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अमृतसर स्वर्ण मंदिर का इतिहास | History of Amritsar Golden Temple in Hindi

अमृतसर स्वर्ण मंदिर का इतिहास (History of Amritsar Golden Temple in Hindi)

भारत के इतिहास में बहुत ऐसे  मंदिर प्रसिद्ध हैं  जिनकी कलात्मकता रोचक और आकर्षक हैं. यहाँ कई तरह की धातुओं का उपयोग करते हुए मन्दिर बनाये गये हैं, लेकिन सोने के मंदिरों के नाम और ख्याति सबसे ज्यादा रही हैं. जिस कारण इन मन्दिरों को कई तरह के आक्रमणों से भी गुजरना पड़ा, लेकिन वर्तमान में सोने से निर्मित विश्वप्रसिद्ध मन्दिरों की सूची में स्वर्ण मन्दिर का स्थान सबसे उपर हैं.

Amritsar Golden Temple history

मंदिर का नाम स्वर्ण मंदिर/ श्री हरमिंदर साहेब/ श्री दरबार साहिब
मंदिर का स्थान अमृतसर
निर्माण समय 1577
निर्माण शुरू किया गुरु रामदास ने
वास्तुकला और पूरा बनवाने का काम किया गुरु अर्जुन देव ने

क्या स्वर्ण मंदिर सोने से बना हैं?

श्री हरमिंदर साहेब को श्री दरबार साहिब या स्वर्ण मंदिर के नाम से भी जाना जाता हैं. इसे स्वर्ण मंदिर कहे जाने का कारण इसका सोने से बने होना और स्वर्ण मतलब सोने के जैसे  रंग का होना ही हैं. विश्व भर में सिख प्रतिदिन अरदास करते हैं और उनके लिए अमृतसर जाकर श्री हरमंदर साहेब से अरदास करना  उनकी धार्मिक आस्था में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं.

स्वर्ण मंदिर बनवाने  का उद्देश्य (Purpose of making Golden Temple)

गुरु हरमिंदर साहेब का अर्थ भगवान का मंदिर हैं. गुरु अमर दासजी ने गुरु राम दास जी को ये आदेश दिया था कि वो एक ऐसा अमृत स्थान बनाये जहाँ सिख सम्प्रदाय के लोग पूजा अर्चना कर सके. गुरु राम दास ने सभी सिखों को ये कार्य करने का आदेश दिया.  उन्होंने कहा कि अमृत सरोवर भगवान का घर होना चाहिए, और जो भी इसमें नहाए इसके सभी आध्यात्मिक और भौतिक लक्ष्य मिल जाये. काम करवाने के दौरान उस झोपड़ो को बढाया गया जिसमें गुरु पहले रहते थे, जिसे अब गुरु महल के नाम से जाना जाता हैं. 

श्री हरमिन्दर साहिब का निर्माण करवाने का महत्वपूर्ण उद्देश्य ये था की वहाँ पर सभी धर्म और जीवन शैली के पुरुष और महिलाए आकर एक साथ पूजा कर सके. अब भी हरमिंदर साहिब में प्रवेश करने के लिए चार प्रवेश द्वार जो की चार दिशाओं का प्रतिनिधत्व करते हैं को सभी धर्मों के लिए सिखों के स्वागत का प्रतीक हैं.

आज भी 100,000 से अधिक लोग पूजा के लिए पवित्र मंदिर में प्रतिदिन जाते हैं, और किसी भी भेद की परवाह किए बिना मुक्त सामुदायिक रसोई और भोजन (लंगर) में संयुक्त रूप से भाग लेते हैं, और ये वो परंपरा हैं जो ना केवल हरमिंदर साहेब बल्कि सभी सिख गुरुद्वारों की पहचान है.

स्वर्ण मन्दिर किसने बनाया?(Who made Golden Temple?)

