भारत-पाकिस्तान विभाजन का इतिहास | India Pakistan Partition History in Hindi

भारत-पाकिस्तान विभाजन का इतिहास (India Pakistan Partition History in Hindi)

भारत वर्ष पर 200 वर्षों तक अंग्रेजों का शासन रहा हैं, फिर भारत को जो स्वतन्त्रता मिली उसकी देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. स्वतंत्रता के साथ ही भारत के दो हिस्से हुए और एक नये देश पाकिस्तान का जन्म हुआ. इससे पहले ही भारत से श्रीलंका और बर्मा अलग हो चुके थे. भारत का विभाजन 20वीं सदी की वो घटना हैं जिसे भुलाना या नजरंदाज करना असम्भव हैं क्योंकि देश को अंग्रेजों से मुक्ति तो मिल गयी लेकिन पाकिस्तान के रूप में भारत को एक नया पड़ोसी देश मिल गया. ये प्रक्रिया आसान नही थी, बहुत लम्बे अंतरद्वंद के बाद पाकिस्तान का निर्माण हुआ था. इसके अंतर्गत पहले बंगाल का पूर्वी और पश्चिमी बंगाल में विभाजन हुआ,पूर्वी बंगाल के मुस्लिम बहूल होने के कारण इसे पूर्वी पाकिस्तान में शामिल किया गया था, लेकिन कालान्तर में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि ये प्रदेश पाकिस्तान से अलग हो गया और वर्तमान में बांगला देश के नाम से जाना जाता हैं. हालांकि विश्व और देश में और भी कई जगह और कई बार इस तरह की मांग असुरक्षित अल्पसंख्यकों ने है, जैसे कि पश्चिम एशिया में कुर्द, रूस में चेचेन, चीन में उइगर, और वर्तमान में हमारे देश में भी मिज़ोस, नागा और कश्मीर जैसे उदाहरण हैं. 

India Pakistan Partition History

भारत-पाकिस्तान विभाजन 14-15 अगस्त 1947
भारत को स्वतंत्रता मिली 15 अगस्त 1947 को
पाकिस्तान बना 14 अगस्त 1947 को
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु
पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान

भारत-पाकिस्तान अलग क्यों हुए?? (Why India and Pakistan were separated?)

वास्तव में ये अंग्रेजों का दिमाग था जो देश में सदा से फूट डालो राज करो की कूटनीति पर काम कर रहे थे. 1757 की शुरुआत में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल के कुछ हिस्सों पर शासन शुरू किया,और धीर-धीरे लगभग पूरे भारत की सत्ता अपने हाथ में ले ली. 1858 में हुयी सशस्त्र क्रान्ति के बाद 1878 तक सत्ता का हस्तानांतरण ईस्ट इंडिया कम्पनी से क्वीन विक्टोरिया के हाथ में चला गया. और इसके बाद परिस्थितियाँ बदलने लगी जो स्वतंत्रता के साथ विभाजन के कगार तक पहुंची.         

1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुयी जिसमें हिन्दुओं की का प्रभुत्व ज्यादा था. जब ब्रिटिश सरकार ने धर्म के आधार पर बंगाल विभाजन करने की कोशिश की तब इंडियन नेशनल कोंग्रेस ने इसका विरोध किया,जिससे मुस्लिम लीग का जन्म हुआ. इस तरह अंग्रेज अपनी कूटनीति में सफल हुए. हालांकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों का उद्देश्य अंग्रेजों को भारत से बाहर करने का ही था. लेकिन तब भी पाकिस्तान बनाने के लिए कुछ स्पष्ट उद्देश्य या एक्शन प्लान नहीं था,ये लम्बी प्रक्रिया थी जिसके चलते भारत-पाकिस्तान अलग हुए.  

