द्वारा राजकीय हत्या के आरोप में फांसी की सजा दे दी जाती है. यह वह समय था, जब गाँधी जी एवं उनके अनुयायी देश को आजाद कराने के लिये जी तोड़ मेहनत कर रहे थे. गाँधी का नाम भारत देश के अलावा पूरी ब्रिटिश सरकार भी जानती थी. ऐसे में ऐसे देशभक्त को फांसी की सजा हुई, जो देश की आजादी को अपनी दुल्हन बोलता था. एक महान नेता गाँधी जी के होते हुए भी ये यह फांसी क्यों हुई? गाँधी जी भगत सिंह की फांसी को कैसे रोक सकते थे? भगत सिंह की फांसी में गाँधी जी का क्या रोल था? इन सभी सवालों का जबाब आपको इस आर्टिकल में मिलेगा।

गाँधी जी ने क्यों नहीं रोकी भगत सिंह की फांसी

भगत सिंह का क्रांतिकारी जीवन

1920 में गाँधी जी द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन में भगत सिंह ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया, उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रेषित पुस्तकों, कपड़ों और अन्य सामान को नष्ट कर, खुले तौर पर अंग्रेजों को चुनौती दी. 1922 में जब असहयोग आंदोलन तेजी से भारत देश में बढ़ रहा था, तभी फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक जगह में कुछ लोगों ने एक पुलिस चौकी में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिस जिन्दा जल के मर गए. इस उग्रवादी घटना के बाद गाँधी जी ने इसके लिए दुःख प्रकट किया और कहा हिंसा के कारन ये सब हुआ  है, जिससे अब असहयोग आंदोलन आगे नहीं बढ़ाया जायेगा। उनकी इस बात से कई भारतीय बहुत नाराज हुए, भगत सिंह भी गाँधी जी के इस फैसले के खिलाफ थे, तत्पश्चात भगत सिंह ने पहली बार गाँधी विचारधारा को छोड़ ‘क्रान्तिकार आंदोलन’ का हिस्सा बन गए. इस समय कांग्रेस दो हिस्सों में बंट चुकी थी, एक वो जो गाँधी विचारधारा को मानकर अहिंसा के साथ स्वतंत्रता मांग रही थी, वही दूसरी वो जो हिंसा में विश्वास रखती थी.

लेकिन तख़्त तब बदला जब गरम  क्रांतिकारी दल में से कुछ लोग अपने को बचाने के लिए पुलिस की तरफ से गवाह बन गए, जहाँ उन्होंने इस दल की सारी जानकारी पुलिस को बता दी. उन्होंने सांडर्स  को गोली मारने वालों में भगत सिंह एवं सुखदेव का नाम भी बता दिया। जिसके बाद भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरु के खिलाफ हत्या का मामला भी दर्ज हो गया. सांडर्स  हत्याकांड (लाला लाजपत राय की मौत का बदला )पर कार्यवाही शुरू हो गई, जिस दौरान भगत सिंह को जेल में अपने साथियों से अलग दूसरी जगह भेज दिए गया,

भगत सिंह को फांसी की सजा

कुछ समय पश्चात् अदालत में कार्यवाही शुरू हुई, जहाँ एक तरफ़ा केस में 1930 को फाइनल फैसला सुना दिया गया, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव को सांडर्स  को मारने के जुल्म में 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा सुना दी गई. 

गाँधी का क्या रोल था भगत सिंह की फांसी में

ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च के तड़के भगत सिंह एवं अन्य दो क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दे दी , इनके पार्थिव शरीर को अंग्रेज सरकार ने इनके घर वालों को भी नहीं दिया और खुद जेल परिसर से निकाल कर उनके पार्थिव शरीर अग्नि को दे दी थी. कई लोग का मानना है कि गाँधी जी भगत सिंह की फांसी रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस बात पर कितनी सच्चाई है, ये तो आज तक साबित नहीं हो पाया है, लेकिन आज हम आपको भगत सिंह की फांसी के समय की कुछ बातों को यहाँ गहराई से बताने की कोशिश करेंगें।