  • गुरु अमरदास साहिब (तीसरे नानक) ने सबसे पहले पवित्र टैंक (अमृत सरोवर) की खुदाई की योजना बनाई. इसके लिए पहले के गुरु साहिबों ने अधिग्रहित या पैतृक गाँवों के जमींदारों से मुफ्त में जमीन प्राप्त की थी. गुरु राम दास साहेब ने वहाँ के गाँवों के जमीदार से पैसे देकर जमीन खरीदी थी. मन्दिर के लिए आवश्यक जमीन को 700 रूपये में खरीदा गया था फिर 1574 में इस पर निर्माण कार्य शुरू हुआ. गुरु ने यहाँ अपने लिए भी एक आवास बनाया जिसे “गुरु दा चक्क” कहा जाता हैं.
  • सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन साहिब ने श्री हरमिन्दर साहेब का आर्किटेक्चर (वास्तुकला) का निर्धारण किया. सिख धर्म  की गैर-सम्प्रदायवादी सार्वभौमिकता को एक सांकेतिक रूप में दर्शाने के लिए ही गुरु अर्जुन देव ने लाहौर के मुस्लिम सूफी संत, हजरत मियां मीर को हरमंदिर साहिब (द गोल्डन टेम्पल) की आधारशिला रखने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया था और उन्होंने 1645 में माघ के पहले दिन इसकी नीव रखी थी.
  • इस तरह इसका निर्माण कार्य गुरु अर्जुन साहेब की देखरेख में पूरा  हुआ था, जिसमें उनके प्रमुख सहयोगी बाबा बुड्ढा जी, भाई गुरदास जी, भाई सहलो जी और अन्य बहुत से सिख अनुयायियों ने सहयोग दिया था. 
  • वहाँ शहर बसाने की योजना भी बनाई गयी थी, इसलिए शहर निर्माण का कार्य 1570 में शुरू हुआ था, और मंदिर के साथ शहर बसाने का काम 1577 में पूरा हुआ.
  • गुरु राम दास ने टैंक बनवाया, जिसे अमृतसर के नाम से जाना जाता हैं. हरमिंदर साहेब (सवर्ण मंदिर) को इस सरोवर के मध्य में बनाया गया, इसके गर्भगृह में सिख ग्रंथों और दार्शनिकों, जैसे कि बाबा फरीद, और कबीर के विचार वाले सिख गुरुओं और अन्य संतों की रचनाओं वाले आदि ग्रंथ का निर्माण हुआ. आदि ग्रंथ के संकलन की शुरुआत सिख धर्म के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव ने की थी. 

मंदिर की संरचना और वास्तुकला (Structure of Temple)

  • हिन्दू मन्दिरों की तरह उपर तक उठाने की जगह,  इस मंदिर की वास्तुकला इस तरह रखी गयी की ये नीचे ही रहे, इसका विशाल गुम्बद और गगनचुम्बी इमारत ना हो,और अन्य हिन्दू मन्दिरों की तरह इसके एक प्रवेश द्वार की जगह चार प्रवेश द्वार रखे गये, जो की सिख धर्म के विशवास का प्रतीक थे.
  • 1601 के भादों सुदी प्रथमा को निर्माण कार्य पूरा हुआ, अगस्त/सितम्बर 1604 में गुरु अर्जुन देव ने इसका उद्घाटन किया. और बाबा बुड्ढा जी को “प्रथम ग्रंथी” नियुक्त किया, जो कि गुरु ग्रन्थ साहेब का पाठ करते थे. इसके बाद इस जगह को “अथ सथ तीरथ” का दर्जा मिल गया, और अब सिखों के पास अपना तीर्थ स्थल हैं.
  • श्री हरमिंदर साहेब 67 फीट स्क्वेयर का बना हैं जिसके केंद्र में एक सरोवर हैं. मंदिर 40.5 फीट स्क्वेयर का हैं.
  • इसके उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम में द्वार हैं. दर्शनी देवरी (एक मेहराब) कार्य-मार्ग के किनारे पर स्थित है.
  • आर्क के दरवाजे का फ्रेम ऊंचाई में लगभग 10 फीट और चौड़ाई में 8 फीट 6 इंच है.
  • डोर पैन को कलात्मक शैली से सजाया गया है, जो कि सेतु की तरफ खुलता है और ये सेतु मार्ग श्री हरमंदिर साहिब के मुख्य भवन की तरफ जाता है, सेतु की लंबाई 202 फीट और चौड़ाई 21 फीट है.
  • पुल 13 फीट चौड़े परिधि पथ से जुड़ा है जो कि मुख्य मंदिर के चारों ओर घूमता है और यह ‘हर की पैरी’ (भगवान के चरणों) की ओर जाता है. “हर की पैरी” की पहली मंजिल पर, गुरु ग्रंथ साहिब का निरंतर पाठ होता रहता है.
  • हरमंदिर साहेब मुख्यत: संरचनात्मक और कार्यात्मक और तकनीकी रूप से तीन मंजिला है, पहली मंजिल की छत 26 फीट और 9 इंच की ऊंचाई पर है. पहली मंजिल के शीर्ष पर 4 फीट ऊंची मुंडेर हैं जो की चारो तरफ से ऊपर की तरफ उठी हुयी हैं, और इसके चार कोनों पर चार ‘मैमटे’ भी हैं. मुख्य गर्भगृह के केंद्रीय हॉल के शीर्ष पर तीसरी मंझिल हैं पर एक छोटा वर्गाकार कमरा है और जिसके तीन द्वार हैं.
  • इस कमरे के शीर्ष पर गुंबद है, जिसके शीर्ष उल्टे कमल की पंखुड़ी की आकृति है, जिसके अंत में एक सुंदर “छतरी” वाला “कलश” बना दिखाई देता है.
  • वास्तव में इसकी वास्तुकला मुसलमानों और हिंदुओं के मध्य के सामंजस्य और स्नेह का प्रतिनिधित्व करती है. लेकिन तकनीकी दृष्टि से ही इसे दुनिया का सबसे अच्छा वास्तुशिल्प नमूना माना जाता है. कह सकते हैं कि इस वास्तुकला ने भारत में कला के इतिहास में एक स्वतंत्र सिख स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर बनाया है.