विभाजन का घटनाक्रम (Partition chronology)

  • 1909 में ब्रिटिश ने धर्म के आधार पर अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाया जिसके कारण दोनों पक्षों में तनाव बढ़ गया. ब्रिटिश सरकार ने इस तनाव को और ज्यादा बढ़ाने के लिए रेलवे टर्मिनल्स पर अलग सुविधाए देना शुरू किया. 1920 तक व्यक्ति की धार्मिक आधार पर पहचान बनना शुरू हो गयी और ऐसे में होली के त्यौहार पर दंगों की स्थिति बन ही गयी जब गायों को काटा गया और हिन्दूओं ने मस्जिद के सामने नमाज के समय संगीत बजाया.
  • फरवरी 1947 में ब्रिटिश सरकार ने ये घोषणा की थी वो देश छोड़ देंगे. इस दौरान भारतीय और ब्रिटिश सरकार के नेताओं ने आवश्यक निर्णय और सत्ता हस्तांतरण पर काम करना शुरू कर दिया,भारत के नेताओं में इंडियन नेशनल कांग्रेस की तरफ से जवाहरलाल नेहरु जबकि मुस्लिम लीग की तरफ से मोहम्मद अली जिन्ना प्रतिनिधित्व कर रहे थे.
  • जिन्ना ने मुस्लिमों के लिए एक नए देश की मांग की, क्योंकि उन्हें डर था कि भारत एक हिन्दू बहुल देश हैं और स्वतंत्रता के बाद शायद उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा पूरी ना हो सकेगी. हालांकि नेहरु ने अविभाजित और एक भारत बनाने पर जोर दिया जिसमें पूरे उपमहाद्वीप को शामिल किया जा सके. लेकिन ब्रिटिशर्स खुदको उपनैविशिक राजनीति से खुदको अलग करना चाहते थे, और प्रधानमन्त्री क्लीमेंट एटली एक साल पहले अगस्त 1947 में भारत के स्वतंत्रता की तारीख निश्चित कर चुके थे.
  • 3 जून 1947 के दिन मुस्लिम लीग और कांग्रेस के एक जॉइंट कांफ्रेंस में भारत के आखिरी वायसराय लुईस माउंटबेटन ने स्वतंत्रता की घोषणा की. इसी दिन रेडियो पर प्रसारित एक संबोधन में नेहरू, जिन्ना, बलदेव सिंह और माउंटबेटन ने स्वतंत्रता और इससे सम्बंधित योजनाओं के बारे में बताया. इन योजनाओं में माना गया कि एक विभाजन अवश्य होना चाहिए, जो कि पूर्व में बंगाल के प्रांतों और उत्तर पश्चिम में पंजाब को विभाजित करेगा. ब्रिटिश सिविल सर्वेंट ने सर डिवाइल रेडक्लिफ, इस विभाजन को मैप करने का स्मारक कार्य सौंपा, भारत और पाकिस्तान की नई सीमाओं को निर्धारित करने के लिए सिर्फ छह सप्ताह दिए गए.
  • वास्तव में रेडक्लिफ की नक्शे पर जल्दबाजी में खींची गई रेखाओं ने एक राजनीतिक सीमा बनाई जिसके लिए कोई ठोस आधार ना था. उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व में मुस्लिम आबादी वाले अधिकांश इलाके पाकिस्तान के रूप में नामित किए गए थे वही हिन्दू बहुसंख्यक क्षेत्र भारत बन गया.·       
  • इस जनसांख्यिकी तर्क ने भारतीय समाज की उस ज़मीनी सच्चाई को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू और मुसलमान-सिख, ईसाई और अन्य लोगों के साथ-साथ उपमहाद्वीप के सभी हिस्सों में सदियों से साथ-साथ रहते थे. एक मानचित्रकार की कलम के कारण वो परिवार और समुदाय रातोंरात धार्मिक “अल्पसंख्यक” बन गए. इस अल्पसंख्यक वाले दर्जे से सावधान होते हुए बहुत से लोग अपने घर छोड़ने लगे. भारत में हिंदू और सिख सुरक्षित स्थानों की और भागने लगे मुसलमान पकिस्तान की तरफ बढ़ने लगे.और इन सबमें  पंद्रह मिलियन तक शरणार्थियों ने इस दौरान अपनी जगह बदली. 
  • इस तरह सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि भारत पाकिस्तान का विभाजन शांतिपूर्ण नहीं था,इसकी पृष्ठभूमि स्वतंत्रता के बहुत पहले ही बनना शुरू हो गयी थी. जैसे-जैसे स्वतंत्रता का दिन नजदीक आ रहा था, आम-जन में आक्रोश बढ़ रहा था और तनावपूर्ण स्थिति बनने लगी थी. हालांकि गांधीजी तब भी शांति और सौहार्द बनाये रखने की अपील कर रहे थे लेकिन मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को एक डायरेक्ट एक्शन डे घोषित किया, जिसके कारण कोलकाता में 4000 से ज्यादा हिंदुओं और सिखों की हत्या हो गयी, इस बात से हिंसा की आग पूरे देश में फ़ैल गयी,जो कि कई वर्षों तक अनवरत चलती रही.

