प्लासी का युद्ध | Battle of Plassey details in Hindi

प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey details in hindi)

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत में सत्ता हासिल करने के लिए कई कूटनीतिक और सामरिक युध्द किये थे. कम्पनी को भारत में प्रभुत्व कायम दिलवाने में प्लासी के युद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं. वास्तव में रोबर्ट क्लाइव को दक्षिण पूर्व भारत में मिली जीत ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को मद्रास में सेटल होने का मौका दिया था, इसके आलावा ईस्ट इंडिया कम्पनी का दूसरा व्यापार-केंद्र भारत के पश्चिम में स्थित बोम्बे में था जबकि पूर्व में बंगाल की खाड़ी के उत्तर में स्थित कलकता था. ईस्ट इंडिया कम्पनी हुगली नदी  के पास अपनी पकड़ नहीं बना पा रही थी, जो कि आज का कलकता हैं, इन परिस्थितियों में प्लासी के युद्ध के परिणामों ने अंग्रेजों को अपना प्रभुत्व बनाने में मजबूती दी. ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत क्यों आई जानने के लिए यहाँ पढ़े 

Plasi yudha

किनके मध्य हुआ युद्ध (Combatants at the Battle of Plassey) ईस्ट इंडिया कम्पनी एवं बिहार और उड़ीसा के नवाब सिराज-उद्दोल्ला और फ्रेंच की एक छोटी टुकड़ी के मध्य लड़ा गया था.
युद्ध में दोनों पक्षों के सेनापति  (Generals at the Battle of Plassey) 

 

कर्नल रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के खिलाफ लड़ा था.
प्लासी के युद्ध का विजेता (Winner of the Battle of Plassey) सिराजुद्दोल्लाह की सेना के विश्वासघाती के कारण रोबर्ट क्लाइव की जीत हुयी थी.

 

प्लासी के युध्द में सेनाओं के वस्त्र, अस्त्र एवं शस्त्र (Uniforms, arms and equipment at the Battle of Plassey)

भारतीय मूल के सैनिकों के पास धनुष, तलवार और भाला एवं कुछ अग्नि शस्त्र थे, सिराज-उद-दौल्लाह की सेना में उत्तर-पश्चिम के  अफ़ग़ान और पठान थे, जो कि तलवार और भाले से युद्ध करने में निपुण थे. वही ब्रिटिश और फ्रेंच सेनाओं का महत्वपूर्ण घटक पैदल सेना और तोप थी. 

प्लासी के युद्ध से पूर्व की भूमिका (Background to the Battle of Plassey)

  • कलकता समुन्द्र किनारे होने के कारण अंग्रेजों की नजर में हमेशा से था लेकिन वहां स्थायित्व पाने के लिए उन्हें कुछ कूटनीतिक चालें चलनी पड़ी थी, इसके लिए उन्होंने वहां की राजनीति में अस्थिरता का पूरा फायदा उठाया था. बंगाल पर पहले से उत्तर और पश्चिम से अफ़ग़ान और मराठों की घुसपैठ हो रही थी, ऐसे में बंगाल के शासकों के लिए कम्पनी द्वारा रक्षा के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता काफी महत्वपूर्ण सिद्ध हो रही थी. 
  • 1741 में अलीवर्दी खान सरफराज खान को मारकर बंगाल के नवाब बने, दिल्ली के शासक भी लगातार मराठो के आक्रमण से काफी कमजोर हो चुके थे इसलिए उन्होंने बंगाल को अपने पर छोड़ रखा था, और बंगाल को दिल्ली से कोई मदद नहीं थी. ईस्ट इंडिया कम्पनी ने वहां रक्षा की अनुमति मांगी,और अलीवर्दी खान ने अनुमति दे दी.
  • 1756 में अलिवर्दी खान की मृत्यु हो गयी और उसकी जगह सिराज-उद्ल्लाह नवाब बना, उसने अपने दादा के जैसे ब्रिटिश के साथ संधि नहीं बनाये रखी. उसने तुरंत ईस्ट इंडिया कम्पनी को बाहर निकलने का आदेश दिया. नवाब ने कम्पनी के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप और नवाब के खिलाफ होने वाली गतिविधियों के कारण ये निर्णय लिया था. सिराजउद्दोलाह ने 4 जून 1756 को कासिमबाज़ार में कम्पनी की उस फैक्ट्री को सीज कर दिया जो कि निर्माण का नहीं बल्कि भंडारण और विक्रय का काम करती थी. उसने गेरिसन नाम के अंग्रेज अफसर को जेल में डाल दिया
  • 19 जून 1756 को सिराजुदोल्लाह ने कलकता को 4 दिन के लिए सीज करने के बाद अपने कब्जे में ले लिया, ये युद्ध ही तीसरी कर्नाटिक युद्ध कहलाता हैं, इसके बाद 20 जून को हुयी ब्लैक होल की घटना ने ब्रिटिशर्स में रोष बढा दिया. सिराजुदोल्लाह ने ब्रिटिश कैदियों को जेल में बंद किया था वहां पानी की कमी और घुटन से बड़ी संख्या में ब्रिटिशर्स मारे गये थे.

कलकता पर पुन:अधिग्रहण (The Re-capture of Calcutta)

  • 15 जुलाई 1756 को ब्लैक होल और कोलकाता के हाथ से निकलने की खबर मद्रास पहुंची और मेजर किलाप्त्रिक (Major Kilpatrick) के साथ एक फाॅर्स को हुगली की तरफ रवाना किया गया. कम्पनी ने ज्यादा से ज्यादा जहाज और सैनिकों को उधर भेजा जबकी कम्पनी को दक्षिण भारत में फ्रेंच के साथ उलझी हुयी थी, और सेना की वहां काफी जरूरत थी,लेकिन बंगाल और इसकी महत्ता के कारण इसे प्राथमिकता दी गयी थी. मिलिट्री और फ़ौज को वहां पहुँचने में समय लग गया,बेड़े का नेतृत्व रोबर्ट क्लाइव कर रहे थे.
  • बेडा 16 अक्टूबर 1756 को हुगली नदी पर पहुंचा. मारलबोरो (Marlborough) को छोडकर सारे जहाज 11 से 20 दिसम्बर के बीच में पहुंचे, जबकि मार्लबोरो 1757 में जनवरी के अंत तक पंहुचा इस तरह सारे जहाजों और सेना को एकत्र होने में काफी समय लग गया. लेकिन एक बार जैसे ही क्लाइव ने बंगाल में पैर रखा सिराज-उद्दोअल्लाह की ज्यादातर सेना कलकता से भाग निकली, बहुत कम संख्या में पीछे सैनिक बचे थे जिन्होंने क्लाइव के सामने 2 जनवरी 1757 को आत्म-समपर्ण कर दिया.
  • 9 जनवरी 1757 को क्लाइव ने हुगली के कस्बे को अपने नियन्त्रण में ले लिया. लेकिन सिराजुदोल्लाह को पीछे हटकर तसल्ली नही मिल रही थी इसलिए उसने ने कलकता पर वापिस आक्रमण करने का सोचा और एक सेना तैयार की जिसमे 18,000 घुड़सवार, 25000 पैदल सैनिक और 40 बंदूकें थी. 3 फरवरी 1757 को उसने कलकता में मराठा खाई के किनारे पहुंचकर बस्ती को सुरक्षा प्रदान की
  • 4 फरवरी 1757 को क्लाइव ने सिराजुदोल्ला पर आक्रमण कर दिया, उसने जान- बुझकर रात में आक्रमण करने का सोचा था लेकिन देर हो जाने से उसने सुबह के कोहरे में आक्रमण किया. कोहरे के हटने पर क्लाइव की छोटी सी टुकड़ी दिखाई दी, क्लाइव ने बहुत बहादुरी से युद्ध किया, जिससे सिराजुदोल्ला के पास हार मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा. 9 फरवरी 1757 को सिराजुदोल्ला ने कम्पनी के साथ संधि कर ली जिसमें उसने कलकता और कासिम बाज़ार में लूटी गयी सम्पति लौटा दी.
  • कम्पनी और सिराजुद्दोल्ला के मध्य संधि के बाद यूरोप से फ्रांस और इंग्लॅण्ड के मध्य के युद्ध की बात भारत पहुंची, जिसके कारण परिस्थितियां बदलने लगी, क्लाइव को अपनी आर्मी के साथ मद्रास की तरफ जाने का आदेश मिला, जिससे कोलकाता में सिराजुद्दौला और फ्रेंच बच सकते थे लेकिन क्लाइव बंगाल छोड़ने से पहले इस मसले को सुलझाना चाहता था.
  • क्लाइव के लिए यही आसान और सुरक्षित तरीका था कि वो चन्द्रानगर में फ्रेंच बस्ती को ध्वस्त कर दे. इससे सिराजुदोल्ला को गुस्सा आ सकता था क्योंकि वहां का नवाब होने के नाते सभी विदेशी बस्तियां उसकी सुरक्षा में थी. सिराजुदोल्ला फ्रेंच को बंगाल की सुरक्षा के लिए भी बनाये रखना चाहता था. क्लाइव ने चंदननगर की तरफ बढा और नवाब के सेनापति को  हस्तक्षेप नहीं करने के लिए रिश्वत देकर बस्ती को 23 मार्च 1757 को ध्वस्त कर दिया.  
  • सिराजुदोल्ला ने पश्चिम में भागलपुर की तरफ 100 मील बढने का आदेश दिया. वास्तव में चंद्रनगर के अधिग्रहण के बाद सिराज-उद्दोल्लाह और ईस्ट इण्डिया कम्पनी कमिटी के मध्य शिकायतों को लेकर पत्रों की श्रृंखला चली. 3 महीने के लिए नवाब अपनी आर्मी के साथ मुर्शिदाबाद के दक्षिण में भागीरथी नदी के किनारे प्लासी चला गया. उसकी सेना को राजा दुर्लभ राम और मीर जाफर खान सम्भाल रहे थे.

मीर जाफर खान की गद्दारी

क्लाइव और कम्पनी की कमिटी ने  नवाब के कलकता से दूर प्लासी में होने का फायदा उठान का सोचा. इस दौरान क्लाइव ने विलियम वाट के माध्यम से मीर जाफर खान के साथ संधि भी कर ली, संधि के अनुसार ब्रिटिशर्स मीर जाफरखान को बिहार, उड़ीसा और बंगाल में नवाबी हासिल करने में मदद करेंगे. सिराजुदोल्लाह के और भी कई मंत्री मीर जाफर खान के साथ इस साजिश में शामिल थे. सिराजुदोल्ला और कम्पनी के मध्य चल रही सन्धि के दिनों में ही कलकाता में मराठा सामंत का पात्र पहुंचा जिसमे सिराजुदोल्लाह के साथ युद्ध के लिए अंग्रेजों के सहयोग के लिए 12000 आदमियों की फ़ौज के साथ बंगाल में घुसपैठ करना था. क्लाइव को शक हुआ कि ये सिराजुदोल्ला द्वारा भेजा हुआ हो सकता हैं जिससे कि उसे ये पता चल सके कि अंग्रेजों के नवाब के खिलाफ क्या इरादे है. इस शक के आधार पर ही क्लाइव ने नवाब को एक पत्र भेजा जिसमें उसे आने वाले खतरे के लिए आगाह किया था और अपनी सेना को मुर्शिदाबाद से बुलाने को कहा.

प्लासी के युद्ध का घटनाक्रम (The Account of the Battle of Plassey)

  • 12 जून 1757 को बची हुयी फ़ौज एडमिरल वाटसन के बड़े से 150 नाविकों के साथ चन्द्र नगर पहुंची,क्लाइव के पास अब लगभग 950 यूरोपियन फ़ौज थी जिसमे,2100 सिपाही थी,100 तोपें थी 60 नाविक और 8 खरल बंदूकें थी. क्लाइव ने 13 जून 1757 को चन्द्रनगर से प्रस्थान किया और 16 जून को पलती पहुंचा, क्लाइव मेजर क्यूट (Eyre Coote) को लेकर छोटी सेना की टुकड़ी के साथ कटवा पर पोस्ट किया.
  • क्लाइव की सेना जब सिराजुदोल्ला के कैंप तक पहुंची तो मीर जाफर की हरकतों पर उसे शक होने लगा कि वो संधि का पालन करेगा या नहीं. क्योंकि यदि वो ऐसा नहीं करता तो क्लाइव की सेना के लिए जीतना मुश्किल हो सकता था. इसलिए क्लाइव कटवा में रुका और उसने कमिटी को पत्र लिखकर ये पूछा कि उसे आगे बढना चाहिए या नहीं. उसने इसके लिए अपने सभी अधिकारीयों से मीटिंग भी की, ज्यादातर अधिकारी रुके रहने का कह रहे थे लेकिन मेजर एयरे कूटे ( Major Eyre Coote, the hotheaded Queen’s officer of the 39th Foot) और युवा ऑफिसर आगे बढने को प्रेरित कर रहे थे. सिराजुद्दोला को जैसे ही पता चला कि क्लाइव कटवा में रुका हैं उसने प्लासी की तरफ अपनी सेना भेज दी और वहां अपनी जगह मजबूत की. इसी दौरान मीर जाफ़र का पत्र भी क्लाइव को मिला जिसमें उसने युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने का वादा किया था. क्लाइव ने तुरंत युद्ध के लिए अपना मन बनाया और अपनी सेना को आगे बढाया.
  • 22 जून 1757 को सुबह 6 बजे सेना अपने साथ आवश्यक सामान लेकर नावों में भागीरथी नदी पार करके पूर्वी किनारे की तरफ बढने लगे, आधे से ज्यादा दिन निकलने के बाद सेना प्लासी से 15 मील दूरी तक पहुंची, और शाम तक क्लाइव की सेना ने आगे बढना शुरू किया. उस समय काफी बारिश हो रही थी,नदी उफान पर थी, जिससे सैनिको के कमर तक पानी आया हुआ था.
  • 23 जून 1757 को सेना प्लासी के उस गाँव में पहुँच ही गयी जहां नवाब सिराजूद्दोल्लाह का शासन था. और आम के पेड़ो के पीछे छुप गये. क्लाइव ने भगीरथी नदी के किनारे पर बने शिकार लॉज की शरण ली थी, जहां से वो आम के बाग़ पर और सामने आने वाली सेना पर नजर रख सकता था, उसके लॉज के आगे एक भट्टी थी,जिसके पीछे उसने कुछ अंग्रेज सैनिक थे. कम्पनी की सेना नवाब के सैनिको के आगमन की आवाज़ सुन सकते थी. नदी किनारे 2 टैंक थे,एक बड़ा टैंक भारतीय सेना के पास था तो दूसरा छोटा टैंक अंग्रेजों को थोडा बहुत काम आ रहा था.
  • राज की सेना प्लासी के कैंप से निकली और उसने क्लाइव की सेना को लगभग चारों तरफ से घेर लिया,और सम्मुख युद्ध की स्थिति बनाई.
  • बड़े टैंक के पास फ्रेंच सेना इंग्लिश आर्मी से आधे मील की दूरी पर खड़ी थी,बड़े टैंक और नदी के बीच में भारतीय बन्दूकधारियों के 2 समूह थे, जिसका नेतृत्व मीर मदन खान कर रहा था जो कि सिराज का विश्वसनीय सेनापति था. उसके पास 5000 घुड़सवार और 7000 पैदल सैनिक थे. सिराज की बाकि सेना ने नदी की तरफ मुंह किया था और आम के जंगलों के पीछे की तरफ से भी घेरा बना’कर रखा था.
  • नदी से कुछ दूर एक पहाड़ी थी और पहाड़ी की तरफ राजा दुर्लभ राम और यार लुत्फ़ खान जबकि बायीं तरफ मीर जाफर खान था जो कि विश्वासघाती था. इस तरह बनी अर्द्ध-चन्द्राकार सेना में कुल 45000 बंदूकधारी सैनिक और घुड़सवार थे. क्लाइव की सेना सब तरफ से गिरी हुयी थी, उसकी सफलता सिर्फ और सिर्फ मीर जाफर खान पर निर्भर करती थी.
  • क्लाइव शिकारलॉज की छत पर से सिराज की सेना की घेराबंदी देख रहा था, जैसी ही मीर जाफर खान की फ़ौज ने आम के बाग़ की तरफ बढना शुरू किया उसे ये डर लगा कि मीर जाफर खान ने उसको धोखा दिया तो उसके लिए बचना सम्भव ही नही होगा.
