हल्दीघाटी का युद्ध | The Battle of Haldighati in Hindi

हल्दीघाटी का युद्ध (The Battle of Haldighati in Hindi)

हल्दीघाटी का युद्ध केवल राजपूतो के संघर्ष और शौर्य की गाथा नहीं हैं बल्कि ये यहाँ के भीलों का अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण की कहानी भी कहती हैं और मेवाड़ के गौरव को बचाने के लिए पैदा हुए भामाशाहों की अमर गाथा भी सुनाती है, और सबसे महत्वपूर्ण बात ये हैं कि अकबर को पूरे उत्तर भारत में कड़ी टक्कर हल्दीघाटी में ही मिली थी, हालाँकि इसके परिणामो पर विभिन्न मत हैं लेकिन मेवाड़ के राजपूतों और भीलों के त्याग, समर्पण और साहस की कहानी आज भी हल्दीघाटी की माटी शान से बताती हैं.
Haldighati ka Yudhya

युद्ध का नाम (Battle name) हल्दीघाटी का युद्ध
हल्दीघाटी कहां स्थित हैं? (Where is Haldighati situated?) उदयपुर के पास
हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ था? (When did Haldighati battle happened) 18 जून 1576 को
युद्ध कितने समय तक चला था? (War duration) 4 घंटे तक
हल्दीघाटी का युद्ध किनके मध्य हुआ था? (Who fought the Haldighati battle) मेवाड़ के महाराणा प्रताप और दिल्ली के अकबर के मध्य युद्ध हुआ था,

 

 हल्दीघाटी का भूगोल (Geography of Haldighati)

हल्दीघाटी के युद्ध को समझने के लिए हल्दीघाटी के भूगोल को समझना बेहद आवश्यक हैं. यह जगह अरावली की पहाड़ियों में एक छोटे सा गाँव हैं, जो कि उदयपुर से 44 किलोमीटर उत्तर की तरफ स्थित हैं. समुद्र तल से 1839 मीटर ऊँचे हल्दीघाटी में मुलायम और पीली मिट्टी हैं जो कि हल्दी जैसी दिखाई देती हैं इसलिए इसे हल्दीघाटी कहते हैं.

हल्दीघाटी युद्ध के कारण (The reasons that led to the Haldighati Battle)

1500 ईस्वी के मध्य में जब अकबर का भारत में शासन था तब अकबर ने सभी राजपूतों को या तो संधि से या युद्ध में जीत लिया था लेकिन वो मेवाड़ नहीं जीत सका था, उसने मेवाड़ पर कई बार आक्रमण भी किया था. 1573 में उसने प्रताप के साथ संधि करने की भी कोशिश की थी, लेकिन प्रताप ने कभी मेवाड़ को किसी के अधीन देखना पसंद नहीं किया, इससे अकबर नाराज हो गया और उसने मुगल सरदार आसफ खान और आमेर के राजपूत राजा मानसिंह को मेवाड़ से युद्ध करने के लिए भेजा. महाराण प्रताप का जीवन परिचय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 

हल्दीघाटी के युद्ध में सेना की संख्या (The strength of warring forces)
मानसिंह ने अपनी 5000 की सेना के साथ मेवाड़ का रुख किया था, अकबर को लगा था कि प्रताप और उसकी सेना मुगलों की सेना का सामना कभी नहीं कर पायेगी क्योंकि उसके पास साधन, सैनिक एवं अनुभव नहीं हैं, लेकिन अकबर गलत था क्योंकि प्रताप के पास भले बड़ी सेना नहीं थी लेकिन उनके पास भीलों की शक्ति थी, ग्वालियर के तंवर, मेड़ता के राठौड़ भी मुगलों के सम्मुख युद्ध में प्रताप के साथ थे. राणा प्रताप के पास उनका साथ देने के लिए अफगान योद्धाओं का समूह भी था, जिसका नेतृत्व हाकिम खान सुर कर रहा था. इसके अलावा कुछ छोटे-बड़े हिन्दू-मुस्लिम शासक भी थे जो मुगलों को हराना चाहते थे.

महराणा प्रताप और हल्दीघाटी का युद्ध (Maharana Pratap and Haldighati Battle)

प्रताप एक साहसी, वीर एवं कुशल योद्धा थे. हल्दीघाटी के युद्ध क्षेत्र में प्रताप के एक हाथ में बड़ी सी तलवार थी, साथ में भाला और अन्य अस्त्र भी थे और उनके साथ उनकी सेना मेवाड़ का प्रतीक चिन्ह लेकर चल रही थी. प्रताप के युद्ध की कुछ पोशाकें और कुछ शस्त्र अब भी उदयपुर म्यूजियम में सुरक्षित हैं. उनके पास सफेद रंग में अरब नस्ल का चेतक नाम का घोडा था जो कि युद्ध में किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहता था. राणा अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर युद्ध में आये थे, उनके घोड़े को इस तरह तैयार किया गया था कि उससे शत्रु के हाथी भी डर सकते थे. चेतक ने महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकाला था, लेकिन घायल होने की वजह से युद्ध के पश्चात उसकी मृत्यु हो गयी, प्रताप के लिए यह ऐसी क्षति थी जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती थी.