भारत पाकिस्तान विभाजन के क्या कारण थे? (What was the reasons of partition of India and Pakistan?)

भारत का विभाजन क्यों हुआ, इसके लिए इतिहासकार कई तरह के तर्क देते हैं, कुछ लोग उपनिवेशवाद के लंबे इतिहास में अंतर्निहित कारणों की तलाश करते हैं. वहीं कुछ का मानना हैं कि धार्मिक विभिन्नताओं के कारण  हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राजनीतिक समुदाय थे. अन्य लोगों ने भारतीय राष्ट्रवाद पर एक महत्वपूर्ण तर्क दिया कि वे स्वतंत्र भारत की कल्पना करते समय इन विभाजनों को दूर करने में असमर्थ थे. अब भी कुछ लोग औपनिवेशिक शासन के अंतिम दशक पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जब द्वितीय विश्व-युद्ध के उपद्रवों ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया, प्रांतीय राजनेताओं ने अपने स्वार्थ सिद्धि की कोशिशें की और एक अलग मुस्लिम मातृभूमि की मांग तेज हुयी. वे 1947 की अंतिम राजनीतिक वार्ताओं का साक्ष्य भी देते हैं, जिसमें धार्मिक समुदायों के बीच बढ़ती हिंसा की पृष्ठभूमि मुख्य कारण माना जाता हैं, जो कि उस समय  के “अन्य” समुदाय का प्रचार करने वाले नेताओं, और स्थानीय नेताओं के उकसावे से फैल गया था. 