  • सिराज ने पारम्परिक भारतीय युद्ध नीति में बदलाव करते हुए तोपों और बंदूकधारियों को एक क्रम में लगाने के स्थान पर तोपों के साथ ही बन्दूकधारियों की श्रेणिया लगाई थी. क्लाइव ने भी युद्ध नीति में थोडा बदलाव करते हुए अपनी सेना को जंगलों से निकलकर एक पंक्ति में क्रमबद्ध होने का आदेश दिया  इसके लिए उसने मेजर किल्पेत्रिक(Major Kilpatrick) मेजर ग्रांट( Major Grant) मेजर क्रूट ( Major Coote) और  कैप्टेन गौप्प ( Captain Gaupp)  के नेतृत्व में 4 डिविजन बनाये और 3 एवं 6 पौंड की बन्दूकों को दोनों तरफ भेज दिया.
  • इस तरह दोनों सेनाए सुबह 8 बजे तक अपनी जगह ले चुकी थी, सेंट फ़्रिस (St Frais) के नेतृत्व वाली सेना ने पहले फायर किया, जिसने सिराजुदोल्ला की आर्मी के लिए सिग्नल के जैसे काम किया और पूरी भारतीय पंक्ति ने एक साथ फायरिंग शुरू कर दी. भारतीय सेना हलके धुंध में छुपी थी, क्लाइव की तरफ से जवाबी हमला आया और सिराज की सेना को काफी नुक्सान पंहुचा. आधे घंटे में क्लाइव की सेना में 30 सैनिक मारे गये जिससे उसने अपनी सेना को आम के जंगलों में पीछे ले लिया.
  • क्लाइव के पीछे हटने से सिराज थोडा आगे बढ़ा और उसने फायरिंग चालू रखी, उसके सैनिक जंगलों में छुपे फायरिंग कर रहे थे. क्लाइव की फायरिंग से नवाब की सेना को नुकसान भी होने लगा,छोटे जानवर जो गोला बारूद पहुंचाने का काम कर रहे थे वो मरने लगे. इस तरह तीन घंटे तक युद्ध चला लेकिन कोई निर्णय की स्थिति नही बनी,इसलिए क्लाइव ने अपने कमांडर से रात तक युद्ध जारी रखने को कहा.
  • इसके बाद बारिश शुरू हो गयी,अंग्रेजों की सेना को इसकी आदत थी और उनके पास ऐसे कपड़े भी थे जिसे ढंककर वो बारिश से बच सकते थे, और अपने गोले-बारूद को भी बचा सकते थे लेकिन भारतीयों के पास कोई सुविधा नहीं थी, इसलिए सब नष्ट होने लगा. इधर मीर मदन खान को लगा कि अंग्रेजों की सेना को भी यही समस्या हो रही होगी इसलिए उसने लड़ाई जारी रखी, लेकिन उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा और वो बुरी तरह से घायल होकर मर गया. नवाब के लिए ये बहुत बड़ा नुकसान था क्योंकि मीर मदन खान ही उसे जीता सकता था, उसके अलावा बाकि तीनों सेनापति विश्वासघाती थे.
  • मीर जाफर खान ने क्लाइव को पत्र लिखकर सूचना दी कि मीर मदन खान मर चूका हैं, इसलिए वो तुरंत आक्रमण करे,हालंकि युद्ध के दौरान ये पत्र क्लाइव तक नहीं पंहुचा था. वही सिराज ने अपने अन्य सेनापतियों से बात की तो राजा दुर्लभ ने सिराज और उसकी सेना से कैंप छोड़ने को कहा और नवाब ने उसकी बात मान ली एवं वो अपने साथ 2000 घुड़सवारों को लेकर मुर्शिदाबाद की तरफ रवाना हो गया.
  • मेजर किलपैट्रिक ने सिराज उल्लाह की सेना को पीछे हटते देखा तो उसने क्लाइव को सुचना भेजी कि वो 250 यूरोपियन फ़ौज के साथ इस दिशा में आगे बढ़ रहा हैं, क्लाइव उसे रोकने को लिए तुरंत लॉज के बाहर आया लेकिन जब उसे समझ आया कि ये निर्णय सही हैं  तो उसने अपनी बाकी सेना को भी इसमें शामिल होने का आदेश दे दिया.
  • मीर जाफर खान जब आम के जंगलों के पश्चिम दिशा की तरफ बढने लगा तो उसकी सेना ने अंग्रेजों की जगह लेना शुरू की. मीर जाफर खान के इरादे अब भी क्लाइव को समझ नहीं आ रहे थे, और उस समय भी नहीं पता था कि उसके सामने जो सेना हैं वो मीर जाफर की हैं या किसी और की,इसलिए क्लाइव ने प्लासी के कैंप पर बमबारी शुरू कर दी. नवाब के वो सैनिक जो कि गद्दार नहीं थे उन्होंने कैंप से बाहर आकर लड़ना शुरू किया, उन्होंने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन नेतृत्व के अभाव में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी. क्लाइव को शाम के 5 बजे तक जीत मिल ही गयी,वो सिराज के कैंप तक पहुँच गया था.