कैसे शुरू हुआ युद्ध (How did Battle get started?)

  • 3 मई को मुगलों ने हल्दीघाटी के दक्षिण में हल्दीघाटी गाँव में प्रवेश किया, जिसके पास ही प्रताप की अस्थायी राजधानी कुम्भलगढ़ थी और मुगलों ने वहां के भूगोल के अनुसार युद्ध के लिए आवश्यक तैयारी शुरू कर दी.
  • 18 जून 1576 को सूर्योदय से पहले मुगलों ने अपना सैन्य अभियान शुरू किया लेकिन जैसे ही सूर्योदय हुआ एक भील ने खमनोर के पास एक बहुत बड़ी सेना को नदी किनारे एकत्र होते देखा. उसके बाद प्रताप ने हल्दीघाटी से अपना अभियान शुरू किया और मुगलों की तरफ युद्ध के लिए बढना शुरू किया.

युद्ध का दिन (The Battle day)                         

  • 21 जून 1576 को राणा प्रताप की सेना का सामना अकबर की सेना से हुआ, युद्ध शुरू होते ही महराणा ने सेना को आगे बढने का आदेश दिया, और दोनों तरफ से सैनिकों की तलवारे चमकने लगी.
  • अकबर की सेना का नेतृत्व मानसिंह कर रहा था. मानसिंह ने युद्ध की शुरुआत की थी, उसने सभी मुगल सरदारों को दाहिनी तरफ पंक्तिबद्ध कर दिया और बायीं तरफ गाज़ी खान और राव लोनकरण को तैनात कर दिया. साथ ही उसने सभी घुड़सवारों को भी पीछे की तरफ एक लाइन में तैनात कर दिया. उसने अल्तामाश (Altamash) में भी कुछ सैनिक रखे, अल्तामाश वो समूह होता था जो केंद्र और आगे की तरफ तैनात योद्धाओं के मध्य की जगह में होता था. यदि किसी कारणवश आगे वाले सैनिक केंद्र से अलग हो जाए और बीच में स्थिति कमजोर होने लगे तो अल्त्माश उस जगह को भरते थे. कुम्भलगढ़ किले का इतिहास पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें 
  • मेवाड़ की सेना ने तीन समानांतर टुकड़ी बनाकर मुगल सेना का सामना किया था. राणा ने जहां केंद्र में मोर्चा संभाला था वही ग्वालियर के राजा को दाहिने तरफ, जबकि भील जनजाति को बायीं तरफ तैनात किया गया.
  • मानसिंह की टुकड़ी पहाड़ी पर ना होकर समतल पर थी इसलिए युद्ध के प्रथम चरण में मेवाड़ की सेना उस पर तूफ़ान बनकर बरसी थी. बहुत जल्द युद्ध में मृत सैनिकों ने मार्ग को अवरुद्ध कर दिया और दोनों पक्षों के लिए युद्ध मुश्किल होने लगा था.
  • इस तरह शुरू में मेवाड़ी सेना ने दुश्मनों को नदी से 16 किलोमीटर दूर तक खदेड़ दिया लेकिन मुगल सेना फिर से गठित होकर लौट आई और युद्ध करने लगी. हालांकि ये भी माना जाता हैं कि कुछ मुगल सैनिक बिना लडे भी भाग गए थे. मुगलों को राणा प्रताप के जवाबी हमले से काफी आश्चर्य हुआ था, क्योंकि मुगल सेना अपनी जीत सुनिश्चित मानकर आई थी.
  • मुगलों की सेना को कमजोर पड़ता देखकर मानसिंह ने युद्ध के केंद्र में आकर मोर्चा संभाला था लेकिन प्रताप और उनकी सेना की वीरता के सामने मानसिंह के लिए परिस्थितियाँ जटिल हो रही थी, फिर भी अधिक संख्या में मुगल सेना के होने के कारण धीमे-धीमे मेवाड़ी सेना युद्ध में पिछड़ने लगी.
  • प्रताप दोनों हाथ में तलवार लेकर अपना योद्ध कौशल दिखा रहे थे, और उन्होंने प्रथम पंक्ति को ध्वस्त कर दिया लेकिन प्रताप को मुगल सैनिकों की पंक्तियों के बीच अपने हाथी लगाने थे, जिसमे वो सफल नहीं हो पा रहे थे, यदि वहां सैनिक मर भी जाते तो वापिस नए सैनिक लगा दिए जाते थे. महराणा ने तब अपने पैदल सैनिकों को वहां पर लगाया और अपने हाथियों को मानसिंह के हाथियों के सम्मुख लगाकर युद्ध करना शुरू कर दिया,
  • फजल नाम के इतिहासकार के अनुसार लोना नाम के राजपूत हाथी ने मुगल-पंक्ति को ध्वस्त कर दिया, लोना से लोहा लेने के लिए मुगलों ने गजमुख को आगे किया, फिर भी लोना ने बेहतर प्रदर्शन किया. लेकिन कुछ समय बाद जब लोना घायल हो गया तब राजपूतों ने हाथियों के सेना प्रमुख राम प्रसाद को आगे किया और उन्होने भी मुगल सेना की एक पंक्ति को नष्ट कर दिया. लेकिन रामप्रसाद की मृत्यु के बाद मेवाड़ी सेना फिर से कमजोर होने लगी.
  • महारणा प्रताप ने जब मान सिंह को देखा तो उन्होंने उसकी तरफ रुख किया, और अपना घोडा लेकर उसकी तरफ गए और मार्ग में उनका सामना बहलोल खान से हुआ जिसने पहले महाराणा के सैनिक की हत्या की थी. महाराणा ने अपनी तलवार के एक वार से बहलोल खान के साथ उसके सहयोगी तलवारधारी सैनिक और घोड़े के सर को एक साथ धड से अलग कर दिया. वहां उपस्थित हर सैनिक इस दृश्य को देखकर चकित था, और मेवाड़ी सेना में उत्साह की लहर फ़ैल गयी जिससे हर-हर महादेव के जयघोष ने अल्ला-हु-अकबर को एक बार के लिए दबा दिया, लेकिन शायद ये ज्यादा समय तक नहीं चला, मेवाड़ी सैनिक मानसिंह और उसके सैनिकों के तीरों से घायल होकर गिरने लगे. वास्तव में उस समय मुगल सेना में ये अफवाह फ़ैल गयी थी कि स्वयं अकबर युद्ध में शामिल होने को आ रहा है जिससे सेना में उत्साह बढ़ गया था.
  • मानसिंह ने प्रताप के चांदी के छत्र पर पीछे से आक्रमण किया और प्रताप को घायल कर दिया, प्रताप वहां से अपने भाई शक्ता (शक्तिसिंह) की मदद से बचकर निकल गये लेकिन उनके पीछे मानसिंह झाला ने प्रताप का मुकुट पहन लिया था जिससे मानसिंह ने मानसिंह झाला को राणा प्रताप समझ लिया और उसे मार गिराया, जिससे राणा प्रताप की शक्तियाँ कम हो गयी. उसे युद्ध क्षेत्र से लौटकर ये पता चला कि उसने जिसे मारा हैं वो राणा प्रताप नहीं बल्कि उनका विश्वसनीय व्यक्ति हैं, अगली सुबह जब मानसिंह ने वापिस आक्रमण किया तब वहां कोई युद्ध की स्थिति नहीं थी. मेवाड़ की सेना नहीं थी.