  • उस समय भारत में मुख्य राष्ट्रवादी पार्टी नेशनल इंडियन कांग्रेस की थी जिसके प्रमुख नेता महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु थे. 1940 से पहले तक यह पार्टी एक मजबूत केंद्र के साथ एकात्मक राज्य के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहा थी, भले ही कांग्रेस अपने उद्देश्यों में अस्थिर रूप से धर्मनिरपेक्ष थी लेकिन अल्पसंख्यक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने इस विचार को संदेह के साथ देखा. मुस्लिमों को यह विश्वास बनने लगा की यह हिंदुओं के राजनीतिक प्रभुत्व को प्रभावित करेगा, जिनकी उस समय देश में लगभग 80% आबादी थी.
  • बहुत कम आबादी के साथ  मुस्लिम ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक थे. शाही शासन के तहत, वे आरक्षित विधायी सीटों की एक प्रणाली और अलग-अलग मतदाताओं द्वारा अपनी अल्पसंख्यक स्थिति को संरक्षित करने के आदी हो गए थे. आजादी के बाद इन सब सुविधाओं को खोने का डर मुल्सिमों में बढ़ रहा था, इस डर की शुरुआत उत्तरी भारत से हुयी थी उसके बाद विश्व युद्ध द्वितीय और जो भी परिस्थतियाँ बन रही थी उनका डर बढ़ता जा रहा था.      
  • 1939 में जब ब्रिटेन ने भारत के नेताओं से परामर्श किये बिना इसे युद्ध में शामिल कर लिया, तो कांग्रेस ने इसका विरोध किया. 1942 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन हुआ. इसके लिए, गांधी और नेहरू और हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को 1945 तक जेल में रखा गया था.
  •  इस बीच, ब्रिटिशर्स को युद्ध में सहयोगियों की जरूरत ने मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों को अपने भविष्य के राजनीतिक सुरक्षा उपायों के बदले  सहयोग की पेशकश की. 1940 के मार्च में मुस्लिम लीग ने “पाकिस्तान” प्रस्ताव दिया था जिसमें “अलग राज्य” के निर्माण की मांग की गयी थी. मुस्लिम लीग ने भारतीय मुसलमानों को समायोजित करने के लिए एकवचन नहीं, बहुवचन का नारा दिया. इतिहासकार अभी भी इस बात पर विभाजित हैं कि क्या यह अस्पष्ट माँग विशुद्ध रूप से एक सौदेबाजी थी या इसका कोई ठोस उद्देश्य था.
  • युद्ध के बाद, लंदन में एटली की सरकार ने माना कि ब्रिटेन की विनाशकारी अर्थव्यवस्था अधिक विस्तारित साम्राज्य की लागत का सामना नहीं कर सकती है. 1946 की शुरुआत में एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया और एटली ने महत्वाकांक्षी संदर्भ में अपने मिशन का वर्णन किया. 
  • संसद के एक अधिनियम में सत्ता के हस्तांतरण की समय सीमा के रूप में प्रस्तावित किया. लेकिन मिशन अपनी प्रस्तावित संवैधानिक योजना पर समझौते को सुरक्षित करने में विफल रहा, क्योंकि  इसने एक अव्यवस्थित महासंघ की सिफारिश की. इस विचार को कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अस्वीकार कर दिया था, उस समय किसी भी तरह से “पाकिस्तान” के लिए आंदोलन करने का दौर था. 

भारत के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार हैं? (Who was responsible for the partition of India?)

  • ज्यादातर लोग सिर्फ जिन्ना को इस विभाजन का जिम्मेदार मानते हैं लेकिन सच तो ये हैं की विभाजन की प्रक्रिया बहुत पहले ही शुरू हो गयी थी. वास्तव में भारत के विभाजन की कहानी 1906 से ही शुरू मानी जा सकती हैं जब पहली बार मुस्लिम वर्ग ने आघा खान के नेतृत्व में वायसराय को ये इच्छा सौपी थी. जिन्ना तो कहानी में बहुत देरी से आये,जब तक कांग्रेस के साथ इसके लिए पैक्ट हो चूका था.
  • 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के संयुक्त सत्र में लखनऊ पैक्ट (Lucknow Pact) सम्पन्न हुआ था. जिन्ना ने समझौता करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी,सरोजिनी नायडू ने हिंदू-मुस्लिम एकता को चिन्हित किया. हालांकि कांग्रेस ने बाद में समझौते को रद्द कर दिया. जिन्ना के पक्ष की कहानी यही हैं कांग्रेस 1920 के दशक की शुरुआत से ही उन्हें हाशिए पर रखने की लगातार कोशिश रही थी.
  • 1930 और 1940 में भारतीय मुस्लिम जो कभी भी अलग मुस्लिम राज्य नही चाहते थे,उनको भी सरकार में अपनी आवाज़ उठाने की आवश्यकता महसूस हुयी, यही सबसे बड़ा कारण था कि 1946 में हुए चुनावों में बहुत बड़ी संख्या में उन्होंने मुस्लिम लीग को वोट किया. 20वी शताब्दी की शुरुआत से ही हिन्दू मुस्लिम के मध्य विभाजन शुरू होने लग गया था. सिविल एडमिनिस्ट्रेशन से लेकर छोटी-बड़ी कई नौकरियों तक हिन्दूओं की ही बहुलता थी. मुस्लिम वर्ग खुदको उपेक्षित और पिछड़ा महसूस करने लगा था.
  • मुस्लिमों में राजा राम मोहन राय और इश्वर चन्द्र विद्या सागर जैसे समाज सुधारको की कमी थी जो की महिलाओं की अधिकारों की रक्षा और समाज हित के कुछ काम कर सके. लेकिन कांग्रेस भी इस दिशा में कोई काम नही कर रही थी,जिसकी तरफ मुल्सिम काफी आशाओं के साथ देख रहे थे. 1937 में चुनावों में मिली सफलता के बाद कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए बामुश्किल  कुछ काम किये थे, इस तरह पब्लिक सर्विस में भी इस समुदाय के प्रतिनिधियों की संख्या ज्यादा नहीं थी. इस दौरान ही जिन्ना ने राजनीति की मुख्य धारा में प्रवेश किया और पाकिस्तान नाम के एक नये देश के साथ अपने विभिन्न समस्याओं को कम किया.

         वास्तव में बहुत ही अच्छे कानूनी दिमाग वाले जिन्ना ने  भारत के अधिकांश मुसलमानों को समझाया कि उनकी आवाज को सुनने के लिए बिना कोई सुरक्षा के हिंदू भारत में उनके भविष्य पर भरोसा करना असंभव है. 

भारत-पाकिस्तान विभाजन के तात्कालिक परिणाम (Instant effects of India-Pakistan separation )

  • भारत पाकिस्तान विभाजन को ना भूल सकने का कारण ये भी हैं कि ये आम-जन के इच्छा के विपरीत था जिसके लिए बहुत बड़ी जनसंख्या तैयार नही थी. एक तो सत्ता का हस्तांतरण हो रहा था,उस पर प्रशासन की तरफ से ऐसी कोई ठोस तयारी नही थी कि विभाजन की प्रक्रिया को सुगम बनाया जा सके.
  • इस दौरान हुयी हिंसा में लाखों लोगों ने अपनी जान गवाई तो कितने ही घर परिवार बिखर गये, सम्पति के नुक्सान के साथ ही पीढ़ियों तक के संघर्ष का उद्घाटन था वो विभाजन. इन सबसे साधारण लोग इस हिंसा का खामियाजा भुगत रहे थे. उनके घरों और मोहल्लों में उन पर हमला किया गया और ट्रेन में या पैदल सीमा पार से काफिले में यात्रा करते हुए उन्हें मार डाला गया. किसी भी हिंसा में जो आसानी शिकार बनता हैं वो महिला वर्ग ही होता हैं और इस दौरान भी महिलाओं के साथ बलात्कार, मारपीट और अपहरण किया गया. कितने ही गांवों की आबादी को मार डाला गया, और लाशों के ढेर लग गये.
  • यह अकल्पनीय हिंसा केवल घृणा और क्रूरता की सहज अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि कई मामलों में योजनाबद्ध और संगठित थी. उस समय पंजाब विशेष रूप से हथियारों से लैस था और हाल ही में द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को हटा दिया गया था,तो कुछ ने अर्धसैनिक समूहों का गठन किया, जो अक्सर स्थानीय जमींदारों और अन्य कुलीनों द्वारा वित्त पोषित होते थे, जिन्होंने विभाजन के अराजकता का इस्तेमाल पुराने ओने स्वार्थ सिद्धि में किया. उन्होंने भूमि दावा किया और अपनी खुद की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति को सुरक्षित किया.
  • चूंकि इन संगठित अर्धसैनिक समूहों ने जातीय सफाई के अभियानों में पंजाब को पीछे छोड़ दिया था, ऐसे कुछ ही थे जो उन्हें रोक सकते थे. ब्रिटिश सरकार आंतरिक सुरक्षा के लिए अपने सैन्य बलों का उपयोग नहीं करने के लिए दृढ़ थी, और इसके परिणामस्वरूप, हजारों ब्रिटिश सैनिक अपने बैरकों में बने रहे क्योंकि उपमहाद्वीप के गाँव और शहर रक्तपात में बह गए थे.  
  • वास्तव में 14-15 अगस्त को भारत-पाकिस्तान का निर्माण ब्रिटिश सरकार का आखिरी मिनट पर लिया जाने वाला निर्णय था, उस समय बहुत ही कम लोगों को समझ आया था कि विभाजन के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं और तात्कालिक परिस्थितयों में ये कितना भयावह रूप ले सकता हैं. 