भगत सिंह की फांसी के लगभग 1 महीने पूर्व 18 फरवरी को गांधी जी ने, उस समय के जनरल गवर्नर वाइसराय को भगत सिंह की फांसी की सजा को टालने के लिए एक पत्र लिखा. वायसराय  ने गाँधी जी की इस मांग का स्वागत किया, और कहा फांसी को कुछ समय टाला जा सकता है, लेकिन उसे उम्र कैद में बदलना मुश्किल है. इस मुद्दे पर लोगों का कहना है कि गाँधी जी ने अपनी चिट्टी में इस बात को प्रभावशाली ढंग से नहीं कहा, वे चाहते तो ब्रिटिश सरकार पर दबाब डाल सकते थे. इस मुद्दे को लेकर यह भी कहा जाता है कि गाँधी जी ने फांसी को कुछ समय टालने की बात इसलिए कही थी क्यूंकि गाँधी-इरविन समझौता 5 मार्च को होने वाला था, जिसमें आम लोगों की सहमति भी जरुरी थी. 5 मार्च के पहले  अगर फांसी होती तो लोगों में और आक्रोश बढ़ जाता और आम जनता गाँधी जी का साथ उस समझौते में नहीं देती। गांधी जी ऐसा नहीं चाहते थे, उनका सोचना था कि अगर भगत सिंह की फांसी टल जाएगी तो कुछ समय बाद वे ब्रिटिश सरकार पर इस बात को लेकर दबाब बना लेते, जहाँ उन्हें गाँधी जी की मांग को मानना ही होता। इस चिट्ठी को लेकर ब्रिटिश सरकार का कोई जबाब नहीं आया. गाँधी-इरविन समझौता विस्तार से इस लेख के अंतिम में दिया हुआ है 

गाँधी जी की वायसराय को दूसरी चिट्ठी

फांसी के 4 दिन पहले 19 मार्च 1931 को गाँधी जी ने वायसराय  को एक और चिट्ठी लिखी, जिसमें फांसी की सजा टालने की बात फिर से कही. गाँधी-इरविन एक्ट को लेकर 23 मार्च को लाहौर में बहस होने वाली थी, गांधी जी इस बात के लिए परेशान थे कि कांग्रेस इस समझौते को रद्द करने की मांग न करने लगे. गांधी जी को लग रहा था कि वायसराय  अपनी बात पर रहेंगें, लेकिन इसके विपरीत वायसराय  ने गाँधी जी की इस मांग को ख़ारिज कर दिया.

गाँधी जी ने भगत सिंह की फांसी की कुछ घंटे पहले वायसराय  को तीसरी और अंतिम चिट्ठी लिखी, जिसमें उन लोगों की सजा को उम्र कैद में बदलने की बात कही गई. इस प्रस्ताव को वायसराय  ने ख़ारिज कर दिया। इस घटना के बारे में एक प्रसिद्ध लेखक ने अपनी किताब में लिखा था कि अगर गाँधी ने भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी की सजा को उम्र कैद में बदलने की मांग अपनी पहली चिट्ठी में ही की होती तो शायद आज हम भगत सिंह के बारे में कोई और ही कहानी पढ़ रहे होते, इसके साथ ही भारतीय भी ब्रिटिश सरकार के प्रति थोड़े सहनशील हो जाते। वायसराय  को भगत सिंह की सजा को उम्र कैद में बदलने में कोई परेशानी नहीं होती क्यूंकि भगत सिंह जीवन भर जेल में ही रहते, उनका राजनैतिक करियर जेल की सलाखों के पीछे ही खत्म हो जाता।

गाँधी ने अपनी अंतिम चिट्ठी में वायसराय  को ऐसे तीखे और कड़वे शब्द कहे थे, अगर वो ऐसा अपनी पहली चिट्ठी में ही कहते तो वायसराय  को इस मांग को मानने के अलावा कोई चारा न होता। इसके अलावा लोगों का यह भी कहना था कि गाँधी जी के पास उस समय और भी रास्ते थे, जिससे वे अपनी मांग मनवा सकते थे.

  • पहली अगर गाँधी जी भारतीयों को असहयोग आंदोलन फिर से शुरू करने के लिए हाँ कर देते तो ब्रिटिश सरकार को भारतीयों की मांग के आगे झुकना ही पड़ता क्यूंकि जब पहले असहयोग आंदोलन हुआ था तो पूरी ब्रिटिश सरकार हिल गई थी, अगर ये आगे चलता रहता तो भारत 1947 के कई सालों पहले ही आजाद हो चूका होता।
  • दूसरा गाँधी जी ब्रिटिश को गाँधी-इरविन समझौते को तोड़ने की बात भी कह सकते थे तो शायद वायसराय उनकी बात मान लेते। लेकिन गाँधी जी इस समझौते को लेकर बहुत सजग थे, वे किसी भी कीमत पर इस समझौते को रद्द होते नहीं देखना चाहते थे.

ये सभी बातें और गाँधी भी पर इतनी आलोचना इसलिए भी हुई क्यूंकि वायसराय  कहीं न कहीं गाँधी जी के सामने लाचार थे, अगर गाँधी जी चाहते तो अपनी मांग को सही और प्रबल ढंग से वायसराय  के सामने रखकर पूरी करवा सकते थे.

भगत सिंह की फांसी रुकवाने का एक और तरीका था

उस समय भगत सिंह एवं उनके साथियों की फांसी रोकने का अधिकार दो लोगों के हाथों में था.