सिराजुदोल्ला की हार का कारण

  • सिराजुदोल्ला मात्र 21 वर्ष का अनुभवहीन शासक था जबकि क्लाइव काफी अनुभवी और योद्धा था. क्लाइव के पास बहुत से वर्षों का अनुभव था जबकि सिराजुदोल्लाह को हमेशा मराठा और अफगानों के घुसपैठ की आशंका बनी रहती थी. क्लाइव ने नवाब के सारे मंत्रियों और दरबारियों को भृष्ट करने का काम किया.
  • सिराजुदोल्ला की सेना में 35,000 पैदल सैनिक शामिल थे और 15000 घुड़सवारों की संख्या थी जिनमें अनुशासन के अभाव के साथ ही शस्त्रों की भी कमी थी. सिराज-उद-दौला के तोप के जखीरे  में 32, 24 और 18 पाउंडर्स की 53 तोपें थी. लेकिन ये इस युध्द के उपयुक्त नही थी क्योंकि लोड करने में मुश्किल , धीमी और  भारी तोपों के लिए वहां की परिस्थितियां अनुकूल नही थी. इस युद्ध में नवाब पर्याप्त मात्र में बंदूक और गोला बारूद ले जाने के लिए साधन की सुविधा भी नहीं थी,फिर भी उसने हाथियों की सहायता से खीचने की कोशिश की लेकिन उसे ज्यादा सफलता नही मिली. इसके अलावा 32 पाउंड बंदूक से 6 पौंड का गोला ज्यादा नुकसान कर सकता था, भारतीय बंदूकधारी ज्यादा योग्य नहीं थे और एक राउंड में गोलीबारी करने के लिए  15 मिनिट लगाते थे वही अंग्रेजों की बन्दूकों से ये काम 2-3 मिनिट में हो जाता था. इस तरह लोकल बनाई गयी भारतीय बंदूकें ज्यादा दूरी तक मार नहीं कर सकती थी नाही चलाने में इतनी आसान थी. लेकिन फिर भी सिराज को ये गलतफहमी हो रही थी कि इस युद्ध से क्लाइव की सेना को काफी नुक्सान पहुचाया जा सकता हैं.
  • चन्द्रनगर के खत्म होने के बाद सिराजउद्दोलाह बहुत कम अनुभवी सेनापतियों के भरोसे हो गया था, जिनमे से ज्यादा उसकी राजधानी मुर्शिदाबाद में रूचि रखते थे और इंग्लिश के प्रति समर्पित भी थे. मोंसियूर लॉ और उसके फ्रेंच फ़ौज पर ही नवाब पूरी तरह से निर्भर करता था

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