विभाजन के दूरगामी परिणाम (Long term effects of India-Pakistan separation)

  • 1950 तक हिंसा कम तो हो गयी लेकिन उस भयावह हिंसा के चिन्ह आज भी विभाजन की विरासत कर रूप में जीवित है. भारत और पाकिस्तान ने तीन युद्ध और कई बार सीमा पर छोटी-छोटी लड़ाईयां लड़ी हैं, अब प्रत्येक सरकार संदेह के साथ एक दूसरे के साथ संबंध रखती है. दो परमाणु-सशस्त्र शक्तियों के बीच घोषित-अघोषित युद्ध कश्मीर में लगातार होता रहता है.
  • वास्तव में विभाजन का एक अप्रत्याशित परिणाम यह था कि पाकिस्तान की आबादी अति धार्मिक थी. हालांकि मुस्लिम लीग के नेताओं ने यह मान लिया था कि पाकिस्तान में एक बड़ी गैर-मुस्लिम आबादी होगी, जिसकी उपस्थिति भारत में शेष मुसलमानों की स्थिति की रक्षा करेगी, मतलब पकिस्तान में जहां गैर-मुस्लिम सुरक्षित रहेंगे वहीं भारत में मुस्लिम सुरक्षित रह सकेंगे. फिर भी ये देखा गया कि पश्चिम पाकिस्तान में, गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों में 1951 तक केवल 1.6% जनसंख्या शामिल थी, जिसकी तुलना में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में 22%. मतलब साफ़ था कि भारत-पाकिस्तान में स्थानीय विभाजन से कही ज्यादा धार्मिक विभाजन हुआ था. और भले ही पाकिस्तान को भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए बनाया गया था लेकिन देश के सभी मुस्लिमों ने भी इसके गठन का समर्थन नहीं किया और वहाँ माइग्रेट नहीं किया. इस तरह  स्वतंत्र भारत में मुस्लिम सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह बने रहे.
  • दोनों राज्यों को बाद में विभाजन के बाद शरणार्थियों को समायोजित करने और पुनर्वास करने में भारी समस्याओं का सामना करना पड़ा. साम्प्रदायिक तनाव और धार्मिक ध्वन्धों ने और अधिक आंदोलन उत्पन्न कर दिए, विभाजन के बाद कई वर्षों तक हालात स्थिर नहीं हो सके और 1960 के दशक के अंत तक दोनों देशों में पलायन होता रहा. वर्तमान में भी दोनों देशों के मध्य स्थिर रूप से अच्छे संबंध नहीं है. कश्मीर इसका प्रत्यक्ष कारण हैं लेकिन परोक्ष रूप से पाकिस्तान का आतंकवाद को बढावा डें भारत के लिए परेशानी का सबब हैं,जिसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर भी माना जा रहा हैं. दोनों देश के पास परमाणु हथिया हैं. भारतीय मुसलमानों पर जहाँ अक्सर पाकिस्तान के प्रति वफादारी को लेकर संदेह रहता है  वहीं पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या बहुत ही कम हो गयी हैं, और वहाँ अल्पसंख्यकों के साथ अच्छे व्यवहार की कम खबरे ही देखने को मिलती हैं, इस तरह सात दशकों में, एक अरब से अधिक लोग आज भी विभाजन की छाया में रहते हैं. 

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