  • एक जनरल गवर्नर वायसराय
  • दूसरा पंजाब गवर्नर जेओफ्री

वायसराय  के अलावा पंजाब गवर्नर जेओफ्री  भी भगत सिंह की फांसी के फैसले को बदल सकते थे, लेकिन कुछ समय पूर्व ही उनपर जानलेवा हमला हुआ था, जहाँ क्रांतिकारी ने एक सभा में उन पर 6 गोलियां चला दी थी, जिसमें से 2 उन्हें लगी थी. लेकिन इसके बावजूद वे बच गए थे. इस घटना के बाद सिविल सेवा एवं पुलिस अधिकारीयों ने वायसराय  पर इस मामले से दूर रहने और भगत सिंह की फांसी की सजा को न टालने के लिए दबाब बनाना शुरू कर दिया था. इस बात को अगर अच्छे से समझा जाये तो ऐसा नहीं था कि गाँधी के दबाब में वायसराय  कोई फैसला ले लेते, क्यूंकि उनके ऊपर ब्रिटिश सरकार के बाकि अधिकारीयों का भी दबाब था. लेकिन ये भी कहना गलत नहीं कि गाँधी जी ने वायसराय  से इतनी सख्ती से बात नहीं की और न ही अपनी मांग इतनी प्रबलता के साथ रखी.

भगत सिंह की मृत्यु के बाद उनके मेमोरियल के उद्घाटन के लिए गाँधी जी को बुलाया गया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि मैं ऐसे किसी व्यक्ति के स्मारक का उद्घाटन नहीं करना चाहूंगा, जिनके विचार से में सहमत नहीं हूँ.

भगत सिंह की फांसी के बाद लोगों की प्रतिक्रिया

गाँधी इरविन समझौते में तय हुआ की राजनैतिक बंदियों को रिहा कर दिए जायेगा, लेकिन इस समझौते से भगत सिंह को नहीं छोड़ने की बात हुई, क्यूंकि उन पर राजकीय हत्या का आरोप लगा था. इसी बात से उन दिनों विवाद छिड़ गया था. सभी का कहना था कि जब भगत सिंह एवं बाकि क्रांतिकारियों को फांसी हो रही थी तो इस समय ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता क्यों किया जा रहा है. इस बात को लेकर देश में जगह-जगह गाँधी जी के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे थे. संप्रदायी लोग सभा में गाँधी जी के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे थे. सभी का कहना था कि  गाँधी जी को ब्रिटिश सरकार के सामने प्रस्ताव रखना था कि अगर भगत सिंह की फांसी माफ़ नहीं होगी तो समझौता नहीं होगा। लोगों का यह भी कहना था कि छोटी-छोटी बातों को मनवाने के लिए ब्रिटिश सरकार के सामने धरना प्रदर्शन, अनशन करने वाले गाँधी जी ने क्यों एक बार भी भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए ऐसा नहीं किया।

23 मार्च को भगत सिंह की फांसी के बाद आम लोगों में ब्रिटिश सरकार के साथ साथ गाँधी जी के प्रति भी बहुत अधिक गुस्सा था. 26 मार्च को जब लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तब एक बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचकर गाँधी के खिलाफ नारेवाजी करने लगे, उनके स्वागत के लिए काला कपडे के फूल प्रस्तुत किये गए. गाँधी जी ने इस बात को सकारात्मक तरीके से लेते हुए कहा कि यह जनता की गहरी व्यथा है, जो बाहर आ रही है. इन लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने सभी लोगों को अलग ले जाकर बात की, लेकिन जनता शांत नहीं हुई.

कांग्रेस के कई नेता जैसे सुभाष चंद्र बोस ने गाँधी-इरविन एक्ट का विरोध किया, इन सभी का मानना था कि अगर ब्रिटिश भगत की फांसी नहीं टाल रही थी तो उनके साथ किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहिए था. इसके विपरीत कांग्रेस कमिटी इन बातों में गाँधी जी के साथ ही खड़ी रही. गाँधी जी ने इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया भी दी थी, उन्होंने कहा था “भगत सिंह के बलिदान की सराहना करते है, लेकिन भारत की आजादी के लिए एक ऐसा रास्ता चाहिए जिसमें दूसरों को बिना कष्ट दिए, अपने को न्योछावर कर दो. ब्रिटिश सरकार उकसाने का काम कर रही है, जिसे समझते हुए देशवासियों को समझदारी से निर्णय लेने चाहिए। समझौते में फांसी रोकने की कोई शर्त नहीं है, इसलिए इसे रोकना औचित्य नहीं है.”