युद्ध के परिणाम (Results of the Battle)

आज तक ये बात विवादित हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध का परिणाम क्या हुआ था, राणा प्रताप जीते थे या हारे थे, अकबर ने मेवाड़ पर कब्ज़ा कैसे किया था जैसे कई सवाल है जिनसे इतिहासकार जूझते रहते हैं.

युद्ध के पश्चात की परिस्थिति  (Conditions after Battle)

  • हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी राणा प्रताप मुगलों से युद्ध करते रहे, वो लगातार गुरिल्ला युद्ध पद्धति से मुगलों पर प्रहार करते रहे, और कैंप में रुककर मुगल सेना की नाक में दम करते रहे. अपना महल छोड़ जंगलों में रहकर भी उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि मुगल सेना मेवाड़ में शांति से न रह सके. इसी दौरान राणा प्रताप को आर्थिक कठिनाई का सामना भी करना पड़ा था एवं उन्हें भामाशाह नाम के दानवीर मिले जिन्होंने अपन समस्त धन एवं सम्पति उन्हें दान कर दी और उनकी प्रेरणा से और भी कई जमींदारों एवं सरदारों ने प्रताप की सेना को आर्थिक सहायता दी.
  • भील जनजाति ने युद्ध के साथ ही प्रताप को जंगल में रहने में मदद की थी. उन्होंने नयी रणनीति का प्रयोग किया जिसमें आग में झुलसी धरती का उपयोग, कुँओं को जहरीला करना, संबंधित क्षेत्रों से आम लोगों के निकासी व्यवस्था, छापेमार पद्धति से युद्ध, मुगलों की सेना में लूटपाट जैसी नयी पद्धतियों को काम में लिया. उन्होंने राजस्थान के कई क्षेत्रों को मुगलों के आधिपत्य से मुक्त करवाया था. 1597 में प्रताप के देहांत के बाद ही मुगल मेवाड़ की तरफ देखने की हिम्मत कर सके थे.

हल्दीघाटी के युद्ध का परिणाम क्या रहा था, और रण में मेवाड़ एवं मुगलों की जीत का कौनसा क्रम था, ये भले विवाद या विचार-विमर्श का विषय हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड़ के गौरवशाली संघर्ष को बताता हैं. अगले 20 वर्षो तक मुगल सेना को लगता था कि महराणा कोई इंसान नहीं बल्कि भूत हैं, क्योंकि अकबर के सेनापति ने चित्तौड़ में कार्य करने से इंकार कर दिया. एक सेनापति तो फ़क़ीर ही बन गया.

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