 अमृत ​​सरोवर से जुडी रोचक कहानी (Interesting story Connected With Amrit Sarovar)  

अमृत सरोवर से बहुत सी किवदन्तियाँ जुडी हैं,इनमें सबसे लोकप्रिय किवदंती रजनी की कहानी है,जो कि राय दुनी चंद की बेटी थी. रजनी गुरु के प्रति निष्ठा रखने वाली उत्साही और समर्पित भक्त थी,किन्तु शायद उसके पिता में इस हद तक आस्था नहीं थी. एक दिन, उसके पिता को  अपनी तीनों बेटियों के लिए कुछ उपहार मिले, इस पर जहां उनकी अन्य दो बेटियों ने पिता की प्रशंसा की वही रजनी ने कहा कि उपहार वास्तव में ईश्वर की ओर से थे और उनके पिता केवल इसे वितरित करने का माध्यम थे. यह सुनकर उसके पिता  बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने उसकी शादी कुष्ठ रोगी से कर दी. तब से, रजनी ने अपने पति के जीवन को सुधारने एवं खुश रहने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया. एक दिन, रजनी ने अपने पति को टोकरी में रखकर  एक कुंड में रखा और किसी काम के लिए चली गई. इस बीच, उसके पति ने एक कौवे को पूल के पानी में डुबकी लगाते देखा जो कि बाहर आकर एक सफेद पक्षी के रूप में परिवर्तित हो गया. यह देखकर वह उत्साहित हुआ और वह भी पानी में गिर गया, जिससे उसमे चमत्कारिक परिवर्तन हुआ. वह एक सुंदर युवक के रूप में बदल गया और उसके सभी रोग ठीक हो गए. दंपति ने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया और अपने गुरु के पास गया. ऐसा माना जाता है कि तब से इस टैंक को “अमृत सरोवर” कहा जाने लगा क्योंकि इसमें अमृत हैं और इससे कोई भी बीमारी ठीक हो सकती हैं.

मंदिर को  क्षति (Damage to the Temple)

ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय मंदिर और अकाल तख्त को क्षति हुयी थी जिसमे सेना के जवान और सिखों के मध्य युद्ध जैसे हालत बन गये और इसमें कई लोग मारे गये. इसका बदला लेने के लिए प्रधानमंत्री के सिख बॉडीगार्ड ने इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी. 1986 में राजीव गांधी ने अकाल तख़्त का पुन:निर्माण करवा दिया था लेकिन 1989 में इसे हटा दिया गया. बाद में कार सेवकों ने 1999 में अकाल तख्त का निर्माण करवाया.

स्वर्ण मंदिर और अमृतसर से जुडी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ 

  • 13 अप्रैल 1919 को यहाँ जलियांवाला बाग हत्याकांड भी हुआ था,जिसमें कई भारतीय मारे गए थे. ये हत्या एडवर्ड हैरी डायर के आदेश से हुयी थी.
  • स्वतंत्रता के समय जब भारत का विभाजन हुआ तब अमृतसर भारत के हिस्से में आया. अमृतसर से 28 किलोमीटर दूर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर वाघा बॉर्डर भी हैं.

वास्तव में स्वर्ण मन्दिर  केवल सोने से बना होने के कारण ही विख्यात नहीं हैं,बल्कि यहाँ की व्यवस्था भी इसे अलग बनाती हैं,जिसमें सिख समुदाय के निस्वार्थ समर्पण और धार्मिक आस्था के साथ इसमें की जाने वाली सेवा काफी महत्व रखती है, इसके बारे में समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि स्वर्ण मन्दिर के इतिहास में सिखों के धर्म गुरु और इनके सिद्धांतों का योगदान हैं.

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