सवाल यह भी उठता है कि भगत सिंह की फांसी को लेकर गाँधी जी के नाम को ख़राब करना भगत सिंह के लिए प्रेम को दर्शाता है या गाँधी जी के लिए ईर्ष्या को. गाँधी विरोधी अक्सर भगत सिंह के नाम को प्रतिक बनाकर इस मुद्दे को गाँधी जी के खिलाफ उपयोग करते है. इन सभी बातों से हटकर भगत सिंह की फांसी का मुख्य कारण जाना जाये तो सांडर्स  हत्याकांड था, जहाँ उनके साथियों की गलती की वजह से सांडर्स  की मृत्यु हुई थी. इस हत्याकांड में भगत सिंह के कई साथी क्रांतिकारी ने राजकीय गवाह बनकर उनके खिलाफ गवाही दी थी, जिसमें मुख्य जय गोपाल थे. लेकिन आज भी जब भगत सिंह मुद्दे पर बात होती है तो इन गवाहों का नाम नहीं लिया जाता, जो भगत सिंह की फांसी का मुख्य कारन थे, क्यूंकि इससे कोई राजनैतिक फायदा नहीं होता है.

क्या था गाँधी-इरविन समझौता  –

1930 में दांडी यात्रा के बाद ब्रिटिश और भारतीय कांग्रेस के बीच गर्मागर्मी जोरों पर थी. भारत में राजस्व व्यवस्था को ठीक करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ खास नेताओं को लंदन में ‘गोलमेज सम्मलेन’ में आमंत्रित किया। लेकिन इस सम्मलेन में किसी भी भारतीय नेता ने भाग नहीं लिया जिससे सम्मलेन यह बेनतीजा रहा. ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर इस सम्मलेन का आयोजन किया, लेकिन इस बार सुनिश्चित किया कि कांग्रेस नेता भी वहां उपस्थित रहेंगें। इसके लिए जनरल गवर्नर वायसराय लार्ड इरविन और गाँधी जी के बीच फरवरी 1931 से बातचीत शुरू हुई. दोनों के बीच कुछ बातों को लेकर सहमति हुई , जिसे गाँधी-इरविन पैक्ट कहा गया. यह आधिकारिक रूप से 5 मार्च 1931 को हुआ था. इस समझौते में ब्रिटिश सरकार एवं गाँधी दी दोनों ने कुछ बातें मानी।

ब्रिटिश सरकार के वायसराय  लार्ड इरविन द्वारा मानी गई बातें –

  • स्वतंत्रता की लड़ाई में जिन किसी को भी राजनीतिक बंदी बनाकर जेल में डाला था, उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जायेगा, इसके अलावा जिन पर हिंसा का आरोप है उन्हें जेल में ही रखा जायेगा।
  • भारतीयों को समुद्र किनारे नमक बनाने की अनुमति नहीं थी, जिसके लिए गाँधी जी ने दांडी यात्रा निकाली थी. इस समझौते के बाद कोई भी भारतीय इसके लिए पात्र था.
  • ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए भारतीयों को यह अधिकार नहीं था कि वे शराब की दुकान एवं विदेशी कपड़ों की दुकान के सामने अपना प्रदर्शन कर सकें, इस समझौते के बाद भारतीयों के ऊपर ऐसी कोई पाबन्दी नहीं रह गई.
  • किसी आंदोलन या प्रदर्शन के समय किसी भी व्यक्ति की अगर संपत्ति सरकार जब्त करती है तो उसके बाद उनकी सारी संपत्ति उन्हें लौटा दी जाएगी।
  • नौकरी वाला व्यक्ति अगर किसी आंदोलन को चलते, अपने काम को छोड़ता है तो आंदोलन खत्म होने के बाद उसे उसी पद पर वापस नियुक्त किया जायेगा।

गाँधी एवं कांग्रेस द्वारा मानी गई बातें –

  • ब्रिटिश सरकार द्वारा आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस नेता हिस्सा लेंगें।
  • अंग्रेजों के खिलाफ आयोजित सविनय अवज्ञा आंदोलन को गाँधी जी ने स्थगित करने की हामी भर दी.
  • गांधी जी ने ब्रिटिश को आश्वाशन दिया कि कोई भारतीय अब ब्रिटिश द्वारा बनाये सामान का बहिष्कार नहीं करेगा।
  • उस समय किसी भी भारतीय पर अगर पुलिस कोई जोर जबरजस्ती करती थी तो गाँधी जी उसकी जांच पड़ताल के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते थे, लेकिन इस समझौते के बाद गाँधी जी ऐसा नहीं कर सकते थे.

भारतीय और ब्रिटिश के बीच यह एक अनोखा और पहला समझौता था, जहाँ ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को बराबरी का दर्जा दिया था.

Other Links:

  1. कपिल शर्मा का जीवन परिचय
  2. नाथुराम गोडसे का जीवन परिचय 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *